आंखें खोलो, स्वर्ग का राज तुम्हारा है


नीले नभ के नीचे सूरज की गर्मी फैल गयी है। सर्दी घनी हो गई है और दूब पर जमे ओस के कण बर्फ जैसे ठण्डे लगते हैं। फूलों से ओस की बूंदे टपक रही हैं। रातरानी रात भर सुगंध देकर सो गई है।एक मुर्गा बांग देता है और फिर दूर-दूर से उसके प्रत्युत्तर आते हैं। वृक्ष मलय के झोंकों से कांप रहे हैं और चिडि़यों के गीत बंद ही नहीं होते हैं।सुबह अपने हस्ताक्षर सब जगह कर देती है। सारा जगत अचानक कहने लगता है कि सुबह हो गई है।मैं बैठा दूर वृक्षों में खो गये रास्ते को देखता हूं। धीरे-धीरे राह भरने लगती है और लोग निकलते हैं। वे चलते, पर सोये से लगते हैं। किसी आंतरिक तंद्रा ने सबको पकड़ा हुआ है। सुबह के इन आनंद क्षणों के प्रति वे जागे हुए नहीं लगते हैं, जैसे कि उन्हें ज्ञात ही नहीं कि जो जगत के पीछे है, वह इन क्षणों में अनायास प्रकट हो जाता है।जीवन में कितना संगीत है और मनुष्य कितना बधिर है!जीवन में कितना सौंदर्य है और मनुष्य कितना अंधा है!जीवन में कितना आनंद है और मनुष्य कितना संवेदन-शून्य है!उस दिन उन पहाडि़यों पर गया था। उन सुंदर पर्वत-पंक्तियों में हम देर तक रुके थे; पर जो मेरे साथ थे, वे जीवन की दैनंदिन क्षुद्र बातों में ही लगे हुए थे। उन सब बातों में जिनका कोई अर्थ नहीं, जिनका होना न होना बराबर है। इन बातों की ओट ने उन्हें उस पर्वतीय संध्या के सौंदर्य से वंचित कर दिया था। इस तरह क्षुद्र में आवेष्टिंत हम विराट से अपरिचित रह जाते हैं और जो निकट ही है, वह अपने हाथों दूर पड़ जाता है।मैं कहना चाहता हूं, ''ओ मनुष्य! तुझे खोना कुछ भी नहीं है, सिवाय अपने अंधेपन के और पा लेना है, सब-कुछ। अपने हाथों बने भिखारी! आंखें खोल। पृथ्वी और स्वर्ग का सारा राज्य तेरा है।''(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर!
ओशो, प्रेषित रचना के लिए आभार।