प्रात:कालीन ध्यान विधियां- सक्रिय ध्यान

प्रथम चरण : दस मिनट
नाक से तेजी से श्वास भीतर लें और बाहर छोड़ें। श्वास भीतर लेने और बाहर छोड़ने- दोनों पर जोर लगाएं और उन्हें अराजक बना रहने दें। श्वास फेफड़ों में गहराई से जाए। श्वास लेने और छोड़ने में तेजी लाएं, लेकिन निश्चित रहे कि श्वास गहरी बनी रहे। इसे यथाशक्ति अपनी अधिकतम समग्रता से करें- बिना अपने शरीर को तनाव पूर्ण बनाए। और, पक्का कर लें कि कंधे और गर्दन शिथिल अवस्था में हैं। श्वास जारी रखें जब तक कि आप श्वास ही श्वास न हो जाएं; श्वास को अराजक और अस्तव्यस्त बना रहने दें। अर्थात श्वास न लयबद्ध और न ही किसी पूर्वनिर्धारित नियम पर आधारित हो। एक बार ऊर्जा जग जाए, फिर शरीर को भी गति देने लगेगी। इन शारीरिक गतियों को होने दें; इन्हें और अधिक ऊर्जा निर्मित होने में सहायक होने दें। अपने हाथों और शरीर को सहज रूप से गति करने दें, ताकि वे ऊर्जा के उठने में सहयोगी बन सकें। ऊर्जा को उठता हुआ अनुभव करें। पहले चरण में अपने को जरा भी ढीला मत छोड़े और श्वास को जरा भी धीमा मत होने दें।
दूसरा चरण : दस मिनट
अपने शरीर को पूरी तरह छोड़ दें। अपने शरीर को स्वतंत्रता दें कि वह जो कुछ करना चाहे, कर सके ..विस्फोट हो जाने दें ..अपने शरीर को आविष्ट हो जाने दें। जो कुछ भी भीतर से बाहर आए, उसे रोकें नहीं। पूरी तरह से पागल हो जाएं ..गाएं, चीखें, हंसे, चिल्लाएं, रोएं, कूदें, कांपें, नाचें, हाथ-पैर चलाएं और शरीर को सब दिशाओं में गति करने दें। शुरू में थोड़ा सा अभिनय प्रक्रियाओं को गति देने में सहायक होता है। जो भी हो रहा है, उसमें अपने मन को दखल न डालने दें। स्मरण रखें कि आप आने शरीर के साथ समग्रता से सहयोग कर रहे हैं।
तीसरा चरण : दस मिनट
कंधे और गर्दन को ढीला रखते हुए अपने दोनों हाथ पूरी तरह से ऊपर उठाएं, कोहनियां शिथिल रहें, दोनों हाथ ऊपर उठाए हुए हू! ..हू! ..हू! मंत्र का जोरों से उच्चार करते हुए ऊपर उछलें, नीचे आएं। 'हू' का उच्चार अधिकतम गहरा हो और वह आपकी नाभि से उठे। हर बार जब आप नीचे आएं तब पैर के तलवे और एड़ी को धीमे से जमीन को छूने दें और उसी समय 'हू' की तीव्र ध्वनि से काम-केंद्र पर गहराई से चोट करें। इस चरण में अपनी पूरी शक्ति लगाएं; थोड़ी भी शक्ति शेष न बचाएं।
चौथा चरण : पंद्रह मिनट
रुक जाएं। जहां भी हैं, जैसे भी हैं, बिलकुल जम जाएं। शरीर को जरा भी व्यवस्थित न करें। जरा सी खांसी, कोई भी गति, कोई भी हलन-चलन ऊर्जा को क्षीण करेगी और अब तक की मेहनत को खराब करेगी। जो भी हो रहा है, उसके साक्षी बने रहें।
पांचवां चरण : पंद्रह मिनट
उत्सव मनाएं। संगीत और नृत्य के साथ अपने अंतस के अहोभाव को अभिव्यक्त करें। फलित हुई जीवंतता को दिन भर की अपनी चर्या में फैलने दें।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ऊर्जा का वर्तुल : अमृत साधना
यह एक वैज्ञानिक ओशो ध्यान विधि है -- जब आप आईने के सामने खड़े होंे, पहले अपने प्रतिबिंब को देखें ः आप देख रहे हैं और प्रतिबिंब दिख रहा है। फिर इस प्रक्रिया को उलटा देंे। ऐसा महसूस करें कि आप प्रतिबिंब हैं और प्रतिबिंब आपको देख रहा है। तत्क्षण आप देखेंेगे कि बदलाव हो रहा है, सघन ऊर्जा आपकी तरफ आ रही है।
यदि थोड़े दिन आप इसे करते हैं तो चकित होओगे कि सारे दिन कितना जीवंत महसूस करने लगे हैं। जहां कहीं वर्तुल पूरा होता है वहीं गहन मौन होता है। अधूरा वर्तुल बैचेनी पैदा करता है। जब वर्तुल पूरा हो जाता तो यह विश्राम पैदा करता है, यह आपको केंद्रित करता है। और केंद्रित होना ऊर्जावान बनाता है--और वह ऊर्जा आपकी ही है। यह तो मात्र एक प्रयोग है; फिर आप कई आयामों से प्रयास कर सकते हैंे।
जब आप गुलाब के फूल को देखेंगे, पहले कुछ पल गुलाब को देखें, और तब उल्टी प्रक्रिया प्रारंभ करें ः गुलाब का फूल आपको देख रहा है। आप आश्चर्यचकित होओगे कि गुलाब का फूल कितनी ऊर्जा आपको दे सकता है। और यही वृक्षों के साथ, और तारों के साथ और लोगों के साथ किया जा सकता है।

4 comments:

Udan Tashtari said...

प्रिन्ट करके चेंप लिया है. बहुत आभार.

Anonymous said...

great work

nkdwivedi said...

Adbhut prayog hai,Dhanyavad Dwivedi N.K.

somnath sarkale said...

lot of thanks