प्रेम करना सीखो-अंतिम


गतांक से  आगे
प्रेम करना सीखो। विवाह की जल्दी मत करो, प्रेम करना सीखो। सबसे पहले एक महान प्रेमी बन जाओ।

और आवश्यकता क्या है? आवश्यकता यह है कि एक महान प्रेमी हमेशा प्रेम देने के लिए तैयार है और इसकी परवाह नहीं करता कि वह लौटता है या नहीं। यह हमेशा वापस मिलता है, यह चीजों की प्रकृति में है। यह ऐसा ही है जैसे तुम पहाड़ों के पास जाओ और एक गीत गाओ, और घाटियां जवाब देती हैं। क्या तुमने पहाड़ों में, पहाड़ियों में, इको प्वाइंट को देखा है? तुम चिल्लाओ और घाटियां चिल्लाती हैं, या तुम गाते हो तो घाटियां गाती हैं। हर दिल एक घाटी है। यदि तुम इसमें प्रेम उंडेलो, यह जवाब देगा।
प्रेम का कोई भी अवसर मत खोओ। यहां तक कि एक गली में से गुजरते हुए तुम प्रेमपूर्ण हो सकते हो। यहां तक कि तुम भिखारी के साथ भी प्रेमपूर्ण हो सकते हो। कोई जरूरत नहीं है कि तुम्हें उसे कुछ देना है, तुम कम से कम मुसकुरा सकते हो। इसमें कुछ खर्च नहीं होता लेकिन तुम्हारी मुस्कान तुम्हारे दिल को खोलती है, तुम्हारे दिल को अधिक जीवित बनाती है। किसी का हाथ पकड़ो––चाहे दोस्त हो या अजनबी। इंतजार मत करो कि जब सही व्यक्ति होगा केवल तभी तुम प्रेम करोगे। तो फिर सही व्यक्ति कभी नहीं होगा। प्रेम किए जाओ। जितना अधिक तुम प्रेम करोगे, उतना सही व्यक्ति के आने की संभावना है क्योंकि तुम्हारा हृदय खिलना शुरू होता है। खिलता हुआ हृदय कई मधुमक्खियों, कई प्रेमियों को आकर्षित करता है।
तुम्हें एक बहुत ही गलत तरीके से प्रशिक्षित किया गया है। सबसे पहले, लोग एक गलत धारणा में जीते हैं कि सब लोग पहले से ही प्रेमी हैं। सिर्फ पैदा होने से तुम सोचते हो कि तुम एक प्रेमी हो। यह इतना आसान नहीं है। हां, एक संभावना है, लेकिन संभावना को प्रशिक्षित करना जरूरी है, अनुशासित करना जरूरी है। एक बीज मौजूद है, लेकिन उसका फूल बनना जरूरी है। तुम अपना बीज सम्हाले रहो, कोई मधुमक्खी नहीं आएगी। क्या तुमने कभी मधुमक्खियों को बीज के लिए आते देखा है ? क्या वे नहीं जानतीं कि बीज फूल बन सकता है? लेकिन वे तभी आती हैं, जब बीज फूल बन जाते हैं। एक फूल बनो, बीज मत रहो।
दो लोग, जो अलग-अलग दुखी हैं, एक-दूसरे के लिए अधिक दुख पैदा करते हैं जब वे एक साथ होते हैं। यही गणितीय है। तुम दुखी थे, तुम्हारी पत्नी दुखी थी, और तुम दोनों को उम्मीद है कि एक साथ होने पर तुम दोनों खुश हो जाओगे? यह इतना सरल गणित है जैसे दो और दो चार। इतना सरल है। यह किसी उच्चतर गणित का हिस्सा नहीं है, यह बहुत आम है, तुम इसे अपनी उंगलियों पर गिन सकते हो। तुम दोनों दुखी हो जाओगे।
प्रणय निवेदन एक बात है। प्रणय निवेदन पर निर्भर मत रहो। वास्तव में इससे पहले कि तुम विवाह करो, प्रणय निवेदन से मुक्त हो जाओ। मेरा सुझाव है कि विवाह हनीमून के बाद हो, इससे पहले कभी नहीं होना चाहिए। अगर सब कुछ ठीक हो जाता है, तो ही विवाह होना चाहिए।
विवाह के बाद हनीमून बहुत खतरनाक है। जहां तक मुझे पता है, निन्यानबे प्रतिशत विवाह हनीमून के समय खत्म हो जाते हैं। लेकिन तब तुम फंस चुके होते हो, फिर तुम्हारे पास कोई रास्ता नहीं बचता। फिर तो पूरा समाज, कानून, कोर्ट––हर कोई तुम्हारे खिलाफ है अगर तुम पत्नी को छोड़ दो, या पत्नी तु्म्हें छोड़ दे। फिर सारी नैतिकता, धर्म, पुजारी, सब लोग तुम्हारे खिलाफ हैं। ऐसी व्यवस्था हो कि समाज विवाह के लिए हर तरह की बाधा खड़ी करे और तलाक के लिए कोई बाधा न बनाए। समाज लोगों को इतनी आसानी से विवाह करने की अनुमति न दे तो अच्छा होगा। अदालत को बाधाएं खड़ी करनी चाहिए - कम से कम दो साल के लिए महिला के साथ रहोगे तो ही अदालत तुम्हें विवाह करने के लिए अनुमति दे सकता है।
फिलहाल वे ठीक उल्टा कर रहे हैं। यदि तुम विवाह करना चाहते हो, कोई नहीं पूछता कि क्या तुम तैयार हो या यह सिर्फ एक मन की लहर है , सिर्फ इसलिए कि तुम स्त्री की नाक पसंद करते हो? हद मूर्खता है! कोई एक लंबी नाक के साथ नहीं रह सकता। दो दिनों के बाद नाक भुला दी जाएगी। कौन अपनी पत्नी की नाक को देखता है? पत्नी कभी सुंदर नहीं लगती, पति कभी खूबसूरत नहीं दिखता। एक बार जब तुम परिचित हो जाते हो तो सुंदरता गायब हो जाती है।
दो लोगों को एक साथ लंबे समय के लिए रहने की अनुमति दी जानी चाहिए, वे एक-दूसरे से परिचित हो जाएं, एक दूसरे की पहचान हो जाए। और अगर वे विवाह करना भी चाहते हैं, तो अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। फिर तलाक दुनिया से गायब हो जाएगी। तलाक मौजूद है, क्योंकि विवाह गलत हैं और जबरदस्ती से थोपे जाते हैं। तलाक मौजूद हैं, क्योंकि विवाह एक रोमांटिक मूड में किया जाता है।
रोमांटिक मूड अच्छा है अगर तुम एक कवि हो । और कवियों को अच्छे पति या पत्नियां होते नहीं देखा गया हैं। वास्तव में कवि लगभग हमेशा अविवाहित रहते हैं । वे हर कहीं डोरे डालते हैं लेकिन वे कभी पकड़े नहीं जाते और इसलिए उनका रोमांस जिंदा रहता है। वे कविता लिखते हैं, सुंदर कविता लिखते हैं। किसी स्त्री से या पुरुष से काव्यात्मक मूड में विवाह नहीं करना चाहिए। गद्य भावदशा को आने दो और फिर बस जाओ। क्योंकि रोजमर्रा का जीवन गद्य जैसा अधिक है, कविता की तरह कम। व्यक्ति को भलीभांति परिपक्व हो जाना चाहिए।
परिपक्वता का मतलब है कि व्यक्ति एक रोमांटिक मूर्ख नहीं है। वह जीवन को समझता है, वह जीवन की जिम्मेदारी को समझता है, किसी व्यक्ति के साथ होने की समस्याओं को समझता है। उन सब कठिनाइयों का स्वीकार करता है और फिर भी उस व्यक्ति के साथ रहने का फैसला लेता है। ऐसी उम्मीद नहीं करता कि सिर्फ स्वर्ग ही होने जा रहा है, और गुलाब ही गुलाब होंगे। किसी बकवास की उम्मीद नहीं है; वह जानता है कि वास्तविकता कठोर है। वह ऊबड़-खाबड़ है। गुलाब तो हैं, लेकिन दूर हैं और बीच-बीच में थोड़े से हैं; कांटे कई हैं।
जब तुम इन समस्याओं के प्रति सचेत हो जाओगे और उसके बावजूद तुम तय करोगे कि किसी एक व्यक्ति के साथ रहने की जोखिम लेना सार्थक है बजाय अकेले रहने के, तो विवाह कर लो। तो फिर विवाह प्रेम को कभी नहीं मार सकता, क्योंकि यह प्रेम यथार्थवादी है। विवाह केवल रोमांटिक प्रेम को मार सकते हैं। और रोमांटिक प्रेम वह है जिसे लोग पपी लव, यानी अल्हड़ प्रेम कहते हैं। उस पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसे पोषण नहीं मानना चाहिए। यह आइसक्रीम की तरह ही हो सकता है। तुम इसे कभी-कभी खा सकते हो, लेकिन उस पर निर्भर मत रहो। जीवन को अधिक यथार्थवादी, अधिक गद्य होना चाहिए।
विवाह अपने आपमें कभी कुछ नष्ट नहीं करता। विवाह सिर्फ उसको बाहर लाता है जो तुममें छिपा है, वह उसे उघाड़ता है। यदि प्रेम पीछे छुपा हुआ है, भीतर छिपा हुआ है, तो विवाह उसे बाहर लाता है। अगर प्रेम सिर्फ एक बहाना था, बस एक प्रलोभन, तो देर-अबेर वह गायब हो जाएगा। और फिर तुम्हारी सच्चाई, तुम्हारा कुरूप व्यक्तित्व प्रगट होता है। विवाह केवल एक अवसर है, इसलिए जो भी बाहर आ सकता है वह बाहर आ जाएगा।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि प्रेम ने विवाह को नष्ट कर दिया है। जो लोग प्रेम करना नहीं जानते उनके द्वारा प्रेम नष्ट हो जाता है। प्रेम इसलिए नष्ट होता है क्योंकि पहले तो, प्रेम होता ही नहीं। तुम एक सपने में जी रहे थे। हकीकत वह सपना नष्ट कर देती है। वरना प्रेम अनंत है, अनंतता का हिस्सा है। यदि तुम विकसित होते हो, अगर तुम इस कला को जानते हो, और जीवन की वास्तविकताओं को स्वीकार करते हो, तो यह हर दिन बढ़ता चला जाता है। विवाह प्रेम में विकसित होने का एक जबरदस्त अवसर बन जाता है।
प्रेम को कुछ नष्ट नहीं कर सकता। यदि यह है, तो बढ़ता चला जाता है। लेकिन मेरा मानना है कि प्रेम है ही नहीं। तुमने अपने को गलत समझा; कुछ और वहां था। शायद सेक्स था, सेक्स अपील था। तब तो यह नष्ट होगा ही, क्योंकि एक बार तुमने एक स्त्री को प्रेम किया तो सेक्स अपील गायब हो जाता है, क्योंकि सेक्स अपील अज्ञात के साथ ही होता है। एक बार जब तुम महिला या पुरुष के शरीर को भोग लेते हो है, तो सेक्स अपील गायब हो जाता है। यदि तुम्हारा प्रेम सिर्फ सेक्स अपील था तो यह गायब होगा ही। तो प्रेम को कभी कुछ और मत समझना। अगर प्रेम सच में प्रेम है ...
मेरा क्या मतलब है जब मैं कहता हूं "सच में प्रेम?" मेरा मतलब है कि सिर्फ किसी दूसरे की मौजूदगी में अचानक तुम्हें खुशी होती है, सिर्फ किसी के साथ होने से तुम पर मस्ती छा जाती है। किसी के साथ होने भर से तुम्हारे हृदय में गहरे कुछ परितुष्ट हो जाता है ... तुम्हारे हृदय में कुछ संगीत शुरू होता है, तब तुम्हारा सामंजस्य बनता हैं। दूसरे की उपस्थिति मात्र तुम्हें अधिक अखंड, अधिक केंद्रित बनात, तुम्हारी जड़ें जमीन में गहरी जाती हैं, तो यह प्रेम है।
प्रेम एक जुनून नहीं है, प्रेम एक भावना नहीं है। प्रेम एक बहुत गहरी समझ है कि कोई और किसी तरह तुम्हें पूरा करता है। कोई तुमको एक पूरा वर्तुल बनाता है। किसी अन्य की उपस्थिति तुम्हारी उपस्थिति को बढ़ाती है। प्रेम तुम्हें स्वयं होने की स्वतंत्रता देता है, यह स्वामित्व नहीं है।
तो देखो। सेक्स को कभी प्रेम मत समझना, अन्यथा तुम धोखा खाओगे।
सतर्क रहो, और जब तुम किसी की सिर्फ उपस्थिति, शुद्ध उपस्थिति के साथ महसूस करने लगते हो - और कुछ नहीं, और किसी बात की जरूरत नहीं है, तुम कुछ भी नहीं पूछते - बस उपस्थिति, वह दूसरा तुम्हें प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त है। कुछ तुम्हारे भीतर मुछ खिलना शुरू होता है, हजारों कमल खिलने हैं, तो तुम प्रेम में हो। और फिर तुम सभी कठिनाइयों से गुज़र सकते हो जो कि वास्तविकता पैदा करती है । कई पीड़ाएं, कई चिंताएं - तुम उन सभी से गुज़र जाओगे। और तुम्हारा प्रेम को अधिक से अधिक खिलेगा क्योंकि वे सभी स्थितियां चुनौतियां हो जाएंगी। और तुम्हारा प्रेम, उन पर काबू पाने से, अधिक से अधिक मजबूत बन जाएगा।
प्रेम अनंतता है। यदि वह है, तो यह बढ़ता चला जाता है, बढ़ता चला जाता है। प्रेम शुरुआत जानता है, लेकिन अंत नहीं जानता।
(सौजन्‍य से-ओशो न्‍यूज लेटर )

12 comments:

DR.MANISH KUMAR MISHRA said...

प्रिय हिंदी ब्लॉगर बंधुओं ,
आप को सूचित करते हुवे हर्ष हो रहा है क़ि आगामी शैक्षणिक वर्ष २०११-२०१२ के दिसम्बर माह में ०९--१० दिसम्बर (शुक्रवार -शनिवार ) को ''हिंदी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएं '' इस विषय पर दो दिवशीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है. विश्विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इस संगोष्ठी को संपोषित किया जा सके इस सन्दर्भ में औपचारिकतायें पूरी की जा चुकी हैं. के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजन की जिम्मेदारी ली गयी है. महाविद्यालय के प्रबन्धन समिति ने संभावित संगोष्ठी के पूरे खर्च को उठाने की जिम्मेदारी ली है. यदि किसी कारणवश कतिपय संस्थानों से आर्थिक मदद नहीं मिल पाई तो भी यह आयोजन महाविद्यालय अपने खर्च पर करेगा.

संगोष्ठी की तारीख भी निश्चित हो गई है (०९ -१० दिसम्बर२०११ ) संगोष्ठी में आप की सक्रीय सहभागिता जरूरी है. दरअसल संगोष्ठी के दिन उदघाटन समारोह में हिंदी ब्लागगिंग पर एक पुस्तक के लोकार्पण क़ी योजना भी है. आप लोगों द्वारा भेजे गए आलेखों को ही पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जायेगा . आप सभी से अनुरोध है क़ि आप अपने आलेख जल्द से जल्द भेजने क़ी कृपा करें . आलेख भेजने की अंतिम तारीख २५ सितम्बर २०११ है. मूल विषय है-''हिंदी ब्लागिंग: स्वरूप,व्याप्ति और संभावनाएं ''
आप इस मूल विषय से जुड़कर अपनी सुविधा के अनुसार उप विषय चुन सकते हैं

जैसे क़ि ----------------
१- हिंदी ब्लागिंग का इतिहास

२- हिंदी ब्लागिंग का प्रारंभिक स्वरूप

३- हिंदी ब्लागिंग और तकनीकी समस्याएँ
४-हिंदी ब्लागिंग और हिंदी साहित्य

५-हिंदी के प्रचार -प्रसार में हिंदी ब्लागिंग का योगदान

६-हिंदी अध्ययन -अध्यापन में ब्लागिंग क़ी उपयोगिता

७- हिंदी टंकण : समस्याएँ और निराकरण
८-हिंदी ब्लागिंग का अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य

९-हिंदी के साहित्यिक ब्लॉग
१०-विज्ञानं और प्रोद्योगिकी से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग

११- स्त्री विमर्श से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग

१२-आदिवासी विमर्श से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग

१३-दलित विमर्श से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग
१४- मीडिया और समाचारों से सम्बंधित हिंदी ब्लॉग
१५- हिंदी ब्लागिंग के माध्यम से धनोपार्जन

१६-हिंदी ब्लागिंग से जुड़ने के तरीके
१७-हिंदी ब्लागिंग का वर्तमान परिदृश्य
१८- हिंदी ब्लागिंग का भविष्य

१९-हिंदी के श्रेष्ठ ब्लागर

२०-हिंदी तर विषयों से हिंदी ब्लागिंग का सम्बन्ध
२१- विभिन्न साहित्यिक विधाओं से सम्बंधित हिंदी ब्लाग
२२- हिंदी ब्लागिंग में सहायक तकनीकें
२३- हिंदी ब्लागिंग और कॉपी राइट कानून

२४- हिंदी ब्लागिंग और आलोचना
२५-हिंदी ब्लागिंग और साइबर ला
२६-हिंदी ब्लागिंग और आचार संहिता का प्रश्न
२७-हिंदी ब्लागिंग के लिए निर्धारित मूल्यों क़ी आवश्यकता
२८-हिंदी और भारतीय भाषाओं में ब्लागिंग का तुलनात्मक अध्ययन
२९-अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी ब्लागिंग क़ी वर्तमान स्थिति

३०-हिंदी साहित्य और भाषा पर ब्लागिंग का प्रभाव

३१- हिंदी ब्लागिंग के माध्यम से रोजगार क़ी संभावनाएं
३२- हिंदी ब्लागिंग से सम्बंधित गजेट /स्वाफ्ट वयेर


३३- हिंदी ब्लाग्स पर उपलब्ध जानकारी कितनी विश्वसनीय ?

३४-हिंदी ब्लागिंग : एक प्रोद्योगिकी सापेक्ष विकास यात्रा

३५- डायरी विधा बनाम हिंदी ब्लागिंग

३६-हिंदी ब्लागिंग और व्यक्तिगत पत्रकारिता

३७-वेब पत्रकारिता में हिंदी ब्लागिंग का स्थान

३८- पत्रकारिता और ब्लागिंग का सम्बन्ध
३९- क्या ब्लागिंग को साहित्यिक विधा माना जा सकता है ?
४०-सामाजिक सरोकारों से जुड़े हिंदी ब्लाग

४१-हिंदी ब्लागिंग और प्रवासी भारतीय


आप सभी के सहयोग क़ी आवश्यकता है . अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें



डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
हिंदी विभाग के.एम्. अग्रवाल महाविद्यालय

गांधारी विलेज , पडघा रोड
कल्याण -पश्चिम, ,जिला-ठाणे
pin.421301

महाराष्ट्र
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Our country was founded on the right to revolution - with very little tolerance for injustice. The law books say that as important as justice is the appearance of justice. I say that if the courts were just, they wouldn't need to think about appearances. A large part of the reason there are appeal courts is to sucker the victims of the first round into thinking they have recourse. They don't, since the appeal is a greater farce than the trial - the courts have a stated bias to uphold the lower court and a real bias to scratch their friends and colleagues' backs. Most appeals court rulings are written by law clerks who are 2nd year law students. Oral arguments are almost never heard, because the appeals court does not want to even know what the case is about - they make form letter rulings without even reading the case. Not hearing the case also saves time. Vigilantes are often condemned apparently only because they sometimes make fact-finding errors. They are vigorously attacked because law-enforcement officials resent the implication that they can't do their jobs. But often the police don't do their job and often courts make errors. Where then is justice? And if injustice is rampant - doesn't that loose the bonds of society? Any criticism of vigilantes must be doubled back when the system errs - with greater force since judges and police are on the public payroll and have sworn a duty to perform. Isn't vigilantism the moral equivalent of citizen's arrest, ie.. a citizen being a police officer, a citizen executing the law? Isn't it a duty? If facts are clear (O.J. for example) and justice isn't served, what are the objections to vigilantism? If someone executed OJ, is anyone going to argue that they made a fact-finding error, that they didn't find the real killer? That justice in the sense of equity was not served? Should we have an ombudsman, to cleanup after our shoddy judiciary?

yogesh saxena said...

IN THE HON’BLE HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD.

Civil Misc. Writ Petition No. 36818 of 2004
(Under Article 226 of constitution of India)
(District – Agra)

1. Institute of Rewriting Indian History Through its Founder President, P. N. Oak.
S/O Late Shri Nagesh Krishna Oak, R/O - Plot No. 10, Goodwill Society,
Aundh, Pune – 411007
2. P. N. Oak. S/O Late Shri Nagesh Krishna Oak, R/O - Plot No. 10, Goodwill
Society, Aundh, Pune - 4110071. Founder President, Institute of Rewriting
Indian History, Aundh, Pune - 4110071 -----------Petitioner

VERSUS

1. Union of India through Secretary,
Human Resources and Development (HRD),
Government of India, New Delhi.

2. Secretary, Tourism and Archeological Department, Govt. of India,
New Delhi

3. Director General,
Archaeological Survey of India,
Government of India, Janapath, New Delhi.----------Respondents
Writ petition is moved to re-establish the truth and cultural heritage of our Country. This writ petition is pertaining to the world marvel, one of the Seven Wonders of the World, namely, Taj Mahal, and other monuments authorship attributed to Hindu Rulers, much prior to the period of Mugal Invaders. The ancient monuments and structure are part of our tradition and culture and evidence of glorious-marvelous architectural achievement and further to that it is a part of our heritage. Fraud upon history should not be perpetuated as life is evaluated in the perspective of history. For the sake of history of heritage, these monuments should be identified, protected and preserved properly in the right perspective with right historical records of creation and construction of truth and realities, which includes rectifying and/ or correcting the wrong records, notions, motivated dis-information and mis- information.
writ petition is moved in the Public Interest, for a National Cause, to establish the truth there is no private interest or any other oblique motive, or any other personal gain. The petitioner institution, known as Institute for Re-writing Indian History, Thane, having registration no. F-1128 (T) is a public trust. The founder president of the trust is Shri P.N. Oak S/o Late Shri Nagesh Krishna Oak, R/o- Plot no. 10, Goodwill Society, Aundh, Pune.411007, who has written number of books namely 1. World Vedic Heritage, 2. The Tajmahal is a Temple Place, 3.Some Blunders of Indian Historical Research, 4. Flowers Howlers, 5. Learning Vedic Astrology, 6. Some Missing Chapters of World History, 7. Agra red Fort is a Hindu Building, 8.Great Britain was Hindu Land, 9. The Taj Mahal is Tejomahalaya a Shiva Temple, 10.Who Says Akbar was Great, 11. Vedic Guide to Health, Beauty, Longevity and Rejuvenation, 12. Islamic Havoc in Indian History.