भागवत-चैतन्य का विज्ञान है, धर्म

रात्रि की शांति में नगर सो गया है। एक अतिथि को साथ लेकर मैं घूम कर लौटा हूं। मार्ग में बहुत बातें हुई हैं। अतिथि अनात्मवादी हैं। विद्वान हैं और खूब पढ़ा-लिखा है। बहुत तर्क उन्होंने इकटं्ठे किये हैं। मैंने वह सब शांत हो सुना है। और फिर सिर्फ एक ही बात पूछी है कि क्या इन सारे विचारों से शांति और आनंद उन्हें उपलब्ध हो रहा है?
इस पर वे थोड़ा सकुचा गये हैं और उत्तर नहीं खोज पाए हैं।
सत्य की कसौटी तर्क नहीं है। सत्य की कसौटी विचार नहीं है। सत्य की कसौटी है आनंदानुभूति। विचार-सारणी सम्यक हो, तो परिणाम में जीवन आनंद-चेतना से भर जाता है। इस स्थिति को ही पाने के लिए सब विचार हैं और जो विचार-दर्शन यहां नहीं ले आता, वह अविचार ही ज्यादा है। इससे, मैंने उनसे कहा, 'मैं आपकी बातों का विरोध नहीं करता हूं। बस, आपसे ही- अपने आपसे यह प्रश्न पूछने की विनय करता हूं।'
धर्म विचार नहीं है। वह तो भागवत-चैतन्य उपलब्ध करने का एक विज्ञान मात्र है। उसकी परीक्षा विवाद में नहीं, प्रयोग में है। वह सत्य-निर्णय नहीं, सत्य-साधना और सिद्धि है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मैं का बोद्ध


धूप में घूम कर लौटा हूं। सर्दियों की कुननी धूप कितनी सुखद मालूम होती है। सूरज निकला ही है और किरणों की गरमाहट आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ रही है।
एक व्यक्ति साथ थे। मैं राह भर चुप रहा, पर वे बोलते ही रहे। सुनता था, तो एक बात ध्यान में आयी कि हम कितनी बार 'मैं' का प्रयोग करते हैं। इस 'मैं' के केंद्र से ही सब जुड़ा रहता है। जन्म के बाद संभवत: 'मैं' का बोध सबसे पहले उठता है और मृत्यु के समय सबसे अंत में यह जाता है। इन दो छोरों के बीच में भी उसका ही विस्तार होता है।
इतना सुपरिचित यह 'मैं' है, पर कितना अज्ञात भी है! इससे अधिक रहस्यमय शब्द मानवीय भाषा में दूसरा नहीं है।
जीवन बीत जाता है, पर 'मैं' का रहस्य शायद उघड़ पाता हो!
यह 'मैं' कौन है? इसे अस्वीकार करना भी संभव नहीं है। निषेध में भी यह प्रस्तावित हो जाता है। 'मैं नहीं हूं' कहने में भी वह उपस्थित हो जाता है। मानवीय बोध में यह 'मैं' सबसे सुनिश्चित और अंसदिग्ध तत्व है।
'मैं हूं'- यह बोध तो है, पर 'मैं कौन हूं?'- यह सहज ज्ञान नहीं है। इसे जानना साधना से ही सुलभ है। समस्त साधना 'मैं' को जानने की साधना है। समस्त धर्म, समस्त दर्शन इस एक प्रश्न के ही उत्तर हैं।
'मैं कौन हूं?' इसे प्रत्येक को अपने से पूछना है। सब छूट जाए और एक प्रश्न ही रह जाये। सारे मन पर गूंजती यह एक जिज्ञासा रह जाये। तो ऐसा यह प्रश्न अचेतन में उतर जाता है। प्रश्न जैस-जैसे गहरा होने लगता है, वैसे-वैसे सतही तादात्म्य टूटने लगते हैं। दिखने लगता है कि मैं शरीर नहीं हूं। दिखने लगता है कि मैं मन नहीं हूं। दिखने लगता है कि मैं तो वह हूं, जो सबको देख रहा है। द्रष्टा हूं मैं, साक्षी हूं मैं। यह अनुभूति 'मैं' के वास्तविक स्वरूप का दर्शन बन जाती है। शुद्ध-बुद्ध, द्रष्टा-चेतना का साक्षात हो जाता है।
इस सत-ज्ञान के उदय से जीवन के रहस्य का द्वार खुलता है। अपने से परिचित होकर हम जगत के समस्त रहस्य से परिचित हो जाते हैं। 'मैं' का ज्ञान ही प्रभु का ज्ञान बन जाता है। इसलिए कहता हूं कि यह 'मैं' बहुमूल्य है। इसकी परिपूर्ण गहराई में उतर जाना, सब-कुछ पा लेना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शून्य ही हमारा स्वरूप है

संध्या रुकी सी लगती है। पश्चिमोन्मुख सूरज देर हुए बादलों में छुप गया है, पर रात्रि अभी नहीं हुई है। एकांत है- बाहर भी, भीतर भी। अकेला हूं- कोई बाहर नहीं है, कोई भीतर नहीं है।मैं इस समय कहीं भी नहीं हूं या कि वहां हूं, जहां शून्य है। और जब मन शून्य होता है, तो होता ही नहीं है।यह मन अद्भुत है। प्याज की गांठ की तरह अनुभव होता है। एक दिन प्याज को देख कर यह स्मरण आया था। उसे छीलता था, छीलता गया-परतो पर परतें निकलती गयीं और फिर हाथ कुछ भी न बचा। मोटी खुदरी परतें, फिर मुलायम चिकनी परतें और फिर कुछ भी नहीं। मन भी ऐसा ही है : उघाड़ते चलें-स्थूल परतें, फिर सूक्ष्म परतें, फिर शून्य। विचार, वासनाएं और अहंकार और बस, फिर कुछ भी नहीं है, फिर शून्य है। इस शून्य को उघाड़ लेने को ही मैं ध्यान कहता हूं।यह शून्य ही हमारा स्वरूप है। वह जो अंतत: शेष बचा रहता है, वही स्वरूप है। उसे आत्मा कहें, चाहे अनात्मा। शब्द से कुछ अर्थ नहीं है। विचार, वासना, अहंकार जहां नहीं है, वहीं वह है-'जो है।'ह्यूम ने कहा : जब भी मैं अपने में जाता हूं, कोई 'मैं' मुझे वहां नहीं मिलता है, 'या तो विचार से टकराता हूं, या किसी वासना से या किसी स्मृति से। पर स्वयं से कोई मिलना नहीं होता है।' यह बात ठीक ही है। पर ह्यूम परतों ही से लौट आते हैं। यही उनकी भूल है। वे थोड़ा और गहरे जाते, तो वहां पहुंच जाते जहां कि टकराने को कुछ भी नहीं है। वही है स्वरूप। जहां टकराने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता है, वहां वह है, जो मैं हूं। उस शून्य पर ही सब खड़ा है, पर यदि कोई सतह से ही लौट आये, तो उससे परिचय नहीं हो पाता है। सतह पर संसार है, केंद्र में स्व है। सतह पर सब है, केंद्र पर शून्य है।(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

स्वयं में डूबो

एक राजा ने किसी सामान्यत: स्वस्थ और संतुलित व्यक्ति को कैद कर लिया था- एकाकीपन का मनुष्य पर क्या प्रभाव होता है, इस अध्ययन के लिए। वह व्यक्ति कुछ समय तक चीखता रहा चिल्लाता रहा। बाहर जाने के लिए रोता था, सिर पटकता था- उसकी सारी सत्ता जो बाहर थी। सारा जीवन तो 'पर' से अन्य बंधा था। अपने में तो वह कुछ भी नहीं था। अकेला होना न होने के ही बराबर था।
वह धीरे-धीरे टूटने लगा। उसके भीतर कुछ विलीन होने लगा, चुप्पी आ गई। रुदन भी चला गया। आंसू भी सूख गये और आंखें ऐसे देखने लगीं, जैसे पत्थर हों। वह देखता हुआ भी लगता जैसे नहीं देख रहा है।
दिन बीते, वर्ष बीत गया। उसकी सुख सुविधा की सब व्यवस्था थी। जो उसे बाहर उपलब्ध नहीं था, वह सब कैद में उपलब्ध था। शाही आतिथ्य जो था! लेकिन वर्ष पूरे होने पर विशेषज्ञों ने कहा, 'वह पागल हो गया है।'
ऊपर से वह वैसा ही था। शायद ज्यादा ही स्वस्थ था, लेकिन भीतर?
भीतर एक अर्थ में वह मर ही गया था।
मैं पूछता हूं : क्या एकाकीपन किसी को पागल कर सकता है? एकाकीपन कैसे पागल करेगा? वस्तुत: पागलपन तो पूर्व से ही है। बाह्य संबंध उसे छिपाये थे। एकाकीपन उसे अनावृत कर देते हैं।
मनुष्य को भीड़ में खोने की अकुलाहट उससे बचने के लिए ही है।
प्रत्येक व्यक्ति इसलिए ही स्वयं से पलायन किये हुए है। पर यह पलायन स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है। तथ्य को न देखना, उससे मुक्त होना नहीं है। जो नितांत एकाकीपन में स्वस्थ और संतुलित नहीं है, वह धोखे में है। यह आत्मवंचन कभी न कभी खंडित होगी ही और वह जो भीतर है, उसे उसकी परिपूर्ण नग्नता में जानना होगा। यह अपने आप अनायास हो जाए, तो व्यक्तित्व छिन्न-भिन्न और विक्षिप्त हो जाता है। जो दमित है, वह कभी न कभी विस्फोट को भी उपलब्ध होगा।
धर्म इस एकाकीपन में स्वयं उतरने का विज्ञान है। क्रमश: एक-एक परत उघाड़ने पर अद्भुत सत्य का साक्षात होता है। धीरे-धीरे ज्ञात होता है कि वस्तुत: हम अकेले ही हैं। गहराई में, आंतरिकता के केंद्र पर प्रत्येक एकाकी है। परिचित होते ही भय की जगह अभय और आनंद ले लेता है। एकाकीपन के घेरे में स्वयं सच्चिदानंद विराजमान है।
अपने में उतरकर स्वयं प्रभु को पा लिया जाता है। इससे कहता हूं- अकेलेपन से, अपने से भागो मत, वरन अपने में डूबो। सागर में डूब कर ही मोती पाये जाते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ईश्वर हमारा 'स्व'

चांद ऊपर उठ रहा है। दरख्तों को पार करता उसका मद्धिम प्रकाश रास्ते पर पड़ने लगा है और आम्र-फूलों की भीनी गंध से हवाएं सुवासित हो रही हैं।
मैं एक विचार गोष्ठी से लौटा हूं। जो थे वहां, अधिकतर युवक थे। आधुनिकता से प्रभावित और उत्तेजित। अनास्था ही जैसे उनकी आस्था है, निषेध स्वीकार है। उनमें से एक ने कहा, 'मैं ईश्वर को नहीं मानता हूं, मैं स्वतंत्र हूं।' इस एक पंक्ति से तो युग की मन:स्थिति ही प्रतिबिंबित है। सारा युग इस स्वतंत्रता की छाया में है, बिना यह जाने कि स्वतंत्रता आत्महत्या है।
क्यों है, यह आत्महत्या? क्योंकि अपने को अस्वीकार किए बिना ईश्वर को अस्वीकार करना असंभव है।
एक कहानी मैंने उनसे कही : ईश्वर के भवन पर फैली एक अंगूर की बेल थी। वह फैलते-फैलते बढ़ते-बढ़ते, आज्ञा मानते-मानते थक गई थी। उसका मन परतंत्रता से ऊब गया था और फिर एक दिन उसने भी स्वतंत्र होना चाहा था। वह जोर से चिल्लाई थी कि सारा आकाश सुन ले, 'मैं अब बढ़ूंगी नहीं!'
'मैं अब बढ़ूंगी नहीं!'
'मैं अब बढ़ूंगी नहीं!'
यह विद्रोह निश्चय ही मौलिक था, क्योंकि स्वभाव के प्रति ही था। ईश्वर ने बाहर झांक कर कहा, 'न बढ़ो, बढ़ने की आवश्यकता ही क्या है?' बेल खुश हुई, विद्रोह सफल हुआ था। वह न बढ़ने के श्रम में लग गई। पर बढ़ना न रुका, न रुका। वह बढ़ने में लगी रही और बढ़ती गई और ईश्वर यह पूर्व से ही जानता था।
यही स्थिति है। ईश्वर हमारा स्वभाव है। वह हमारा आंतरिक नियम है। उससे दूर नहीं जाया जा सकता है। वह हुए बिना कोई मार्ग नहीं है। कितना ही अस्वीकार करें, कितना ही स्वतंत्र होना चाहें उससे, पर उससे मुक्ति नहीं है, क्योंकि वह हमारा स्व है। वस्तुत: वह ही है और हम कल्पित हैं। इसलिए कहता हूं : उससे नहीं, उसमें ही मुक्ति है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रकृति ही परमात्मा

मैं प्रकृति में ही परमात्मा को देखता हूं। प्रतिक्षण, प्रतिघड़ी उसका मुझे अनुभव हो रहा है। एक श्वास भी ऐसी नहीं आती-जाती है, जब उससे मिलना न हो जाता हो। जहां भी आंख पड़ती है, देखता हूं कि वह उपस्थित है और जहां भी कान सुनते हैं, पाता हूं कि उसका ही संगीत है।
वह तो सब जगह है, केवल उसे देखने भर की बात है। वह तो है, पर उसे पकड़ने के लिए आंख चाहिए। आंख के आते ही सब दिशाओं में और सब समय उपस्थित हो जाता है।
रात्रि में आकाश जब तारों से भर जाए, तो उन तारों को सोचों मत, देखो और केवल देखो। विचार न हो और मात्र दर्शन हो, तो एक बड़ा राज ,खुल जाता है और प्रकृति के द्वार से उस रहस्य में प्रवेश होता है, जो कि परमात्मा है। प्रकृति परमात्मा के अवतरण से ज्यादा कुछ भी नहीं है और जो उसके घूंघट को उठाना जानते हैं, वे ही केवल जीवन के सत्य से परिचित हो पाते हैं।
सत्य का एक युवा खोजी किसी सद्गुरु के पास था। उसने जाकर पूछा, 'मैं सत्य को जानना चाहता हूं, मैं धर्म को जानना चाहता हूं। कृपा करें और मुझे बतायें कि मैं कहां से प्रारंभ करूं?' सद्गुरु ने कहा, 'क्या पास ही पर्वत से गिरते जलप्रपात की ध्वनि सुनाई पड़ रही है?' युवक ने कहा, 'मैं तो उसे भली-भांति सुन रहा हूं।' सद्गुरु बोले, 'तब वहीं से प्रारंभ करो, वहीं से प्रवेश करो। वही द्वार है।'
सच ही प्रवेश द्वार इतना ही निकट है- पहाड़ से गिरते झरनों में, हवाओं में डोल रहे वृक्षों के पत्तों में, सागर पर नाच रही सूरज की किरणों में। पर हर प्रवेश द्वार पर पर्दा है और बिना उठाये वह उठता नहीं है। वस्तुत: वह पर्दा प्रवेश-द्वारों पर नहीं है, वह हमारी दृष्ट पर ही है और इस भांति एक परदे ने अनंत द्वारों पर परदा कर दिया है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

दिव्य प्यास

कल एक जगह बोला हूं।
कहा मैं तुम्हें असंतुष्ट करना चाहता हूं। एक दिव्य प्यास, एक अलौकिक अतृप्ति सब में पैदा हो, यही मेरी कामन है। मनुष्य जो है, उसमें तृप्त रह जाना मृत्यु है। मनुष्य विकास का अंत नहीं है। एक विकास-सोपान है। जो उसमें प्रकट है, वह अप्रकट की तुलना में कुछ भी नहीं है। जो वह है, वह उसकी तुलना में जो कि वह हो सकता है, कुछ न होने के बराबर ही है।
धर्म, तृप्ति की मृत्यु से, प्रत्येक को अतृप्ति के जीवन में जगाना चाहता है। क्योंकि उस अतृप्ति से ही उस बिंदु तक पहुंचना हो सकता है, जहां कि वास्तविक संतृप्ति है।
मनुष्य को मनुष्यता का अतिक्रमण करना है।
यह अतिक्रमण ही उसे दिव्यता में प्रवेश देता है।
यह अतिक्रमण कैसा होगा? एक परिभाषा को समझें, तो अतिक्रमण की प्रतिक्रिया भी समझ में आ जाती है।
पशुता- विचार-प्रकिया के पूर्व की स्थिति।
मनुष्यता- विचार-प्रक्रिया की स्थिति।
दिव्यता - विचार-प्रक्रिया के अतीत की स्थिति।
विचार-प्रक्रिया के घेरे के पार चलें, तो चेतना दिव्यता में पहुंच जाती है।
विचार-प्रक्रिया को पार करना मनुष्यता का अतिक्रमण कर जाना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)