अमूर्त के दर्शन करने हैं, तो मूर्त को अग्नि दो

एक सर्द और अंधेरी रात में एक साधु किसी मंदिर में ठहरा था। उसने सर्दी दूर करने को भगवान की एक काष्ठ मूर्ति जला ली। आग जली देख पुजारी जाग गया। वह क्रोध में कुछ बोल भी न सका- वह कृत्य ऐसा ही असोचनीय था। तभी उसने देखा : साधु जली राख के ढेर में कुछ खोज रहा है। उसने पूछा कि क्या कर रहे हो? साधु ने कहा, 'भगवान की देह की अस्थियां खोजता हूं।' अब पुजारी के समक्ष उस साधु का पागलपन पूरी तरह स्पष्ट हो गया था। उसने साधु से कहा, 'पागल! लकड़ी में अस्थियां कहां रखी हैं?' साधु बोला, 'तब एक मूर्ति और लाने की कृपा करो, रात बहुत सर्द है और बहुत लंबी भी।'
मैं इस कथा को सोचता हूं और लगता है वह पागल साधु मैं ही हूं।
मैं चाहता हूं कि हम मूर्तियों से मुक्त हो सकें, ताकि जो अमूर्त है, उसके दर्शन संभव हों। रूप पर जो रुका है, वह अरूप पर नहीं पहुंच पाता है। आकार जिसकी दृष्टिं में है, वह निराकार सागर में कैसे कूदेगा? वह जो दूसरे की पूजा में है, वह अपने पर आ सके, यह कैसे संभव है? मूर्त को अग्नि दो, ताकि अमूर्त ही अनुभूति में शेष रहे और आकार की बदलियों को विसर्जित होने दो, ताकि निराकार आकाश उपलब्ध हो सके। रूप को बहने दो, ताकि नौका अरूप के सागर में पहुंचे। जो सीमा के तट से अपनी नौका छोड़ देता है, वह अवश्य ही असीम को पहुंचता और असीम हो जाता है।
( सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

2 comments:

Dr.Parveen Chopra said...

त्यागी जी, मेरे एक मरीज़ ने मुझे कुछ दिन पहले दो बातें लिखवाईं थीं.....
दादू दुनिया बावरी,
पत्थर पूजन जाए,
घर की चक्की कोई न पूजे,
जिस का पीसा खाए।
आप की बात पढ़ कर यकायक उस का ध्यान आ गया,साहब।

प्रभाकर पाण्डेय said...

सुंदर अति सुंदर लेख।