आत्मज्ञान ही मोक्ष है

मैं तुम्हें देखता हूं : तुम्हारे पार जो है, उसे भी देखता हूं।
शरीर पर जो रुक जाएं वे आंखें देखती ही नहीं हैं। शरीर कितना पारदर्शी है! सच ही, देह कितनी ही ठोस क्यों न हो, उसे तो नहीं ही छिपा पाती है, जो कि पीछे है।
पर, आंखें ही न हों, तो दूसरी बात है। फिर तो सूरज भी नहीं है। सब खेल आंखों का है। विचार और तर्क से कोई प्रकाश को नहीं जानता है।
वास्तविक आंख की पूर्ति किसी अन्य साधन से नहीं हो सकती है। आंख चाहिए। आत्मिक को देखने के लिए भी आंख चाहिए, एक अंतर्दृष्टि चाहिए। वह है, तो सब है। अन्यथा, न प्रकाश है, न प्रभु है।
जो दूसरे की देह के पार की सत्ता को देखना चाहे, उसे पहले अपनी पार्थिव सत्ता के अतीत झांकना होता है।
जहां तक मैं अपने गहरे में देखता हूं, वहीं तक अन्य देहें भी पारदर्शी हो जाती हैं।
जितनी दूर तक मैं अपनी जड़ता में चैतन्य का आविष्कार कर लेता हूं, उतनी ही दूर तक समस्त जड़ जगत मेरे लिए चैतन्य से भर जाता है। जो मैं हूं, जगत भी वही है। जिस दिन मैं समग्रता में अपने चैतन्य को जान लूं, उसी दिन जगत नहीं रह जाता है।
स्व-अज्ञान संसार है; आत्मज्ञान मोक्ष है।
यही रोज कह रहा हूं, यही प्रत्येक से कह रहा हूं : एक बार देखो कि कौन तुम्हारे भीतर बैठा हुआ है? इस हड्डी-मांस की देह में कौन आच्छादित है? कौन है, आबद्ध तुम्हारे इस बाह्य रूप में?
इस क्षुद्र में कौन विराट विराजमान है?
कौन है, यह चैतन्य? क्या है, यह चैतन्य?
यह पूछे बिना, यह जाने बिना जीवन सार्थक नहीं है। मैं सब कुछ जान लूं, स्वयं को छोड़कर, तो उस ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है।
जिस शक्ति से 'पर' जाना जाता है, वह शक्ति स्वयं को भी जानने में समर्थ है। जो अन्य को जान सकती है, वह 'स्वयं' को कैसे नहीं जानेगी!
केवल दिशा-परिवर्तन की बात है।
जो दिख रहा है, उससे उस पर चलना है, जो कि देख रहा है। दृश्य से दृष्टा पर ध्यान परिवर्तन आत्म-ज्ञान की कुंजी है।
विचार प्रवाह में से उस पर जागो, जो उनका भी साक्षी है।
तब एक क्रांति घटित हो जाती है। कोई अवरुद्ध झरना जैसे फूट पड़ा हो, ऐसे ही चैतन्य की धारा जीवन से समस्त जड़ता को बहा ले जाती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

1 comment:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

भाई साहब!
ओशो के इस प्रवचन को शुरू से लेकर अंत तक ज़रा होलियाना मूड में पढ़कर देखें.