साधुता क्या है?


यह प्रश्न अनेकों के मन में है। वस्त्र और बाह्य रूप से साधुता का संबंध होता, तो यह प्रश्न उठता ही नहीं। निश्चित ही साधुता बाह्य सत्य नहीं है, कुछ आंतरिक सत्य है। यह आंतरिक सत्य क्या है?
साधुता अपने में होना है। साधारणतया मनुष्य अपने से बाहर है। एक क्षण भी वह अपने में नहीं है। सब के साथ है, पर वह अपने साथ नहीं है। यह स्व से अलगाव ही असाधुता है। स्व में लौटना, स्वरूप में प्रतिष्ठित होना, स्वस्थ होना साधुता है। आध्यात्मिक अस्वास्थ्य असाधुता है, स्वास्थ्य साधुता है।
मैं बाहर हूं, तो सोया हुआ हूं। बाह्य 'पर' है, मूच्र्छा है। 'पर' पकड़े हुए है। 'पर' ही ध्यान में है। 'स्व' ध्यान से बाहर है। यही निद्रा है। महावीर ने कहा, 'सुत्ता अमुणी'- जो सोता है, सो अमुनि है। इस 'पर' की परतंत्रता से 'स्व' की स्वतंत्रता में जागना साधु होना है। यह साधुता पहचानी कैसे जाती है?
यह साधुता शांति से, आनंद से, सम्यकत्व से पहचानी जाती है।
एक साधु था, संत फ्रांसिस। वह अपने शिष्य लियो के साथ यात्रा पर था। वे सेंट मेरिनो जा रहे थे। राह में आंधी-वर्षा आयी। वे भीग गये और कीचड़ से लथपथ हो गये। रात घिर आयी थी और दिनभर की भूख और थकान ने उन्हें पकड़ लिया था। गांव अभी दूर था और आधी रात के पूर्व पहुंचना संभव नहीं था। तभी फ्रांसिस ने कहा, 'लिया, वास्तविक साधु कौन है? वह नहीं जो अंधों को आंखें दे सकता है, बीमारों को स्वास्थ्य दे सकता है और मृतकों को भी जिला सकता है। वह वास्तविक साधु नहीं है।' थोड़ी देर सन्नाटा रहा और फिर फ्रांसिस ने कहा, 'लियो, वास्तविक साधु वह नहीं है, जो पशुओं, पौधों और पत्थरों की भाषा समझ ले। सारे जगत का ज्ञान भी जिसे उपलब्ध हो, वह भी वास्तविक साधु नहीं है।' फिर थोड़ी देर सन्नाटा रहा। वे दोनों अंधी-पानी में चलते रहे। सेंट मेरिनो के दिये दिखाई पड़ने लगे थे। संत फ्रांसिस ने फिर कहा, 'और वह भी वास्तविक साधु नहीं है, जिसने अपना सब कुछ त्याग दिया है।'
अब लियो से रहा न जा सका। उसने पूछा, 'फिर वास्तविक साधु कौन है?'
संत फ्रांसिस ने कहा था, 'हम मेरिनो पहुंचने को हैं। सराय के बाहर, द्वार को हम खटखटाएंगे। द्वारपाल पूछेगा, 'कौन हो?' और हम कहेंगे कि तुम्हारे ही दो बंधु- दो साधु। और यदि वह कहे, 'भिखारियों, भिखमंगों, मुफ्तखोरों, यहां से भाग जाओ, यहां तुम्हारे लिये कोई स्थान नहीं है।' ओर द्वार बंद कर ले। हम भूखे, थके और कीचड़ से भरे आधी रात में बाहर खड़े रहें और फिर द्वार खटखटायें। वह अब की बार बाहर निकलकर लकड़ी से हमें चोट करे और कहे, 'बदमाशों, हमें परेशान मत करो।' और यदि हमारे भीतर कुछ भी न हो, वहां सब शांत और शून्य बना रहे और उस द्वारपाल में भी हमें प्रभु दिखता रहे, तो यही वास्तविक साधुता है।'
निश्चय ही सब परिस्थितियों में अखंडित शांति, सरलता और समता को उपलब्ध कर लेना ही साधुता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

2 comments:

Dr. Chandra Kumar Jain said...

निश्चय ही सब परिस्थितियों में अखंडित शांति, सरलता और समता को उपलब्ध कर लेना ही साधुता है।
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साधुता की साधु परख
ओशो ही कर सकते हैं .
आभार त्यागी जी !

tz said...

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