सत्य एक है


-क्रांतिबीज का अंतिम बीज-
सत्य के मार्ग पर वह व्यक्ति है, जिसने सारे मतों को तिलांजलि दे दी है। जिसका कोई पक्ष है और कोई मत है, सत्य उसका नहीं हो सकता। सब पक्ष मनुष्य-मन से निर्मित हैं। सत्य का कोई पक्ष नहीं है और इसलिए जो निष्पक्ष होता है, पक्ष शून्य होता है, वह सत्य की ओर जाता है और सत्य उसका हो जाता है। इसलिए किसी पक्ष को न चाहो, किसी संप्रदाय को न चाहो, किसी 'दर्शन' को न चाहो। चित्त को उस स्थिति में ले चलो, जहां सब पक्ष अनुपस्थित हैं। उसी बिंदु पर विचार मिटता और दर्शन प्रारंभ होता है। आंखें जब पक्ष-मुक्त होती हैं, तो वे 'जो है' उसे देखने में समर्थ हो पाती हैं। वास्तविक धार्मिक व्यक्ति वही है, जिसने सब धर्म छोड़ दिये हैं, जिसका अपना कोई धर्म नहीं है। और इस भांति धर्मो को छोड़कर वह 'धर्म' हो जाता है। मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं किस धर्म का हूं? में कहता हूं कि मैं धर्म का तो हूं, पर किसी 'धर्म' का नहीं हूं। धर्म भी अनेक हो सकते हैं, यह मेरी अनुभूति में नहीं आता है! विचार भेद पैदा करते हैं, पर विचार से तो कोई धर्म में नहीं पहुंचता है। धर्म में पहुंचना तो निर्विचार से होता है और निर्विचार में तो कोई भेद नहीं है। समाधि एक है और समाधि में जो सत्य ज्ञान होता है, वह भी एक ही है। सत्य एक है, पर मत अनेक हैं। मतों की अनेकता में जो एक को चुनता है, वह सत्य के आने के लिए अपने ही हाथों द्वार बंद कर देता है। मतों को मुक्त करो और मतों से मुक्त हो जाओ और सत्य के लिए द्वार दो : यही मेरी शिक्षा है। समुद्र के नमक का स्वाद पूरब और पश्चिम में एक है और जल के वाष्पिभूत होने के नियम भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न- भिन्न नहीं हैं, जनम और मृत्यु की श्रंखला मेरे लिए अलग और आप के लिए अलग नहीं है, फिर अंतस-सत्ता कैसे अनेक नियमों और सत्यों से परिचालित हो सकती है! आत्मा में कोई भूगोल नहीं है और न दिशाओं के कोई भेद हैं और न कोई सीमाएं हैं। भेद मात्र मन के हैं और जो मन के भेदों में विभाजित है, वह आत्मा के अभेद को उपलब्ध नहीं हो सकता है। मैं सुबह घूमकर लौट रहा था, तो एक पक्षी को पिंजड़े में बंद देखा। उसे देख मुझे पक्षों में बंद लोगों की याद आयी। पक्ष भी पिंजड़े हैं- बहुत सूक्ष्म, अपने हाथों से निर्मित। उन्हें कोई और नहीं, हम स्वयं ही बना लेते हैं। वे अपने ही हाथों से बनाये गये कारागृह हैं। हम स्वयं उन्हें बनाते हैं और फिर उनमें बंद हो कर सत्य के मुक्त आकाश में उड़ने की सारी क्षमता खो देते हैं। और, अभी मैं देख रहा हूं आकाश में उड़ती एक चील को। उसकी उड़ान में कितनी स्वतंत्रता है, कितनी मुक्ति है! एक पिंजड़े में बंद पक्षी है ओर एक मुक्त आकाश में उड़न लेता! और दोनों क्या हमारे चित्त की दो स्थितियों के प्रतीक नहीं हैं? आकाश में उड़ता हुआ पक्षी न कोई पदचिह्नं छोड़ता है और न उड़ान का कोई मार्ग ही उसके पीछे बनता है। सत्य का भी ऐसा ही एक आकाश है। जो मुक्त होते हैं, वे उसमें उड़ान लेते हैं, पर उनके पीछे पदचिह्नं नहीं बनते हैं और न कोई मार्ग ही निर्मित होते हैं। इसलिए स्मरण रहे कि सत्य के लिए बंधे-बंधाये मार्ग की तलाश व्यर्थ है। ऐसा कोई मार्ग नहीं है और यह शुभ ही है, क्योंकि बंधे मार्ग किसी बंधन तक ही पहुंचा सकते थे, वे मुक्त कैसे करा सकते हैं! सत्य के लिए प्रत्येक को अपना मार्ग स्वयं ही बनाना होता है और कितना सुंदर है। जीवन पटरियों पर चलती हुई गाडि़यों की तरह नहीं है, सुंदर पर्वतों से सागर की ओर दौड़ती हुई सरिताओं की भांति है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

3 comments:

Udan Tashtari said...

जय हो!! क्या कहूँ कि किस विधि कहूँ आभार तुम्हारा!!

mahendra mishra said...

बहुत सुंदर पढ़कर अच्छा लगा . आभार

diwakar......SUN said...

dhanyawad
bahut accha post hai.