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सत्य एक है


-क्रांतिबीज का अंतिम बीज-
सत्य के मार्ग पर वह व्यक्ति है, जिसने सारे मतों को तिलांजलि दे दी है। जिसका कोई पक्ष है और कोई मत है, सत्य उसका नहीं हो सकता। सब पक्ष मनुष्य-मन से निर्मित हैं। सत्य का कोई पक्ष नहीं है और इसलिए जो निष्पक्ष होता है, पक्ष शून्य होता है, वह सत्य की ओर जाता है और सत्य उसका हो जाता है। इसलिए किसी पक्ष को न चाहो, किसी संप्रदाय को न चाहो, किसी 'दर्शन' को न चाहो। चित्त को उस स्थिति में ले चलो, जहां सब पक्ष अनुपस्थित हैं। उसी बिंदु पर विचार मिटता और दर्शन प्रारंभ होता है। आंखें जब पक्ष-मुक्त होती हैं, तो वे 'जो है' उसे देखने में समर्थ हो पाती हैं। वास्तविक धार्मिक व्यक्ति वही है, जिसने सब धर्म छोड़ दिये हैं, जिसका अपना कोई धर्म नहीं है। और इस भांति धर्मो को छोड़कर वह 'धर्म' हो जाता है। मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं किस धर्म का हूं? में कहता हूं कि मैं धर्म का तो हूं, पर किसी 'धर्म' का नहीं हूं। धर्म भी अनेक हो सकते हैं, यह मेरी अनुभूति में नहीं आता है! विचार भेद पैदा करते हैं, पर विचार से तो कोई धर्म में नहीं पहुंचता है। धर्म में पहुंचना तो निर्विचार से होता है और निर्विचार में तो कोई भेद नहीं है। समाधि एक है और समाधि में जो सत्य ज्ञान होता है, वह भी एक ही है। सत्य एक है, पर मत अनेक हैं। मतों की अनेकता में जो एक को चुनता है, वह सत्य के आने के लिए अपने ही हाथों द्वार बंद कर देता है। मतों को मुक्त करो और मतों से मुक्त हो जाओ और सत्य के लिए द्वार दो : यही मेरी शिक्षा है। समुद्र के नमक का स्वाद पूरब और पश्चिम में एक है और जल के वाष्पिभूत होने के नियम भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न- भिन्न नहीं हैं, जनम और मृत्यु की श्रंखला मेरे लिए अलग और आप के लिए अलग नहीं है, फिर अंतस-सत्ता कैसे अनेक नियमों और सत्यों से परिचालित हो सकती है! आत्मा में कोई भूगोल नहीं है और न दिशाओं के कोई भेद हैं और न कोई सीमाएं हैं। भेद मात्र मन के हैं और जो मन के भेदों में विभाजित है, वह आत्मा के अभेद को उपलब्ध नहीं हो सकता है। मैं सुबह घूमकर लौट रहा था, तो एक पक्षी को पिंजड़े में बंद देखा। उसे देख मुझे पक्षों में बंद लोगों की याद आयी। पक्ष भी पिंजड़े हैं- बहुत सूक्ष्म, अपने हाथों से निर्मित। उन्हें कोई और नहीं, हम स्वयं ही बना लेते हैं। वे अपने ही हाथों से बनाये गये कारागृह हैं। हम स्वयं उन्हें बनाते हैं और फिर उनमें बंद हो कर सत्य के मुक्त आकाश में उड़ने की सारी क्षमता खो देते हैं। और, अभी मैं देख रहा हूं आकाश में उड़ती एक चील को। उसकी उड़ान में कितनी स्वतंत्रता है, कितनी मुक्ति है! एक पिंजड़े में बंद पक्षी है ओर एक मुक्त आकाश में उड़न लेता! और दोनों क्या हमारे चित्त की दो स्थितियों के प्रतीक नहीं हैं? आकाश में उड़ता हुआ पक्षी न कोई पदचिह्नं छोड़ता है और न उड़ान का कोई मार्ग ही उसके पीछे बनता है। सत्य का भी ऐसा ही एक आकाश है। जो मुक्त होते हैं, वे उसमें उड़ान लेते हैं, पर उनके पीछे पदचिह्नं नहीं बनते हैं और न कोई मार्ग ही निर्मित होते हैं। इसलिए स्मरण रहे कि सत्य के लिए बंधे-बंधाये मार्ग की तलाश व्यर्थ है। ऐसा कोई मार्ग नहीं है और यह शुभ ही है, क्योंकि बंधे मार्ग किसी बंधन तक ही पहुंचा सकते थे, वे मुक्त कैसे करा सकते हैं! सत्य के लिए प्रत्येक को अपना मार्ग स्वयं ही बनाना होता है और कितना सुंदर है। जीवन पटरियों पर चलती हुई गाडि़यों की तरह नहीं है, सुंदर पर्वतों से सागर की ओर दौड़ती हुई सरिताओं की भांति है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

धर्म


कोई धर्म के संबंध में पूछ रहा था। उससे मैंने कहा, 'धर्म का संबंध इससे नहीं है कि आप उसमें विश्वास करते हैं या नहीं करते। वह आपका विश्वास नहीं, आपका श्वास-प्रश्वास हो, तो ही सार्थक है। वह तो कुछ है- जो आप करते हैं या नहीं करते हैं- जो आप होते हैं, या नहीं होते हैं। धर्म कर्म है वक्तव्य नहीं।'
और धर्म कर्म तभी होता है, जब वह आत्मा बन गया हो। जो आप करते हें, वह आप पहले हो गया होते हें। सुवास देने के पहले फूल बन जाना आवश्यक है। फूलों की खेती की भांति आत्मा की खेती भी करनी होती है। और, आत्मा में फूलों को जगाने के लिए पर्वतों पर जाना आवश्यक नहीं है। वे तो जहां आप हैं, वहीं उगाये जा सकते हैं। स्वयं के अतिरिक्त एकांत में ही पर्वत हैं और अरण्य हैं।
यह सत्य है कि पूर्ण एकांत में ही सत्य और सौंदर्य के दर्शन होते हैं। और जीवन में जो भी श्रेष्ठ है
, वह उन्हें मिलता है, जो अकेले होने का साहस रखते हैं। जीवन के निगूढ़ रहस्य एकांत में ही अपने द्वार खोलते हैं। और आत्मा प्रकाश को और प्रेम को उपलब्ध होती है। और जब सब शांत और एकांत होता है, तभी वे बीज अंकुर बनते हैं, जो हमारे समस्त आनंद को अपने में छिपाये हमारे व्यक्तित्व की भूमि में दबे पड़े हैं। वह वृद्धि, जो भीतर से बाहर की ओर होती है, एकांत में ही होती है। और स्मरण रहे कि सत्य-वृद्धि भीतर से बाहर की ओर होती है। झूठे फूल ऊपर से थोपे जा सकते हैं, पर असली फूल तो भीतर से ही आते हैं।

इस आंतरिक वृद्धि के लिए पर्वत और अरण्य में जाना आवश्यक नहीं है, पर पर्वत और अरण्य में होना अवश्य आवश्यक है। वहां होने का मार्ग प्रत्येक के ही भीतर है। दिन और रात्रि की व्यस्त दौड़ में थोड़े क्षण निकालें और अपने स्थान और समय को, और उससे उत्पन्न अपने तथाकथित व्यक्तित्व और 'मैं' को भूल जाएं। जो भी चित्त में आये, उसे जानें कि यह मैं नहीं हूं, और उसे बाहर फेंक दें। सब छोड़ दें- प्रत्येक चीज, अपना नाम, अपना देश, अपना परिवार-सब स्मृति से मिट जाने दें और कोरे कागज की तरह हो रहें। यही मार्ग आंतरिक एकांत और निर्जन का मार्ग है। इससे ही अंतत: आंतरिक संन्यास फलित होता है।

चित्त जब सब पकड़ छोड़ देता है- सब नाम-रूप के बंधन तोड़ देता है, तब वही आपमें शेष रह जाता है, जो आपका वास्तविक होना है। उस ज्ञान में ही धर्म है के फूल लगते हैं और जीवन परमात्मा की सुवास से भरता है।

इन थोड़े क्षणों में जो जाना जाता है- जो शांति और सौंदर्य और जो सत्य- वह आपको एक ही साथ दो तलों पर जीने की शक्ति दे देता है। फिर कुछ बांधता नहीं है और जीवन मुक्त हो जाता है। जल में होकर भी फिर जल छूता नहीं है। इस अनुभूति में ही जीवन की सिद्धि है और धर्म की उपलब्धि है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

'स्व' ही सत्य है


सत्य के लिए जिसकी अभिप्सा है, वह जाने कि उसे सत्य की कोई कल्पना, कोई धारण स्वीकार नहीं करनी है। उस स्वीकार पर ही साधना का आत्मघात हो जाता है।
सत्य को पाने के लिए चित्त के द्वारा दिये गये सारे प्रलोभनों को छोड़ने का साहस चाहिए। चित्त द्वारा प्रदत्त कोई भी विकल्प स्वीकार नहीं करना है। तभी वह निर्विकल्प अवस्था आती है, जो स्वयं के समक्ष स्वयं के प्रत्यक्ष को देती है। वह अंतत: प्रत्यक्ष, शुद्ध ज्ञान की सद्-घड़ी आ सके, उसके पूर्व बहुत-कुछ आता है जो कि सत्य नहीं है। और उसमें जो उलझता है, वह और कुछ भी जान ले, स्वयं को नहीं जानता है। स्वयं को कभी भी ज्ञेय की भांति नहीं जाना जाता है। इसलिए, जब तक कुछ भी ज्ञेय शेष है, तब तक जानना कि साक्षात 'पर' का है, 'स्व' का नहीं। ज्ञेय जब अशेष है, तब जो शेष रह जाता है, वही ज्ञान है, वही स्व है, वही सत्य है।
रिंझाई ने कहा है, 'समाधि के मार्ग में यदि स्वयं भगवान भी मिलें, तो उन्हें राह से दूर कर देना।'
मैं भी यही कहता हूं। समाधि की राह जब पूर्ण निर्जन है और ज्ञान की धारा में जब कोई ज्ञेय नहीं है, और दर्शन को, देखने को जब कुछ शेष नहीं है, तभी वह मिलता और जाना जाता है, जो कि सत्य है।
एक सद्गुरु ने भी एक दिन यही कहा था। उसके एक शिष्य ने सुना। उसने अपनी कुटिया पर लौट सारी मूर्तियां तोड़ डालीं और सारे ग्रंथ जला डाले। और जाकर अपने गुरु से कहा कि मैं वह सब नष्ट कर आया हूं, जो कि सत्य के आगमन में बाधक हैं। उसका गुरु उसकी बात सुन बहुत हंसने लगा था और उसने कहा था, 'पागल, उन ग्रंथों को जला, जो तेरे भीतर हैं और उन मूर्तियों को तोड़, जो तेरे चित्त की अतिथि बन गयी हैं।'
ऐसा ही आज यहां हुआ है। एक युवक मेरी बातें सुन अपने पूजागृह को उजाड़ मूर्तियों को कुएं में फेंक आये हैं। उनसे मैंने कहा है, 'मूर्तियों को नहीं, उस मन को फेंको, जो कि मूर्तियों का निर्माता है। पूजागृहों को उजाड़ने से क्या होगा, जब तक कि यह सर्जक मन जीवित है, जो कि प्रतिक्षण नये पूजागृह बना लेता है?'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

'मैं' की मृत्यु


एक संन्यासी ने मुझ से कहा, 'मैं प्रभु के लिए सब छोड़ आया हूं और अब मेरे पास कुछ भी नहीं है।'
मैं देखता हूं कि सच ही उनके पास कुछ भी नहीं है, पर उनसे कहता हूं कि वह जो छोड़ना था- और वही अकेला था, जो कि छोड़ा जा सकता था- वह अब भी उनके पास है!
वे अपने चारों ओर देखते हैं। सच ही उनके पास कुछ नहीं है, जो है, उनके भीतर है। वह उनकी आंखों में है। वह उनके त्याग में है। वह उनके संन्यास में है। वह 'मैं' है। उसे छोड़ना ही अकेला छोड़ना है। क्योंकि शेष सब छीना जा सकता है और अंतत: मृत्यु सब छीन ही लेती है। 'मैं' को कोई नहीं छीन सकता, उसे तो केवल छोड़ा ही जा सकता है, उसका त्याग ही केवल त्याग है।
इसलिए प्रभु को समर्पित करने योग्य मनुष्य के पास 'मैं' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। शेष जो भी वह छोड़े, वह केवल छोड़ने के भ्रम में है, क्योंकि वह उसका था ही नहीं। और इस सब छोड़ने से उलटे उसका 'मैं' और प्रगाढ़ और घनीभूत हो जाता है। 'मैं' केंद्र से यदि कोई अपना समस्त जीवन भी प्रभु को दे दे, तो भी वह देना नहीं है। 'मैं' को दिये बिना और कुछ भी देना, देना नहीं है।
'मैं' एकमात्र अपरिग्रह है। 'मैं' एकमात्र संसार है। उसे जो छोड़ता है, वही अपरिग्रही है, वही संन्यासी है।
'मैं' संसार है। 'मैं' का अभाव संन्यास है।
'मैं' को दे देना वास्तविक धार्मिक क्रांति और परिवर्तन है। क्योंकि उसके रिक्त स्थान में ही वह आता है, जो कि मेरा 'मैं'
नहीं वरन् सर्व का 'मैं' है।
सिमोन वेल का कथन मुझे बहुत प्रिय है, जिसमें उसने कहा है कि प्रभु के अतिरिक्त किसी को भी 'मैं' कहने का कोई अधिकार नहीं है।
सच ही 'मैं' कहने का अधिकार केवल उसे ही है, जो कि समस्त सत्ता का केंद्र है। पर उसे 'मैं' कहने का कोई कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उसके लिए सब 'मैं' ही है। जिसे अधिकार है, उसे कहने का कारण नहीं है, और जिसे कहने का कारण है, उसे कोई अधिकार नहीं है।
पर मनुष्य अपने अनाधिकार को खोकर, अधिकार को पा सकता है। वह 'मैं' होना छोड़ कर 'मैं' हो सकता है। वह अपने केंद्र के आभास को छोड़कर, सत्य केंद्र को पा सकता है। वह जिस क्षण अपने केंद्र को विकेंद्रित कर देता है, उसी क्षण केंद्र को उपलब्ध हो जाता है।
मनुष्य का 'मैं' सत्य नहीं है। वह संघात है। उसकी कोई सत्ता नहीं है। वह संग्रह है। इस संग्रह से सत्य का जो भ्रम पैदा होता है, वही अज्ञान है। पर जो इस संग्रह में झांकता है, देखता है और सत्य को खोजता है, उसके समक्ष आभास टूट जाता है। और 'मैं' की माला के फूल बिखर जाते हैं। और तब वह सूत्र उपलब्ध होता है, जो कि सत्य है और जिस पर कि 'मैं' के फूल टंगे थे और जिसे कि उन फूलों ने ढांक लिया था।
फूलों के हटाने पर- उनके आच्छादन के टूटने पर पाया जाता है कि जो उनका आधार था, वह मेरा ही नहीं है, वह मुझ में और सब में भी है। वह समस्त सत्ता में पिरोया हुआ है।
जो 'मैं' की इस मृत्यु से नहीं गुजरता है, वह परमात्मा के जीवन से वंचित रह जाता है। 'मैं' की मृत्यु - परमात्मा से, सत्य से, सत्ता से, हमारे भेद और अंतर की मृत्यु है। उसके गिरते ही वह फासला गिर जाता है, जो कि हमें स्वयं हमसे ही तोड़े हुए था। और वह व्यक्ति धन्यभागी है, जो शरीर की मृत्यु के पूर्व इस मृत्यु को उपलब्ध होता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

'है' को हो जाने देना मोक्ष है


एक स्वप्न से जागा हूं। जागते ही एक सत्य दिखा है। स्वप्न में मैं भागीदार भी था और द्रष्टा भी । स्वप्न में जब तक था, द्रष्टा भूल गया था, भागीदार ही रह गया था। अब जागकर देखता हूं कि द्रष्टा ही था, भागीदार प्रक्षेप था।
स्वप्न जैसा है, संसार भी वैसा ही है। द्रष्टा, चैतन्य ही सत्य है, शेष सब कल्पित है। जिसे हमने 'मैं' जाना है, वह वास्तविक नहीं है। उसे भी जो जान रहा है, वास्तविक वही है।
यह सबका द्रष्टा तत्व सबसे मुक्त और सबसे अतीत है। उसने कभी कुछ किया है, न कभी कुछ हुआ है। वह बस 'है'।
असत्य 'मैं', स्वप्न 'मैं' शांत हो जाये, तो 'जो है', वह प्रकट हो जाता है। इस 'है' को हो जाने देना मोक्ष है, कैवल्य है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

'मैं' केवल प्रेम से छूटता है


एक चर्चा में आज उपस्थित था। उपस्थित था जरूर, पर मेरी उपस्थिति न के बराबर थी। भागीदार मैं नहीं था। केवल श्रोता था। जो सुना, वह साधारण था, पर जो देखा, वह निश्चय ही असाधारण था।
प्रत्येक विचार पर वहां वाद-विवाद हो रहा था। सब सुना, पर दिखाई कुछ और ही दिया। दिखा कि विवाद विचारों पर नहीं, 'मैं' पर है। कोई कुछ सिद्ध नहीं करना चाहता है। सब 'मैं' को- अपने-अपने 'मैं' को सिद्ध करना चाहते हैं। विवाद की मूल जड़ इस 'मैं' में है। फिर प्रत्यक्ष में केंद्र कहीं दिखे, अप्रत्यक्ष में केंद्र वहीं है। जड़े सदा ही अप्रत्यक्ष होती हैं। दिखाई वे नहीं देतीं। दिखता है जो, वह मूल नहीं है। फूल-पत्तों की भांति जो दिखता है, वह गौण है। उस दिखने वाले पर रुक जायें तो समाधान नहीं है, क्योंकि समस्या ही वहां नहीं है।
समस्या जहां है, समाधान भी वहीं है। विवाद कहीं नहीं पहुंचाते। कारण, जो जड़ है, उसका ध्यान ही नहीं आता है।
यह भी दिखाई देता है कि जहां विवाद है, वहां कोई दूसरे से नहीं बोलता है। प्रत्येक अपने से ही बातें करता है। प्रतीत भर होता है कि बातें हो रही हैं। पर जहां, 'मैं' है, वहीं दीवार है और दूसरे तक पहुंचना कठिन है। 'मैं' को साथ लिए संवाद असंभव है।
संसार में अधिक लोग अपने से ही बातें करने में जीवन बिता देते हैं।
एक पागलखाने की घटना पढ़ी थी। दो पागल विचार में तल्लीन थे, पर उनका डाक्टर एक बात देखकर हैरान हुआ। वे बातें कर रहे थे जरूर और जब एक बोलता था, तो दूसरा चुप रहता था, पर दोनों की बातों में कोई संबंध, कोई संगति न थी। उसने उनसे पूछा कि 'जब तुम्हें अपनी-अपनी ही कहना है, तो एक-दूसरे के बोलते समय चुप क्यों रहते हो?' पागलों ने कहा, 'संवाद के नियम हमें मालूम हैं- जब एक बोलता है, तब दूसरे को चुप रहना नियमानुसार आवश्यक है।'
यह कहानी बहुत सत्य है और पागलों के ही नहीं, सबके संबंध में सत्य है। बातचीत के नियम का ध्यान रखते हैं, सो ठीक, अन्यथा प्रत्येक अपने से ही बोल रहा है।
'मैं' को छोड़े बिना कोई दूसरे से नहीं बोल सकता। और 'मैं' केवल प्रेम से छूटता है। इसलिए प्रेम में ही केवल संवाद होता है। उसके अतिरिक्त सब विवाद है और विवाद विक्षिप्तता है। क्योंकि उसमें सब अपने द्वारा और अपने से ही कहा जा रहा है।
मैं जब उस चर्चा से आने लगा, तो किसी ने कहा, 'आप कुछ बोले नहीं?' मैंने कहा, 'कोई भी नहीं बोला है'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रभु को अपने भीतर अनुभव करो


रात्रि आधी होने को है। आकाश आज बहुत दिनों बाद खुला है। सब नहाया-नहाया मालूम होता है और आधा चांद पश्चिम क्षितिज में डूबता जा रहा है।
आज संध्या कारागार में बोला हूं। बहुत कैदी थे। उनसे बातें करते-करते वे कैसे सरल हो जाते हैं! उनकी आंखों में कैसी पवित्रता झलकने लगती है- उसका स्मरण आ रहा है।
मैंने वहां कहा है : प्रभु की दृष्टिं में कोई पापी नहीं है, प्रकाश की दृष्टिं में जैसे अंधेरा नहीं है। इसलिए मैं तुमसे कुछ छोड़ने को नहीं कहता हूं। हीरे पा लो, मिट्टी तो अपने आप छूट जाती है। जो तुमसे छोड़ने को कहते हैं, वे ना समझ हैं। जगत को केवल पाया जाता है। एक नयी सीढ़ी पाते हैं, तो पिछली सीढ़ी अपने आप छूट जाती है। छोड़ना नकारात्मक है। उसमें पीड़ा है, दुख है, दमन है। पाना सत्तात्मक है। उसमें आनंद है। क्रिया में छोड़ना पहले दिखता है, पर वस्तुत: पाना पहले है। पहले पहली सीढ़ी ही छूटती है, पर उसके पूर्व दूसरी सीढ़ी पा ली गयी होती है। उसे पाकर ही- उसे पाया जानकर ही-पहली सीढ़ी छूटती है। इससे प्रभु को पाओ, तो जो पाप जैसा दिखता है, वह अनायास चला जाता है।
सच ही, उस एक के पाने में सब पा लिया जाता है। उस सत्य के आते ही सब अपने से विलीन हो जाते हैं। स्वप्नों को छोड़ना नहीं है, जानना है। जो स्वप्नों को छोड़ने में लगता है, वह उन्हें मान लेता है। हम स्वप्नों को मानते ही नहीं हैं। इससे ही हम कह सके हैं : 'अहं ब्रह्मंास्मि- मैं ही ब्रह्मं हूं।' यह जिसका उद्घोष है, उनके लिए अंधेरे की कोई सत्ता नहीं है।
मित्र, इसे जानो। प्रकाश को अपने भीतर जगाओ और पुकारो। प्रभु को अपने भीतर अनुभव करो। अपने सत्य के प्रति जागो और फिर पाया जाता है कि अंधेरा तो कहीं है ही नहीं। अंधेरा हमारी मूच्र्छा है और जागरण प्रकाश बन जाता है।
यह उन कैदियों से कहा था और फिर लगा कि यह तो सबसे कहना है, क्योंकि ऐसा कौन है, जो 'कैदी' नहीं है!
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जीवन एक कहानी है!!

जीवन- जिसे हम जीवन समझते हैं, वह क्या है? रात्रि कोई पूछता था। मैंने एक कहानी कही :-
एक विश्रामालय में दो व्यक्ति आराम-कुर्सियों पर बैठे हुए थे। एक युवा था, एक वृद्ध था। जो वृद्ध था वह आंखें बंद किये बैठा था, पर बीच-बीच में मुस्करा उठता था। और कभी-कभी हाथ से और चेहरे से ऐसे इशारे करता था, जैसे कुछ दूर हटा रहा हो। युवक से बिना पूछे न रहा गया। वृद्ध ने एक बार आंखें खोली, तो उसने पूछ ही लिया, 'इस अत्यंत कुरूप विश्रामगृह में ऐसा क्या है, जो आप में मुस्कराहट ला देता है?' वृद्ध बोला, 'मैं अपने से कुछ कहानियां कह रहा हूं, उनमें ही हंसी आ जाती है।' उस युवक ने पूछा, 'और बार-बार हाथ से हटाते क्या हैं?' वृद्ध हंसने लगा और बोला, 'उन कहानियों को जिन्हें बहुत बार सुन चुका हूं।' युवक ने कहा, 'आप भी क्या कहानियों से मन समझा रहे हैं।' उत्तर में वृद्ध ने कहा था, 'बेटे, एक दिन समझोगे कि पूरा ही जीवन कहानियों से अपने को समझा लेने का नाम है।'
निश्चित ही जीवन जैसा मिलता है, वह कहानी ही है। और कहानियों से अपने को समझा लेने का ही नाम जीवन है।
जिसे हम जीवन समझते हैं, वह जीवन नहीं, केवल एक सपना है। नींद टूटने पर ज्ञात होता है कि हाथ में कुछ भी नहीं है- जो था, वह था नहीं, बस, केवल दिखता था।
पर, इस स्वप्न-जीवन से सत्य-जीवन में जागा जा सकता है। निद्रा छोड़ी जा सकती है। जो सो रहा है, वह जाग भी सकता है। उसके सो सकने की संभावना ही, उसके जागने की भी संभावना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जो केवल 'है'


'एक सराय में एक रात एक यात्री ठहरा था। वह जब वहां पहुंचा तो कुछ यात्री विदा हो रहे थे। सुबह जब वह विदा हो रहा था, तो कुछ और यात्री आ रहे थे। सराय में अतिथि आते और चले जाते, लेकिन आतिथेय वहीं का वहीं था।' एक साधु यह कह कर पूछता था कि क्या यही घटना मनुष्य के साथ प्रतिक्षण नहीं घट रही है?
मैं भी यही पूछता हूं और कहता हूं कि जीवन में अतिथि और आतिथेय को पहचान लेने से बड़ी और कोई बात नहीं है। शरीर-मन एक सराय है। उसमें विचार के, वासनाओं के, विकारों के अतिथि आते हैं। पर इन अतिथियों से पृथक भी वहां कुछ है। आतिथेय भी है। वह आतिथेय कौन है?
यह 'कौन' कैसे जाना जाये? बुद्ध ने कहा है, 'रुक जाओ।' और यह रुक जाना ही उसका जानना है। बुद्ध का पूरा वचन है, 'यह पागल मन रुकता नहीं, यदि यह रुक जाए तो वही बोधि है, वही निर्वाण है।' मन के रुकते ही आतिथेय प्रकट हो जाता है। वह शुद्ध, नित्य, बुद्ध, चैतन्य है। जो न कभी जन्मा, न मरा। न जो बद्ध है, न मुक्त होता है। जो केवल 'है', और जिसका होना परमा आनंद है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

स्वाधार चैतन्य ही समाधि है


'ईश्वर है?'- हमें ज्ञात नहीं।
'आत्मा है?'- हमें ज्ञात नहीं।
'मृत्यु के बाद जीवन है?'- हमें ज्ञात नहीं।
'जीवन में कोई अर्थ है?'- हमें ज्ञात नहीं।
'हमें ज्ञात नहीं' यह आज का पूरा जीवन-दर्शन है। इन तीनों शब्दों में हमारा पूरा ज्ञान समा जाता है। 'पर' के संबंध में, पदार्थ के संबंध में जानने की हमारी दौड़ का अंत नहीं है। पर 'स्व' के, चैतन्य के संबंध में हम प्रतिदिन अंधेरे में डूबते जाते हैं।
बाहर प्रकाश मालूम होता है, भीतर घुप्प अंधेरा है। परिधि पर ज्ञान है, केंद्र पर अज्ञान है।
और आश्चर्य यह है कि केंद्र को प्रकाशित करने का प्रयास भी नहीं करना है। वहां आंख भर पहुंच जाये और सब प्रकाशित हो जाता है।
'पर' आंख न हो, तो वह 'स्व' पर खुल जाती है।
बाहर उसे आधार न हो, तो वह स्व पर आधार खोज लेती है।
स्वाधार चैतन्य ही समाधि है।
समाधि सत्य का द्वार है। उसमें यह नहीं कि सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं, वरन् सब प्रश्न गिर जाते हैं। प्रश्नों का गिर जाना ही असली उत्तर है। जहां प्रश्न नहीं और केवल चैतन्य है- शुद्ध चैतन्य है, वही उत्तर है, वही ज्ञान है।
इस ज्ञान को पाये बिना जीवन निरर्थक है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

दर्पण नहीं, स्वयं को बदलो


सुबह हो गयी है। सूरज बदलियों में है और फुहार पड़ रही है। वर्षा ने सब गीला-गीला कर दिया है।
एक साधु पानी में भीगते मिलने आये हैं। कोई पंद्रह-बीस वर्ष हुए, तब उन्होंने आत्म-उपलब्धि के लिए गृह-त्याग किया था। त्याग तो हुआ, पर उपलब्धि नहीं हुई। इससे दुखी हैं। समाज और संबंध आत्म-लाभ में बाधा समझे जाते हैं। ऐसी मान्यता ने व्यर्थ में अनेकों को जीवन से तोड़ दिया है।
एक कहानी उनसे मैंने कही। एक पागल स्त्री थी। उसे पूर्ण विश्वास था कि उसका शरीर स्थूल, भौतिक नहीं है। वह अपने शरीर को दिव्य-काया मानती थी। कहती थी कि उसकी काया से और सुंदर काया पृथ्वी पर दूसरी नहीं है। एक दिन उस स्त्री को बड़े आदमकद आईने के सामने लाया गया। उसने अपने शरीर को उस दर्पण में देखा और देखते ही उसके क्रोध की सीमा न रही। उसने पास रखी कुर्सी उठाकर दर्पण पर फेंकी। दर्पण टुकड़े-टुकड़े हो गया, तो उसने सुख की सांस ली। दर्पण फोड़ने का कारण पूछा तो बोली थी कि वह मेरे शरीर को भौतिक किये दे रहा है। मेरे सौंदर्य को वह विकृत कर रहा था।
समाज और संबंध दर्पण से ज्यादा नहीं हैं। जो हममें होता है, वे केवल उसे ही प्रतिबिंबित कर देते हैं। दर्पण तोड़ना जैसे व्यर्थ है, संबंध छोड़ना भी वैसे ही व्यर्थ है। दर्पण को नहीं अपने को बदलना है। जो जहां है, वहीं यह बदलाहट हो सकती है। यह क्रांति केंद्र से शुरू होती है। परिधि पर काम करना व्यर्थ ही समय खोना है।
स्व पर सीधे ही काम शुरू कर देना है। समाज और संबंध कहीं भी बाधा नहीं हैं। बाधाएं कोई हैं, तो स्वयं में है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

किसी क्षण केवल जीकर देखो !

'जीवन का आदर्श क्या है?' एक युवक ने पूछा है।
रात्रि घनी हो गयी है और आकाश तारों से भरा है। हवाओं में आज सर्दी है और शायद कोई कहता था कि कहीं ओले पड़े हैं। राह निर्जन है और वृक्षों के तले घना अंधेरा है।
और इस शांत शून्य-घिरी रात्रि में जीना कितना आनंदमय है! होना मात्र ही कैसा आनंद है, पर हम 'मात्र जीना' नहीं चाहते हैं! हम तो किसी आदर्श के लिए जीन चाहते हैं। जीवन को साधन बनाना चाहते हैं, जो कि स्वयं साध्य है। यह आदर्श दौड़ सब विषाक्त कर देती है। यह आदर्श का तनाव सब संगीत तोड़ देता है।
अकबर ने एक बार तानसेन से पूछा था, 'तुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं गा पाते हो- उनमें कुछ अलौकिक दिव्यता है।' उत्तर में तानसेन ने कहा था, 'वे केवल गाते हैं- गाने के लिए गाते हैं। और मैं-मेरे गाने में उद्देश्य है।'
किसी क्षण केवल जीकर देखो। केवल जीओ- जीवन से लड़ो मत, छीना-झपटी न करो। चुप होकर देखो, क्या होता है! जो होता है, उसे होने दो। 'जो है', उसे होने दो। अपनी तरफ से सब तनाव छोड़ दो और जीवन को बहने दो। जीवन को घटित होने दो और जो घटित होगा- मैं विश्वास दिलाता हूं- वह मुक्त कर देता है।
आदर्श का भ्रम सदियों पाले गये अंधविश्वासों में से एक है। जीवन किसी और के लिए, कुछ और के लिए नहीं, बस जीने के लिए है। जो 'किसी लिए' जीता है, वह जीता ही नहीं है। जो केवल जीता है, वही जीता है। और वही उसे पा लेता है, जो कि पाने जैसा है। वही आदर्श को भी लेता है।
उस युवक की ओर देखता हूं। उसके चेहरे पर एक अद्भुत शांति फैल गयी है। वह कुछ बोलता नहीं है, पर सब बोल देता है। कोई एक घंटा मौन और शांत बैठकर वह गया है। वह बदलकर गया है। जाते समय उसने कहा है, 'मैं दूसरा व्यक्ति होकर जा रहा हूं।'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

स्वयं का साक्षात करो

रात्रि अभी गयी नहीं है और विदा होते तारों से आकाश भरा है। नदी एक पतली चांदी की धार जैसी मालूम होती है। रेत, रात गिरी ओस से ठंडी हो गयी है और हवाओं में बहुत ठंडक है।
एक गहरा सन्नाटा है और बीच-बीच में पक्षियों की आवाज उसे और गहरा बना देती है।
एक मित्र को साथ ले कुछ जल्दी ही इस एकांत में चला आया हूं। वे मित्र कह रहे हैं कि एकांत में भय मालूम होता है और सन्नाटा काटता सा लगता है। किसी भांति अपने को भरे रहें तो ठीक, अन्यथा न मालूम कैसा संताप और उदासी घेर लेती है।
यह संताप प्रत्येक को घेरता है। कोई भी अपना साक्षात नहीं करना चाहता है। स्वयं में झांकने से घबराहट मालूम होती है। और एकांत स्वयं के साथ छोड़ देता है, इसलिए एकांत भयभीत करता है। 'पर' में उलझे हो, तो 'स्व' भूल जाता है। वह एक तरह की मूच्र्छा है और पलायन है। सारे जीवन मनुष्य इस पलायन में लगा रहता है। यह पलायन अस्थायी है और मनुष्य किसी भी भांति अपने आप से बच नहीं सकता। बचाव के लिए की गयीं उसकी सब चेष्टाएं व्यर्थ हो जाती हैं। क्योंकि वह जिससे बचना चाह रहा है, वह स्वयं तो वही है। अपने कैसे बचा जा सकता है और अपने से कैसे भागा जा सकता है!
हम सब भाग सकते हैं, पर स्वयं से नहीं भाग सकते हैं। जीवन भर भागकर हम अंत में पायेंगे कि कहीं भी नहीं पहुंचे हैं। इसलिए जो विवेकशील हैं, वे स्वयं से भागते नहीं, स्वयं का साक्षात करते हैं।
मनुष्य भीतर झांके तो शून्य का अनुभव होता है। वहां अनंत शून्य है। इसलिए घबड़ाकर वह बाहर भागता है। उस शून्य को भरने का वह अनंत प्रयास करता है। संसार में और संबंधों में उस शून्य को भरना चाहता है। वह शून्य किसी भी तरह भरा नहीं जा सकता है। उसे भरना असंभव है और यही उसका संताप है और असफलता है।
मृत्यु इस संताप को उघाड़कर उसके सामने कर देती है। मृत्यु उसे इसी शून्य में डाल देती है, जिससे वह जीवन भर बचता था और इसलिए मृत्यु का भय सर्वोपरि है।
मैं कहता हूं, स्वयं के शून्य से भागना अज्ञान है। उसके साक्षात से, उसमें प्रवेश से जीवन का समाधान उपलब्ध होता है। धर्म शून्य में प्रवेश है। मनुष्य नितांत एकांत में अपने साथ जो करता है, वही धर्म है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

कौन हो तुम!!!

अमावस उतर रही है। पक्षी नीड़ों पर लौट आये हैं और घिरते अंधेरे में वृक्षों पर रात्रि-विश्राम के पूर्व चहल-पहल है। नगर में दीप जलने लगे हैं। थोड़ी ही देर बाद आकाश में तारे और नीचे दीप ही दीप हो जाने को हैं।
पूर्वीय आकाश में दो छोटी काली बदलियां तैर रही हैं। कोई साथी नहीं है- एकदम अकेला हूं। कोई विचार नहीं, बस बैठा हूं। और कितना आनंदप्रद है। आकाश और आकाश-गंगा अपने में समा गयी मालूम होती है।
विचार नहीं होते हैं, तो व्यक्ति-सत्ता, विश्व-सत्ता से मिल जाती है। एक छोटा-सा परदा है, अन्यथा प्रत्येक प्रभु है। आंख पर तिनका है और तिनके ने प्रभु को छिपा लिया है। यह छोटा-सा ही तिनका संसार बन गया है। इस छोटे-से तिनके के हटते ही अनंत आनंद-राज्य के द्वार खुल जाते हैं।
जीसस क्राइस्ट ने कहा है, 'जरा-सा झांकों भर, द्वार खुले ही हैं।' एक व्यक्ति सूर्यास्त की दिशा में भागा जा रहा था। उसने किसी से पूछा, 'पूर्व कहां है?' उत्तर मिला, 'पीठ भर फेर लो, पूर्व तो आंख के सामने ही मिल जायेगा।' सब उपस्थित है। ठीक दिशा में आंख भर फेरने की आवश्यकता है।
यह बात सारे जगत में कह देनी है। इसे ठीक से सुन भी लेना, बहुत-कुछ पा लेना है। स्व-दिव्यता की आस्था आधी उपलब्धि है।
मैंने आज ही मिलने आये एक मित्र से कहा है : संपत्ति पास है, केवल स्मरण नहीं रहा है। सम्यक स्मृति जगाओ- अपनी दिव्यता को स्मरण करो- कौन हो तुम? अपने को पूछो- पूछो- और इतना पूछो कि समस्त मन-प्राण पर वह अकेला स्वर गूंजता रह जाये। फिर अचेतन में उसका तीर उतर जाता है और वह अलौकिक उत्तर अपने आप सामने आ खड़ा होता है, जिसे जान लेना, सब-कुछ जान लेना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जीवन-अस्तित्व असीम है!!!


सूरज निकलता है। सर्दियों की सुबह। रात हवाएं ठंडी थीं। और सुबह दूब पर ओस कण भी फैले थे। अब तो किरणें उन्हें पी गयी हैं और धूप भी गरमा गयी है।
एक सुखद सुबह, दिन का प्रारंभ कर रही है। पक्षियों की अर्थहीन गीत भी कितनी अर्थपूर्ण मालूम होते हैं- पर शायद जीवन में कोई अर्थ नहीं है। और अर्थ की कल्पना मनुष्य की अपनी है। अर्थ नहीं- शायद इससे ही जीवन में अनंत गहराई और विस्तार है। अर्थ तो सीमा है। जीवन-अस्तित्व है असीम, इससे अर्थ वहां कोई भी नहीं है। और जो अपने को इस असीम में असीम कर लेता है, वह विराट अर्थ-शून्यता में अर्थ-शून्य हो जाता है, वह उसे पा लेता है 'जो है'- वह उस अस्तित्व को पा लेता है। सब अर्थ क्षुद्र है और क्षुद्र का है। सब अर्थ अहं के बिंदु से देखे गये हैं। अहं ही अर्थ का केंद्र है। उससे जो जगत देखा जाता है, वह वास्तविक जगत नहीं है। जो भी 'मैं' से संबंधित है, वह वास्तविक नहीं है।
सत्य अखंड इकाई है, वह 'मैं' और 'न-मैं' में विभाजित है। सब अर्थ 'मैं' का है। इससे जो अखंड है, 'मैं' और 'न-मैं' के अतीत है, वह अर्थ शून्य है। उसमें न अर्थ है न 'अर्थ-नहीं' है। उसे कोई भी नाम देना गलत है। उसे ईश्वर कहना भी गलत है। ईश्वर भी 'मैं' के ही प्रसंग में है। वह भी 'मैं' की ही धारणा है। कहें कि जो भी सार्थक है, वह व्यर्थ है। सार्थकता की सीमा के बाहर जाना- आध्यात्मिक हो जाना है।
बोधिधर्म से किसी ने पूछा था, 'पवित्र निर्वाण के संबंध में कुछ कहें'। वे बोले, 'पवित्रता कुछ भी नहीं, बस, शून्यता और केवल शून्यता'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रत्येक मुक्त है


एक प्रबोध कथा है।
एक युवक ने किसी साधु से पूछा था, 'मोक्ष की विधि क्या है?' उस साधु ने कहा, 'तुम्हें बांधा किसने है?' वह युवक एक क्षण रुका, फिर बोला, 'बांधा किसी ने भी नहीं है।'
तब उस साधु ने पूछा, 'फिर मुक्ति क्यों खोजते हो?'
'मुक्ति क्यों खोजते हो?' यही कल मैंने भी एक व्यक्ति से पूछा है। यही प्रत्येक को अपने से पूछना है। बंधन है कहां? जो है, उसके प्रति जागो। जो है, उसको बदलने की फिक्र छोड़ो। आदर्श कि पीछे मत दौड़ो। जो भविष्य में है, वह नहीं, जो वर्तमान है, वही तुम हो। और वर्तमान में कोई बंधन नहीं है। वर्तमान के प्रति जागते ही बंधन नहीं पाये जाते हैं।
आकांक्षा- कुछ होने और कुछ पाने की आकांक्षा ही बंधन है, वही तनाव है, वही दौड़ है, वही संसार है। यही आकांक्षा मोक्ष का निर्माण करती है। मोक्ष पाने के मूल में वही है। और बंधन मूल में हो, तो परिणाम में मोक्ष कैसे हो सकता है?
मोक्ष की शुरुआत मुक्त होने से करनी होती है। वह अंत नहीं, वही प्रारंभ है।
मोक्ष पाना नहीं है, वरन् दर्शन करना है कि मैं मोक्ष में ही खड़ा हूं। मैं मुक्त हूं, यह बोध शांत जाग्रत चेतना में सहज ही उपलब्ध हो जाता है। प्रत्येक मुक्त है- केवल इस सत्य के प्रति जागना मात्र है।
मैं जैसे ही दौड़ छोड़ता हूं- कुछ होने की दौड़ जैसे ही जाती है कि मैं हो आता हूं और 'हो आना' - पूरे अर्थो में हो आना ही मुक्ति है।
तथाकथित धार्मिक इस 'हो आने' को नहीं पाता है, क्योंकि वह दौड़ में है- मोक्ष पाने की, आत्मा को पाने की, ईश्वर को पाने की। और जो दौड़ में है, चाहे उस दौड़ का रूप कुछ भी क्यों न हो, वह अपने में नहीं है। धार्मिक होना आस्था की बात नहीं, किसी प्रयास की बात नहीं, किसी क्रिया की बात नहीं। धार्मिक होना तो अपने में होने की बात है। और यह मुक्ति एक क्षणमात्र में आ सकती है। यह सत्य के प्रति सजग होते ही, जागते ही कि बंधन दौड़ में है, आकांक्षा में है, आदर्श में है, अंधेरा गिर जाता है। और जो दिखता है, उसमें बंधन पाये ही नहीं जाते हैं।
सत्य एक क्षण में क्रांति कर देता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

सब विलीन हो जाने दो


'मैं साधक हूं। आध्यात्मिक साधना में लगा हूं। क्रमश: गति होती जा रही है, एक दिन प्राप्ति भी हो जाने को है।'
एक साधु ने एक दिन मुझ से यह कहा था। उनके शब्दों में मुझे साधना नहीं, वासना ही लगी थी। ऐसी साधना भी बधा है। जो है, उसे पाने का अभ्यास क्या करना है! उसे पाना भी तो नहीं, यह जानना है कि वह खोया ही नहीं गया है। और तथाकथित साधना का उपक्रम इस सत्य को छिपा देता है। उसके मूल में भी वासना है और कुछ पाने और कुछ बदलने की आकांक्षा है। मैं जो हूं, उसे बदलना है। 'आ' को 'ब' बनाना है। समस्त वासना के मूल में यही द्वंद्व होता है, यही द्वैत होता है। यह द्वैत ही जगत है और दुख है।
मैं कहता हूं, 'आप जो हो, उससे जरा भी कुछ और होने की आकांक्षा यदि है, तो आप 'जो हो' उसके विपरीत जा रहे हो।' और 'जो है'- वही मार्ग है। 'जो है'- उसके प्रति जागते ही जीवन एक सहजता और सौंदर्य से भर जाता है। एक स्वतंत्रता और मुक्ति श्वास-श्वास में भर जाती है। यह सौंदर्य तथाकथित अभ्यासी को कभी उपलब्ध नहीं होता है। उसमें एक हिंसा, एक दमन और कुछ 'होने' की वासना के लक्षण सहजता नष्ट कर देते हैं। इसलिए एक कुरूपता समस्त तथाकथित समस्त साधुओं में होती है।
फिर क्या करें? कुछ भी नहीं। न करना, कुछ भी न करना ध्यान है। कर्म में स्व नहीं है, विचार में स्व नहीं है। कर्म और विचार के बाहर होते ही वह आविष्कृत हो जाता है। सब छोड़ दो, सब मिट जाने दो, सब विलीन हो जाने दो। और फिर इस 'न-कुछ' में, इस शून्य में जो दिखता है, वही सब-कुछ है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मनुष्य का प्रौढ़ होना!


एक लड़की रो रही है। उसकी गुडि़या टूट गई है। और अब मैं सोचता हूं कि सब रोना क्या गुडि़यों के टूट जाने के लिए ही रोना नहीं है।
कल संध्या एक वृद्ध आये थे। उन्होंने जीवन में जो चाहा था, वह नहीं हो सका। वे उदास थे और संतापग्रस्त थे। एक महिला आज मिली थीं और बातें करते-करते आंसू पोंछ लेती थी। उन्होंने स्वप्न देखे थे और वे सत्य नहीं हुए हैं। और अब यह लड़की रो रही है। और क्या लड़की की आंखों में सब आंसुओं की बुनियादी झलक नहीं है! और उसके सामने टूटी पड़ी गुडि़यां में क्या सब आंसूओं का मूल साकार नहीं हुआ है? उसे कोई समझा रहा है कि आखिर गुडि़या ही तो है, उसके लिए रोना क्या है! यह सुन मुझे हंसी आ गयी है। काश, मनुष्य इतना ही जान ले तो क्या समस्त दुख समाप्त नहीं हो जाते?
गुडि़या-बस गुडि़या है, यह जानना कितना कठिन है!
मनुष्य मुश्किल से इतना प्रौढ़ हो पाता है कि यह जान सके। शरीर का प्रौढ़ होना एक बात है, मनुष्य का प्रौढ़ होना बिलकुल दूसरी बात है। प्रौढ़ता क्या है? मनुष्य की प्रौढ़ता मन से मुक्त होना है। मन जब तक है, तब तक गुडि़यों को बनाता रहता है। मन से मुक्त होते ही गुडि़यों से मुक्ति होती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

कागज के फूल

एक मित्र कागज के कुछ फूल भेंट कर गये हैं। इन फूलों को देखता हूं- जो दिख रहा है, उसके पार उनमें कुछ भी नहीं है। उनमें सब कुछ दृश्य है, अदृश्य कुछ भी नहीं। और बाहर क्यारियों में गुलाब के फूल खिले हैं, उनमें जो दिख रहा है, उसके पार कुछ अनदिखा भी है और वह अदृश्य ही उनका प्राण है।
आधुनिक सभ्यता कागज के फूलों की सभ्यता है। दिखने पर, दृश्य पर वह समाप्त है और इसलिये निष्प्राण भी है। अदृश्य से, अज्ञात से नाता टूट गया है। और इसलिए मनुष्य जितना आज जड़ों से अलग हो गया है, उतना इसके पूर्व कभी भी नहीं हुआ था।
वृक्ष, फूल, फल, पत्ते। सब दृश्य हैं, पर जड़े भूमि में होती हैं- जड़ें अज्ञात और अदृश्य होती हैं। और जो जड़े देखी जा सकती हैं, सब जड़ें उन पर ही समाप्त नहीं हो जाती हैं- और जड़ें भी हैं, जो देखी नहीं जा सकतीं।
प्राण यह जो महाप्राण से संयुक्त है, वह केंद्र अज्ञात ही नहीं, अज्ञेय भी है। इस अज्ञेय से संयुक्त मनुष्य वास्तविक जड़ों को पा जाता है। इस अज्ञेय को विचारों से नहीं पाया जा सकता है। विचार की सीमा ज्ञेय पर समाप्त है।
विचार स्वयं ज्ञेय और दृश्य हैं। और जो दृश्य है, वह अदृश्य को जानने का मध्यम नहीं बन सकता है। सत्ता विचार के पार है। अस्तित्व विचार के अतीत है। अस्तित्व को इसलिये जाना नहीं जाता है, हुआ जाता है। उससे पृथक, दर्शक होकर परिचित होना नहीं होता, वरन उसमें एक होकर होना होता है।
विचार छोड़कर, शांत, शून्य होकर, वह अद्वैत आता है, जो सत्य में, सत्ता में खड़ा कर देता है। कागज के फूल देखने हों, तो दूर से देखे जा सकते हैं। उनका द्रष्टा हुआ जा सकता है। पर, असली फूल देखने हों, तो फूल बन जाना जरूरी है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

कल्पना, स्वप्न और धारणाओं के विसर्जन करो


सुबह ही सुबह एक युवक आ गये हैं। उदास दिखते हैं और लगता है, जैसे भीतर किसी एकाकीपन ने घेर लिया है। कुछ जैसे खो गया है और आंखें उसे खोजती मालूम होती है। मेरे पास वे कई वर्ष से आ रहे हैं और ऐसे भी एक दिन आयेंगे यह भी भलीभांति जानता था। इसके पूर्व उनमें काल्पनिक आनंद था, वह धीरे-धीरे विलीन हो गया है।
कुछ देर सन्नाटा सरकता रहा है। उन्होंने आंखें बंद कर ली हैं और कुछ सोचते मालूम होते हैं। फिर प्रकटत: बोले, 'मैं अपनी आस्था खो चुका हूं, मैं एक स्वप्न में था, वह जैसे खंडित हो गया है। ईश्वर साथ मालूम होते था, अब अकेला रह गया हूं और बहुत घबराहट होती है। इतना असहाय तो मैं कभी भी नहीं था। पीछे वापस लौटना चाहता हूं, पर वह भी अब संभव नहीं दिखता है। वह सेतु खंडहर सा हो गया है।'
मैं कहता हूं : जो नहीं था, केवल वही छीना जा सकता है। जो है, उसका छीनना संभव नहीं है। स्वप्न और कल्पना के साथी से एकाकीपन मिटता नहीं है, केवल मूच्र्छा में दब जाता है। ईश्वर की कल्पना और मानसिक प्रक्षेप से मिला आनंद वास्तविक नहीं है। वह सहारा नहीं भ्रांति है। और भ्रांतियों से जितनी जल्दी छुटकारा हो, उतना ही अच्छा है। ईश्वर को वस्तुत: पाने के लिए समस्त मानसिक धारणाओं को त्यागना पड़ता है। और इन धारणाओं में ईश्वर की धारणा भी अपवाद नहीं है। वह भी छोड़नी पड़ती है। यही त्याग है और यही तप है। क्योंकि स्वप्नों को छोड़ने से अधिक कष्ट और किसी बात में नहीं है।
कल्पना, स्वप्न और धारणाओं के विसर्जन पर, 'जो है' वह अभिव्यक्त होता है। निद्रा टूटती है और जागरण आता है। फिर जो पाना है, वही वास्तविक पाना है, क्योंकि उसे कोई छीन नहीं सकता है। वह किसी और अनुभूति से खंडित नहीं होता है, क्योंकि वह परानुभूति नहीं, स्वानुभूति है। वह किसी दृश्य का दर्शन नहीं, स्वयं ईश्वर में होना है। ईश्वर की काल्पनिक धारणा और आस्था खो गयी है, तो घबराओ मत। यह शुभ ही है।
सब धारणाएं खो दो और फिर देखो। तब जो दिखाई पड़ता है, वही ईश्वर है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)