'मैं' के भीतर झांको ब्रह्म मिलेगा


एक सूफी गीत है- प्रेयसी के द्वार पर किसी ने दस्तक दी। भीतर से आवाज आयी, 'कौन है?' जो द्वार के बाहर खड़ा था, उसने कहा, 'मैं हूं।' प्रत्युत्तर में उसे सुनाई पड़ा, 'यह गृह 'मैं' और 'तू' दो को नहीं संभाल सकता है।'
और बंद द्वार बंद ही रहा। प्रेमी वन में चला गया। उसने तप किया, उपवास किये, प्रार्थनाएं कीं। बहुत सालों के बाद वह लौटा और पुन: उसने वही द्वार खटखटाया। दुबारा वही प्रश्न, 'बाहर कौन है?'
पर इस बार द्वार खुल गए, क्योंकि उसका उत्तर दूसरा था। उसने कहा, 'तू ही है।'
यह उत्तर कि 'तू ही है' समस्त धर्म का सार है। जीवन के अनंत-असीम प्रवाह पर 'मैं' की गांठ ही बंधन है। 'मैं' व्यक्ति को सत्ता से तोड़ देता है। 'मैं' बुदबुदा सत्ता-प्रवाह से अपने को भिन्न समझ बैठता है। जबकि बुदबुदे की अपनी कोई सत्ता नहीं है। उसका कोई केंद्र और अपना जीवन नहीं है। वह सागर ही है। सागर ही उसका जीवन है। 'मैं' के भीतर झांको तो ब्रह्मं मिल जाता है।
'मैं' जहां नहीं है, वहां वस्तुत: 'तू' भी नहीं है। वहां केवल 'होना' मात्र है। केवल अस्तित्व है, शुद्ध सत्ता है। इस शुद्ध सत्ता में जागना निर्वाण है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर विचार प्रेषित किए है।धन्यवाद।