विजय पथ

मैंने कल कहा है : मिट्टी फूल बन जाती है। और गंदगी खाद बनकर सुगंध में परिणत हो जाती है। ऐसे ही मनुष्य के विकार हैं। जो मनुष्य में पशु जैसे दिखते हैं। वही दिशा परिवर्तित होने पर दिव्यता को उपलब्ध हो जाते हैं।
इसलिए अदिव्य भी बीजरूप में दिव्य हैं और तब वस्तुत: अदिव्य कुछ भी नहीं हैं। समस्त जीवन दिव्यता है। सब कुछ दिव्य है। भेद केवल उस दिव्यता की अभिव्यक्ति का है।
और ऐसा देखने पर कुछ भी घृणा करने योग्य नहीं रह जाता है। जो एक छोर पर पशु है, वही दूसरे छोर पर प्रभु है। पशुता और दिव्यता में विरोध नहीं, विकास है। ऐसी पृष्ठभूमि में चलने पर आत्म-दमन और उत्पीड़न व्यर्थ है। यह संघर्ष अवैज्ञानिक है। अपने को दो में तोड़कर कोई भी आत्म-शांति और ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकता है।
जो मैं ही हूं, उसके एक अंश को नष्ट किया जा सकता है। वह दब सकता है, लेकिन जिसका दमन किया गया है, उसका निरंतर दमन करना होता है। जो हारा गया है, उसे निरंतर हारना होता है। विजय उस मार्ग से कभी पूर्ण नहीं हो पाती है।
विजय का पथ दूसरा है। वह दमन का नहीं, ज्ञान का है। वह गंदगी को हटाने का नहीं है, क्योंकि वह गंदगी भी मैं ही हूं। वह उसे खाद बनाने का है। इसे ही पुरानी अलकेमी में 'लोहे को स्वर्ण बनाना' कहा गया है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मृत्यु और जीवन

भोर का आखिरी तारा डूब रहा है। कुहासे में ढंकी सुबह का जन्म होने को है। पूरब पर प्रसव की लाली फैल गयी है।
मित्र ने अपने किसी प्रियजन की मृत्यु की खबर दी है। रात्रि ही देह से उनका संबंध टूटा है। फिर थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वे मृत्यु पर बात करने लगे हैं। बहुत सी बातें और अंत में उन्होंने पूछा : 'रोज मृत्यु होती है, फिर भी प्रत्येक ऐसे जीता है कि जैसे उसे मरना नहीं है! यह समझ में ही नहीं आता है कि मैं भी मर सकता हूं। इतनी मृत्यु के बीच, यह अमृत्व का विश्वास क्यों?'
यह विश्वास बहुत अर्थपूर्ण है। यह इसलिए है कि म‌र्त्य देह में जो बैठा है, वह म‌र्त्य नहीं है। मृत्यु की परिधि है, पर केंद्र पर मृत्यु नहीं है।
वह जो देख रहा है- देह-मन का दृष्टा है- वह जानता है कि मैं देह और मन से पृथक हूं। वह म‌र्त्य का दृष्टा, म‌र्त्य नहीं है। वह जान रहा है : सब मृत्युओं को पार करके भी मैं अमृत शेष रह जाता हूं।'
पर यह बोध अचेतन है, इसे चेतन बना लेना ही मुक्त हो जाना है। मृत्यु प्रत्यक्ष दीखती है, अमृत का बोध परोक्ष है- उसे भी जो प्रत्यक्ष बना लेता है, वह जान लेता है उसे- जिसका न जन्म है, न मृत्यु है।
वह जीवन-जो जीवन और मृत्यु के अतीत है- पा लेना ही मोक्ष है। वह प्रत्येक के भीतर है, उसे केवल जानना भर है।
एक साधु से किसी ने पूछा था, 'मृत्यु क्या है और जीवन क्या है? यह जानने मैं आपके पास आया हूं।' उस साधु ने प्रत्युत्तर में जो कहा, वह अद्भुत है। उसने कहा था, 'तब कहीं और जाओ। मैं जहां हूं, वहां न मृत्यु है, न जीवन है।'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

चेतना को पहचानों

एक झोंपड़े में बैठा हूं। छप्पर की रंध्रों से सूरज का प्रकाश गोल चकतों में फर्श पर पड़ रहा है। उनमें उड़ते धूलिकण दिख रहे हैं। प्रकाश के वे अंग नहीं हैं, पर उन्होंने प्रकाश को धूमिल कर दिया है। वे प्रकाश को छू भी नहीं सकते हैं, क्योंकि वे अत्यन्त भिन्न और विजातीय हैं। फिर भी प्रकाश उनके कारण मैला हो गया दिखता है। प्रकाश तो अब भी प्रकाश है। उसके स्वरूप में कोई भेद नहीं पड़ा है। पर उसकी देह- उसकी अभिव्यक्ति अशुद्ध हो गई है। इन विजातीय अतिथियों के कारण आतिथेय बदला हुआ दिख रहा है।
ऐसे ही मनुष्य की आत्मा के साथ भी हुआ है। उसमें भी बहुत से विजातीय धूलिकण अतिथि बन गये हैं और इन धूलिकणों में उसका जो स्वरूप है, वह छिप गया है। आतिथेय जैसे बहुत अतिथियों में खो जाये और पहचाना न जा सके, ऐसा ही हो गया है।
पर जो जीवन से परिचित होना चाहते हैं और सत्य का साक्षात करना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक है कि वे अतिथियों की भीड़ में उसे पहचाने जो कि अतिथि नहीं है और गृहपति है। इस गृहपति के जाने बिना जीवन एक निद्रा है। उसकी पहचान से ही जागरण का प्रारंभ होता है।
वह पहचान ही ज्ञान है। उस पहचान से उससे परिचय होता है, जो कि नित्य शुद्ध-बुद्ध है।
धूलिकणों से प्रकाश अशुद्ध नहीं होता है, न ही आत्मा होती है।
प्रकाश धूमिल हो जाता है, आत्मा विस्मृत हो जाती है।
आत्मा के प्रकाश पर कौन सी धूल है?
वह सब जो भी मुझ में बाहर से आया है- वह सब धूल है। उसके अतिरिक्त जो मुझ में है, वही मेरा स्वरूप है। इंद्रियों से जो भी उपलब्ध और संग्रहीत हुआ है, वह सब धूल है।
ऐसा क्या है मुझमें, जो इंद्रियों से उपलब्ध नहीं है? रूप, रस, गंध, ध्वनि-इसके अतिरिक्त और मुझ में क्या है?
वह सत्य है : चेतना-जो कि इंद्रियों से गृहीत नहीं है।
वह इंद्रियों से नहीं आयी है- वरन उनके पीछे है।
यह चेतना ही मेरा स्वरूप है, शेष सब विजातीय धूल है। वही गृहपति है, शेष सब अतिथि हैं। इस चेतना को ही जानना और उघाड़ना है। उसमें ही उस संपदा की उपलब्धि होती है, जो कि अविनश्वर है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

भागवत-चैतन्य का विज्ञान है, धर्म

रात्रि की शांति में नगर सो गया है। एक अतिथि को साथ लेकर मैं घूम कर लौटा हूं। मार्ग में बहुत बातें हुई हैं। अतिथि अनात्मवादी हैं। विद्वान हैं और खूब पढ़ा-लिखा है। बहुत तर्क उन्होंने इकटं्ठे किये हैं। मैंने वह सब शांत हो सुना है। और फिर सिर्फ एक ही बात पूछी है कि क्या इन सारे विचारों से शांति और आनंद उन्हें उपलब्ध हो रहा है?
इस पर वे थोड़ा सकुचा गये हैं और उत्तर नहीं खोज पाए हैं।
सत्य की कसौटी तर्क नहीं है। सत्य की कसौटी विचार नहीं है। सत्य की कसौटी है आनंदानुभूति। विचार-सारणी सम्यक हो, तो परिणाम में जीवन आनंद-चेतना से भर जाता है। इस स्थिति को ही पाने के लिए सब विचार हैं और जो विचार-दर्शन यहां नहीं ले आता, वह अविचार ही ज्यादा है। इससे, मैंने उनसे कहा, 'मैं आपकी बातों का विरोध नहीं करता हूं। बस, आपसे ही- अपने आपसे यह प्रश्न पूछने की विनय करता हूं।'
धर्म विचार नहीं है। वह तो भागवत-चैतन्य उपलब्ध करने का एक विज्ञान मात्र है। उसकी परीक्षा विवाद में नहीं, प्रयोग में है। वह सत्य-निर्णय नहीं, सत्य-साधना और सिद्धि है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मैं का बोद्ध


धूप में घूम कर लौटा हूं। सर्दियों की कुननी धूप कितनी सुखद मालूम होती है। सूरज निकला ही है और किरणों की गरमाहट आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ रही है।
एक व्यक्ति साथ थे। मैं राह भर चुप रहा, पर वे बोलते ही रहे। सुनता था, तो एक बात ध्यान में आयी कि हम कितनी बार 'मैं' का प्रयोग करते हैं। इस 'मैं' के केंद्र से ही सब जुड़ा रहता है। जन्म के बाद संभवत: 'मैं' का बोध सबसे पहले उठता है और मृत्यु के समय सबसे अंत में यह जाता है। इन दो छोरों के बीच में भी उसका ही विस्तार होता है।
इतना सुपरिचित यह 'मैं' है, पर कितना अज्ञात भी है! इससे अधिक रहस्यमय शब्द मानवीय भाषा में दूसरा नहीं है।
जीवन बीत जाता है, पर 'मैं' का रहस्य शायद उघड़ पाता हो!
यह 'मैं' कौन है? इसे अस्वीकार करना भी संभव नहीं है। निषेध में भी यह प्रस्तावित हो जाता है। 'मैं नहीं हूं' कहने में भी वह उपस्थित हो जाता है। मानवीय बोध में यह 'मैं' सबसे सुनिश्चित और अंसदिग्ध तत्व है।
'मैं हूं'- यह बोध तो है, पर 'मैं कौन हूं?'- यह सहज ज्ञान नहीं है। इसे जानना साधना से ही सुलभ है। समस्त साधना 'मैं' को जानने की साधना है। समस्त धर्म, समस्त दर्शन इस एक प्रश्न के ही उत्तर हैं।
'मैं कौन हूं?' इसे प्रत्येक को अपने से पूछना है। सब छूट जाए और एक प्रश्न ही रह जाये। सारे मन पर गूंजती यह एक जिज्ञासा रह जाये। तो ऐसा यह प्रश्न अचेतन में उतर जाता है। प्रश्न जैस-जैसे गहरा होने लगता है, वैसे-वैसे सतही तादात्म्य टूटने लगते हैं। दिखने लगता है कि मैं शरीर नहीं हूं। दिखने लगता है कि मैं मन नहीं हूं। दिखने लगता है कि मैं तो वह हूं, जो सबको देख रहा है। द्रष्टा हूं मैं, साक्षी हूं मैं। यह अनुभूति 'मैं' के वास्तविक स्वरूप का दर्शन बन जाती है। शुद्ध-बुद्ध, द्रष्टा-चेतना का साक्षात हो जाता है।
इस सत-ज्ञान के उदय से जीवन के रहस्य का द्वार खुलता है। अपने से परिचित होकर हम जगत के समस्त रहस्य से परिचित हो जाते हैं। 'मैं' का ज्ञान ही प्रभु का ज्ञान बन जाता है। इसलिए कहता हूं कि यह 'मैं' बहुमूल्य है। इसकी परिपूर्ण गहराई में उतर जाना, सब-कुछ पा लेना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शून्य ही हमारा स्वरूप है

संध्या रुकी सी लगती है। पश्चिमोन्मुख सूरज देर हुए बादलों में छुप गया है, पर रात्रि अभी नहीं हुई है। एकांत है- बाहर भी, भीतर भी। अकेला हूं- कोई बाहर नहीं है, कोई भीतर नहीं है।मैं इस समय कहीं भी नहीं हूं या कि वहां हूं, जहां शून्य है। और जब मन शून्य होता है, तो होता ही नहीं है।यह मन अद्भुत है। प्याज की गांठ की तरह अनुभव होता है। एक दिन प्याज को देख कर यह स्मरण आया था। उसे छीलता था, छीलता गया-परतो पर परतें निकलती गयीं और फिर हाथ कुछ भी न बचा। मोटी खुदरी परतें, फिर मुलायम चिकनी परतें और फिर कुछ भी नहीं। मन भी ऐसा ही है : उघाड़ते चलें-स्थूल परतें, फिर सूक्ष्म परतें, फिर शून्य। विचार, वासनाएं और अहंकार और बस, फिर कुछ भी नहीं है, फिर शून्य है। इस शून्य को उघाड़ लेने को ही मैं ध्यान कहता हूं।यह शून्य ही हमारा स्वरूप है। वह जो अंतत: शेष बचा रहता है, वही स्वरूप है। उसे आत्मा कहें, चाहे अनात्मा। शब्द से कुछ अर्थ नहीं है। विचार, वासना, अहंकार जहां नहीं है, वहीं वह है-'जो है।'ह्यूम ने कहा : जब भी मैं अपने में जाता हूं, कोई 'मैं' मुझे वहां नहीं मिलता है, 'या तो विचार से टकराता हूं, या किसी वासना से या किसी स्मृति से। पर स्वयं से कोई मिलना नहीं होता है।' यह बात ठीक ही है। पर ह्यूम परतों ही से लौट आते हैं। यही उनकी भूल है। वे थोड़ा और गहरे जाते, तो वहां पहुंच जाते जहां कि टकराने को कुछ भी नहीं है। वही है स्वरूप। जहां टकराने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता है, वहां वह है, जो मैं हूं। उस शून्य पर ही सब खड़ा है, पर यदि कोई सतह से ही लौट आये, तो उससे परिचय नहीं हो पाता है। सतह पर संसार है, केंद्र में स्व है। सतह पर सब है, केंद्र पर शून्य है।(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

स्वयं में डूबो

एक राजा ने किसी सामान्यत: स्वस्थ और संतुलित व्यक्ति को कैद कर लिया था- एकाकीपन का मनुष्य पर क्या प्रभाव होता है, इस अध्ययन के लिए। वह व्यक्ति कुछ समय तक चीखता रहा चिल्लाता रहा। बाहर जाने के लिए रोता था, सिर पटकता था- उसकी सारी सत्ता जो बाहर थी। सारा जीवन तो 'पर' से अन्य बंधा था। अपने में तो वह कुछ भी नहीं था। अकेला होना न होने के ही बराबर था।
वह धीरे-धीरे टूटने लगा। उसके भीतर कुछ विलीन होने लगा, चुप्पी आ गई। रुदन भी चला गया। आंसू भी सूख गये और आंखें ऐसे देखने लगीं, जैसे पत्थर हों। वह देखता हुआ भी लगता जैसे नहीं देख रहा है।
दिन बीते, वर्ष बीत गया। उसकी सुख सुविधा की सब व्यवस्था थी। जो उसे बाहर उपलब्ध नहीं था, वह सब कैद में उपलब्ध था। शाही आतिथ्य जो था! लेकिन वर्ष पूरे होने पर विशेषज्ञों ने कहा, 'वह पागल हो गया है।'
ऊपर से वह वैसा ही था। शायद ज्यादा ही स्वस्थ था, लेकिन भीतर?
भीतर एक अर्थ में वह मर ही गया था।
मैं पूछता हूं : क्या एकाकीपन किसी को पागल कर सकता है? एकाकीपन कैसे पागल करेगा? वस्तुत: पागलपन तो पूर्व से ही है। बाह्य संबंध उसे छिपाये थे। एकाकीपन उसे अनावृत कर देते हैं।
मनुष्य को भीड़ में खोने की अकुलाहट उससे बचने के लिए ही है।
प्रत्येक व्यक्ति इसलिए ही स्वयं से पलायन किये हुए है। पर यह पलायन स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है। तथ्य को न देखना, उससे मुक्त होना नहीं है। जो नितांत एकाकीपन में स्वस्थ और संतुलित नहीं है, वह धोखे में है। यह आत्मवंचन कभी न कभी खंडित होगी ही और वह जो भीतर है, उसे उसकी परिपूर्ण नग्नता में जानना होगा। यह अपने आप अनायास हो जाए, तो व्यक्तित्व छिन्न-भिन्न और विक्षिप्त हो जाता है। जो दमित है, वह कभी न कभी विस्फोट को भी उपलब्ध होगा।
धर्म इस एकाकीपन में स्वयं उतरने का विज्ञान है। क्रमश: एक-एक परत उघाड़ने पर अद्भुत सत्य का साक्षात होता है। धीरे-धीरे ज्ञात होता है कि वस्तुत: हम अकेले ही हैं। गहराई में, आंतरिकता के केंद्र पर प्रत्येक एकाकी है। परिचित होते ही भय की जगह अभय और आनंद ले लेता है। एकाकीपन के घेरे में स्वयं सच्चिदानंद विराजमान है।
अपने में उतरकर स्वयं प्रभु को पा लिया जाता है। इससे कहता हूं- अकेलेपन से, अपने से भागो मत, वरन अपने में डूबो। सागर में डूब कर ही मोती पाये जाते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)