प्रकृति ही परमात्मा

मैं प्रकृति में ही परमात्मा को देखता हूं। प्रतिक्षण, प्रतिघड़ी उसका मुझे अनुभव हो रहा है। एक श्वास भी ऐसी नहीं आती-जाती है, जब उससे मिलना न हो जाता हो। जहां भी आंख पड़ती है, देखता हूं कि वह उपस्थित है और जहां भी कान सुनते हैं, पाता हूं कि उसका ही संगीत है।
वह तो सब जगह है, केवल उसे देखने भर की बात है। वह तो है, पर उसे पकड़ने के लिए आंख चाहिए। आंख के आते ही सब दिशाओं में और सब समय उपस्थित हो जाता है।
रात्रि में आकाश जब तारों से भर जाए, तो उन तारों को सोचों मत, देखो और केवल देखो। विचार न हो और मात्र दर्शन हो, तो एक बड़ा राज ,खुल जाता है और प्रकृति के द्वार से उस रहस्य में प्रवेश होता है, जो कि परमात्मा है। प्रकृति परमात्मा के अवतरण से ज्यादा कुछ भी नहीं है और जो उसके घूंघट को उठाना जानते हैं, वे ही केवल जीवन के सत्य से परिचित हो पाते हैं।
सत्य का एक युवा खोजी किसी सद्गुरु के पास था। उसने जाकर पूछा, 'मैं सत्य को जानना चाहता हूं, मैं धर्म को जानना चाहता हूं। कृपा करें और मुझे बतायें कि मैं कहां से प्रारंभ करूं?' सद्गुरु ने कहा, 'क्या पास ही पर्वत से गिरते जलप्रपात की ध्वनि सुनाई पड़ रही है?' युवक ने कहा, 'मैं तो उसे भली-भांति सुन रहा हूं।' सद्गुरु बोले, 'तब वहीं से प्रारंभ करो, वहीं से प्रवेश करो। वही द्वार है।'
सच ही प्रवेश द्वार इतना ही निकट है- पहाड़ से गिरते झरनों में, हवाओं में डोल रहे वृक्षों के पत्तों में, सागर पर नाच रही सूरज की किरणों में। पर हर प्रवेश द्वार पर पर्दा है और बिना उठाये वह उठता नहीं है। वस्तुत: वह पर्दा प्रवेश-द्वारों पर नहीं है, वह हमारी दृष्ट पर ही है और इस भांति एक परदे ने अनंत द्वारों पर परदा कर दिया है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

दिव्य प्यास

कल एक जगह बोला हूं।
कहा मैं तुम्हें असंतुष्ट करना चाहता हूं। एक दिव्य प्यास, एक अलौकिक अतृप्ति सब में पैदा हो, यही मेरी कामन है। मनुष्य जो है, उसमें तृप्त रह जाना मृत्यु है। मनुष्य विकास का अंत नहीं है। एक विकास-सोपान है। जो उसमें प्रकट है, वह अप्रकट की तुलना में कुछ भी नहीं है। जो वह है, वह उसकी तुलना में जो कि वह हो सकता है, कुछ न होने के बराबर ही है।
धर्म, तृप्ति की मृत्यु से, प्रत्येक को अतृप्ति के जीवन में जगाना चाहता है। क्योंकि उस अतृप्ति से ही उस बिंदु तक पहुंचना हो सकता है, जहां कि वास्तविक संतृप्ति है।
मनुष्य को मनुष्यता का अतिक्रमण करना है।
यह अतिक्रमण ही उसे दिव्यता में प्रवेश देता है।
यह अतिक्रमण कैसा होगा? एक परिभाषा को समझें, तो अतिक्रमण की प्रतिक्रिया भी समझ में आ जाती है।
पशुता- विचार-प्रकिया के पूर्व की स्थिति।
मनुष्यता- विचार-प्रक्रिया की स्थिति।
दिव्यता - विचार-प्रक्रिया के अतीत की स्थिति।
विचार-प्रक्रिया के घेरे के पार चलें, तो चेतना दिव्यता में पहुंच जाती है।
विचार-प्रक्रिया को पार करना मनुष्यता का अतिक्रमण कर जाना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

आनंद और दुख


सुबह एक पत्र मिला है। किसी ने उसमें पूछा है कि जीवन दुख में घिरा है, फिर भी आप आनंद की बात कैसे करते हैं? जो है, उसे देखें तो आनंद की बात कल्पना प्रतीत होती है।
निश्चय ही जीवन दुख में घिरा है, चारों ओर दुख है; पर जो घिरा है, वह दुख नहीं है। जब तक जो घेरे है, उसे देखते रहेंगे, दुख ही मालूम होगा; पर जिस क्षण उसे देखने लगेंगे, जो घिरा है, तो उसी क्षण दुख असत्य हो जाता है।
कुल-दृष्टिं परिवर्तन की बात है। जो दृष्टिं दृष्टा को प्रकट कर देती है, वही दृष्टिं है। शेष सब अंधापन है। दृष्टा के प्रकट होते ही सब आनंद हो जाता है, क्योंकि आनंद उसका स्वरूप है। जगत फिर भी रहता है, पर दूसरा हो जाता है। आत्म-अज्ञान के कारण उसमें जो कांटे मालूम हुए थे, वे अब कांटे नहीं मालूम होते हैं।
दुख की सत्ता वास्तविक नहीं है, क्योंकि परावर्ती अनुभव से वह खंडित हो जाती है। जागने पर जैसे स्वप्न अवास्तविक हो जाता है, वैसे ही स्व-बोध पर दुख खो जाता है।
आनंद सत्य है, क्योंकि वह स्व है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ज्ञान और शील

जीवन साधना में बीज क्या है और फल क्या है, यह जानना अत्यंत अनिवार्य है। प्रारंभ और परिणाम को पहचानना अनिवार्य है। कार्य और कारण को न जाने हुए जो चलता है, वह भूल करता है। केवल चलना ही पर्याप्त नहीं है। अकेले चलने से ही कोई नहीं पहुंचता है। दिशा और साधना-विधि का सम्यक होना जरूरी है।
साधना में केंद्रीय भी कुछ है, परिधिगत भी है। केंद्र पर प्रयास हो तो परिधि अपने से संभल जाती है। उसे पृथक संभालने का कारण नहीं है। वह केंद्र की ही अभिव्यक्ति है, वह फैल हुआ केंद्र है। इससे परिधि पर प्रयास व्यर्थ होते हैं। एक कहावत है- झाड़ी के आसपास पीटना! परिधि पर उलझना ऐसा ही है।
क्या है केंद्र, क्या है परिधि?
ज्ञान केंद्र है, शील परिधि है। ज्ञान प्रारंभ है, शील परिणाम है। ज्ञान बीज है, शील फल है। पर साधारणत: लोग का चलना विपरीत है। शील से चलकर वे ज्ञान पर पहुंचना चाहते हैं। शील को वे ज्ञान में परिणित करना चाहते हैं।
पर शील अज्ञान से पैदा नहीं किया जा सकता। शील पैदा ही नहीं किया जा सकता। पैदा किया हुआ शील, शील नहीं है। वह मिथ्या आवरण है, जिसके तले कुशील दब जाता है। चेष्टिंत शील वंचना है।
अंधेरे को दबाना-छिपाना नहीं है। उसे मिटाना है। कुशील पर शील के कागजी फूल नहीं चिपकाने हैं। उसे मिटाना है। जब वह नहीं है, तब जो आता है, वह शील है।
अज्ञान से जबरदस्ती लाया गया शील घातक है, क्योंकि उसमें जो नहीं है, वह ज्ञात होता है कि है। इस भांति जिसे लाना है, उसका आंख से ओझल हो जाना हो जाता है।
अज्ञान में सीधे शील लाने का कोई उपाय भी नहीं है, क्योंकि अज्ञान की अभिव्यक्ति ही कुशील है। कुशीलता अज्ञान ही है। बुद्ध ने कहा है, 'अण्णाणी किं काही?' जो अज्ञान में है, वह क्या कर सकता है?
शील नहीं, ज्ञान लाना है। ज्ञान ही शील बन जाता है।
ज्ञान सर्व को प्रकाशित करता है। उसके उदय से ही अज्ञान और मोह का नाश होता है। उससे ही राग और द्वेष का क्षय होता है। उससे ही मुक्ति दशा उपलब्ध होती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जीवन एक बांसुरी

रात्रि के इस सन्नाटे में कोई बांसुरी बजा रहा है। चांदनी जम गयी-सी लगती है। सर्द एकांत रात्रि और दूर से आते बांसुरी के स्वर। स्वप्न सा मधुर! विश्वास न हो, इतना सुंदर है, यह सब।
एक बांस की पोंगरी कितना अमृत बरसा सकती है!
जीवन भी बांसुरी की भांति है। अपने में खाली और शून्य, पर साथ ही संगीत की अपरिसीम साम‌र्थ्य भी उसमें है।
पर सब कुछ बजाने वाले पर निर्भर है। जीवन वैसा ही हो जाता है, जैसा व्यक्ति उसे बनाता है। वह अपना ही निर्माण है। यह तो एक अवसर मात्र है- कैसा गीत कोई गाना चाहता है, यह पूरी तरह उसके हाथों में है। मनुष्य की महिमा यही है कि वह स्वर्ग और नर्क दोनों के गीत गाने को स्वतंत्र है।
प्रत्येक व्यक्ति दिव्य स्वर अपनी बांसुरी से उठा सकता है। बस थोड़ी सी उंगलियां भर साधने की बात है। थोड़ी सी साधना और विराट उपलब्धि है। न-कुछ करने से ही अनंत आनंद का साम्राज्य मिल जाता है।
मैं चाहता हूं कि एक-एक हृदय में कह दूं कि अपनी बांसुरी को उठा लो। समय भागा जा रहा है, देखना कहीं गीत गाने का अवसर बीत न जाए! इसके पहले कि परदा गिरे, तुम्हें अपना जीवन-गीत गा लेना चाहिए।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मन और शांति


''मनुष्य का मन अद्भुत है। वही है, रहस्य संसार का और मोक्ष का। पाप और पुण्य, बंधन और मुक्ति, स्वर्ग और नर्क सब उसमें ही समाया हुए हैं। अंधेरा और प्रकाश सब उसी का है। उसमें ही जन्म है, उसमें ही मृत्यु है। वही है द्वार बाह्य जगत का, वही है सीढ़ी अंतस की। उसका ही न हो जाना दोनों के पार हो जाना हो जाता है।
मन सब कुछ है। सब उसकी लीला और कल्पना है। वह खो जाए, तो सब लीला विलीन हो जाती है।''
कल यही कहा था। कोई पूछने आया, 'मन तो बड़ा चंचल है, वह खोये कैसे? मन तो बड़ा गंदा है, वह निर्मल कैसे हो?'
मैंने फिर एक कहानी कही : बुद्ध जब वृद्ध हो गये थे, तब एक दोपहर एक वन में एक वृक्ष तले विश्राम को रुके थे। उन्हें प्यास लगी तो आनंद पास की पहाड़ी झरने पर पानी लेने गया था। पर झरने से अभी-अभी गाड़ियां निकली थी और उसका सब पानी गंदा हो गया था। कीचड़ ही कीचड़ और सड़े पत्ते उसमें उभर कर आ गये थे। आनंद उसका पानी बिना लिए लौट आया। उसने बुद्ध से कहा, 'झरने का पानी निर्मल नहीं है, मैं पीछे लौट कर नदी से पानी ले आता हूं।' नदी बहुत दूर थी। बुद्ध ने उसे झरने का पानी ही लाने को वापस लौटा दिया। आनंद थोड़ी देर में फिर खाली लौट आया। पानी उसे लाने जैसा नहीं लगा। पर बुद्ध ने उसे इस बार भी वापस लौटा दिया। तीसरी बार आनंद जब झरने पर पहुंचा, तो देखकर चकित हो गया। झरना अब बिलकुल निर्मल और शांत हो गया था, कीचड़ बैठ गयी थी और जल बिलकुल निर्मल हो गया था।
यह कहानी मुझे बड़ी प्रीतिकर है। यही स्थिति मन की भी है। जीवन की गाड़ियां उसे विक्षुब्ध कर जाती हैं। पर कोई यदि शांति और धीरज से उसे बैठा देखता है रहे, तो कीचड़ अपने से नीचे बैठ जाती है और सहज निर्मलता का आगमन हो जाता है। केवल धीरज की बात है और शांति प्रतीक्षा की और 'बिना कुछ किये' मन की कीचड़ बैठ सकती है।
केवल साक्षी होना है और मन निर्मल हो जाता है। मन को निर्मल करना नहीं होता है। करने से ही कठिनाई बन जाती है। उसे तो केवल किनारे पर बैठ कर देखें और फिर देखें कि क्या होता है!
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रेम और प्रतीक्षा


मैं माली को बीज बोते देखता हूं। फिर, वह खाद देता है। पानी देता है और फूलों के आने की प्रतीक्षा करता है। फूल खींचकर जबरदस्ती पौधों में नहीं निकाले जाते हैं। उनकी तो धीरज से प्रतीक्षा करनी होती है।
प्रेम और प्रतीक्षा।
ऐसे ही प्रभु के बीज भी बोने होते हैं। ऐसे ही दिव्य जीवन के फूलों को खिलने की भी राह देखनी होती है।
प्रार्थना और प्रतीक्षा।
जो इसके विपरीत चलता है और अधैर्य प्रकट करता है, वह कहीं भी नहीं पहुंच पाता है। अधैर्य उस विकास के लिए अच्छी खाद नहीं है।
शांति से, धैर्य से और प्रीति से प्रतीक्षा करने पर किसी सुबह अनायास ही फूल खिल जाते हैं, और उनकी गंध जीवन के आंगन को सुवासित कर देती है।
अनंत के फूलों के लिए अनंत प्रतीक्षा अपेक्षित है। पर यह स्मरण रहे कि जो उतनी प्रतीक्षा के लिए तत्पर होता है, उसकी प्राप्ति का समय तत्क्षण आ जाता है। अनंत धैर्य ही अनंत पाने की एक मात्र शर्त है। उस शर्त के पूरा होते ही वह उपलब्ध हो जाता है। उसे कहीं बाहर से थोड़ा ही आना है। वह तो भीतर का ही विकास है। वह तो मौजूद ही है। पर अधैर्य और अशांति के कारण हम उसे नहीं देख पाते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)