प्रार्थना

प्रार्थना क्या है? आत्म-विस्मरण! नहीं, प्रार्थना आत्म-विस्मरण नहीं है। वह जिसमें भूलना, डूबना और खोना है- मादकता का ही एक रूप है। वह प्रार्थना नहीं, पलायन है। शब्द में, संगीत में खोया जा सकता है। ध्वनि सम्मोहन में, नृत्य में 'जो है' उसका विस्मरण हो सकता है। यह विस्मरण और बेहोशी सुखद भी मालूम हो सकती है, पर यह प्रार्थना नहीं है। यह मूच्र्छा है, जब कि प्रार्थना सम्यक चेतना में जागरण का नाम है।
प्रार्थना क्या कोई क्रिया है? क्या कुछ करना प्रार्थना है?
नहीं, प्रार्थना क्रिया नहीं, वरन चेतना की एक स्थिति है। प्रार्थना की नहीं जाती है, प्रार्थना में हुआ जाता है। प्रार्थना मूलत: अक्रिया है। जब सब क्रियाएं शून्य हैं और केवल साक्षी चैतन्य शेष रह गया है, ऐसी स्थिति का नाम प्रार्थना है। प्रार्थना शब्द से 'करने' की ध्वनि निकलती है। ध्यान शब्द से भी 'करने' की ध्वनि निकलती है। पर दोनों शब्द क्रियाओं के लिए नहीं, चेतना की स्थिति के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
'शून्य में, मौन में, नि:शब्द में होना प्रार्थना है, ध्यान है।'
एक प्रार्थना सभा में मैंने कल यह कहा है।
किसी ने बाद में मुझ से पूछा,'फिर हम क्या करें?'
मैंने कहा, 'थोड़े समय को कुछ भी न करें। बिलकुल विश्राम में अपने को छोड़ दें। चुपचाप मन को देखते रहें, वह अपने से शांत और शून्य हो जाता है। इसी शून्य में, सत्य का सान्निध्य उपलब्ध होता है। इसी शून्य में वह प्रकट होता है, जो भीतर है और वह भी जो बाहर है। फिर बाहर और भीतर मिट जाते हैं और केवल वही रह जाता है 'जो है'।' इस शुद्ध 'है' की समग्रता का नाम ईश्वर है।
( सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

अमूर्त के दर्शन करने हैं, तो मूर्त को अग्नि दो

एक सर्द और अंधेरी रात में एक साधु किसी मंदिर में ठहरा था। उसने सर्दी दूर करने को भगवान की एक काष्ठ मूर्ति जला ली। आग जली देख पुजारी जाग गया। वह क्रोध में कुछ बोल भी न सका- वह कृत्य ऐसा ही असोचनीय था। तभी उसने देखा : साधु जली राख के ढेर में कुछ खोज रहा है। उसने पूछा कि क्या कर रहे हो? साधु ने कहा, 'भगवान की देह की अस्थियां खोजता हूं।' अब पुजारी के समक्ष उस साधु का पागलपन पूरी तरह स्पष्ट हो गया था। उसने साधु से कहा, 'पागल! लकड़ी में अस्थियां कहां रखी हैं?' साधु बोला, 'तब एक मूर्ति और लाने की कृपा करो, रात बहुत सर्द है और बहुत लंबी भी।'
मैं इस कथा को सोचता हूं और लगता है वह पागल साधु मैं ही हूं।
मैं चाहता हूं कि हम मूर्तियों से मुक्त हो सकें, ताकि जो अमूर्त है, उसके दर्शन संभव हों। रूप पर जो रुका है, वह अरूप पर नहीं पहुंच पाता है। आकार जिसकी दृष्टिं में है, वह निराकार सागर में कैसे कूदेगा? वह जो दूसरे की पूजा में है, वह अपने पर आ सके, यह कैसे संभव है? मूर्त को अग्नि दो, ताकि अमूर्त ही अनुभूति में शेष रहे और आकार की बदलियों को विसर्जित होने दो, ताकि निराकार आकाश उपलब्ध हो सके। रूप को बहने दो, ताकि नौका अरूप के सागर में पहुंचे। जो सीमा के तट से अपनी नौका छोड़ देता है, वह अवश्य ही असीम को पहुंचता और असीम हो जाता है।
( सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जहां विचार नहीं, वहां मन नहीं!

सत्य को पाना है, तो मन को छोड़ दो। मन के न होते ही सत्य आविष्कृत हो जाता है, वैसे ही जैसे किसी ने द्वार खोल दिए हों और सूर्य का प्रकाश भीतर आ गया हो। सत्य के आगमन को मन दीवार की भांति रोके हुए है। मन की इस दीवार की ईट विचारों से बनी है। विचार, विचार और विचार- विचारों की यह श्रंखला ही मन है। रमण ने किसी से कहा था, 'विचारों को रोक दो और फिर मुझे बताओ कि मन कहां है?'
विचार जहां नहीं है, वहां मन नहीं है। ईट न हो, तो दीवार कैसे होगी?
एक साधु रात्रि आये थे। पूछते थे, 'मन के साथ क्या करूं?' मैंने कहा, 'कुछ भी न करो। मन को छोड़ दो और देखो। उसे बिलकुल छोड़ दो और बस देखते रहो। जैसे कोई नदी के किनारे बैठकर जल प्रवाह को देखता है। ऐसे ही विचार प्रवाह को देखो- अलिप्त और असंग। देखते रहो और देखते रहो। उस देखने के आघात से विचार शून्य हो जाते हैं। और मन नहीं पाया जाता है।'
मन के हटते ही उसके रिक्त स्थान में जिसका अनुभव होता है, वही आत्मा है, वही सत्य है; क्योंकि वही सत्ता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

संयम और संगीत ही साधना है

सुबह जा चुकी है। धूप गर्म हो रही है और मन छाया में चलने को है।
एक वृद्ध अध्यापक आये हें। वर्षो से साधना में लगे हैं। तन सूख कर हड्डी हो गया है। आंखें धूमिल हो गयी हैं और गड्ढों में खो गयी हैं। लगता है कि अपनों ने बहुत सताया है और उस आत्मपीड़न को ही साधना समझते हैं।
प्रभु के मार्ग पर चलने को जो उत्सुकता है, उनमें अधिक का जीवन इसी भूल से विषाक्त हो जाता है। प्रभु को पाना, संसार का निषेध रूप ले लेता है और आत्मा की साधना, शरीर को नष्ट करने का। यह नकार दृष्टिं उन्हें नष्ट कर देती है और उन्हें खयाल भी नहीं आ पाता है कि पदार्थ का विरोध परमात्मा के साक्षात का पर्यायवाची नहीं हैं।
सच तो यह है कि देह के उत्पीड़क देहवादी होते हैं और संसार के विरोधी, बहुत सूक्ष्म रूप से संसार से ही ग्रसित होते हैं।
संसार के प्रति भोग-दृष्टिं जितनी बांधती है, विरोधी दृष्टिं उससे कम नहीं, ज्यादा ही बांधती है। संसार और शरीर का विरोध नहीं, अतिक्रमण करना साधना है। वह दिशा न भोग की है और न दमन की है। वह दिशा दोनों से भिन्न है।
वह तीसरी दिशा है। वह दिशा संयम की है। दो बिंदुओं के बीच मध्य बिंदु खोज लेना संयम है। पूर्ण मध्य में जो है, वह अतिक्रमण है। वह कहने को ही मध्य में है, वह कुछ भोग और कुछ दमन नहीं है। वह न भोग है और न दमन है। वह समझौता नहीं, संयम है।
अति असंयम है, मध्य संयम है। अति विनाश है, मध्य जीवन है। जो अति को पकड़ता है, वह नष्ट हो जाता है। भोग और दमन दोनों जीवन को नष्ट कर देते हैं। अति ही अज्ञान है और अंधकार है, मृत्यु है।
मैं संयम और संगीत को साधना कहता हूं।
वीणा के तार जब न ढीले होते हैं और न कसे होते हैं, तब संगीत पैदा होता है। बहुत ढीले तार भी व्यर्थ हैं और बहुत कसे तार भी व्यर्थ हैं। पर तारों की एक ऐसी स्थिति भी होती है, जब वे न कसे कहे जा सकते और न ढीले कहे जा सकते हैं। वह बिंदु ही उनमें संगीत का बिंदु बनता है। जीवन में भी वही बिंदु संयम का है। जो नियम संगीत का है, वह संयम का है। संयम से सत्य मिलता है।
संयम की यह बात उनसे कही है और लगता है कि जैसे उसे उन्होंने सुना है। उनकी आंखें गवाही हैं। जैसे कोई सोकर उठा हो, ऐसा उनकी आंखों में भाव है। वे शांत और स्वस्थ प्रतीत हो रहे हैं। कोई तनाव जैसे शिथिल हो गया है और को ई दर्शन उपलब्ध हुआ है।
मैने जाते समय उनसे कहा, 'सब तनाव छोड़ दें और फिर देखें। भोग छोड़ा है, दमन भी छोड़ दें। छोड़कर- सब छोड़कर देखें। सहज होकर देखें-सहजता ही स्वस्थ करती है, स्वभाव में ले जाती है।'
उन्होंने उत्तर में कहा, 'छोड़ने को अब क्या रहा है? छूट ही गया। मैं शांत और निर्भर हो कर जा रहा हूं। एक दुख स्वप्न जैसे टूट गया है। मैं बहुत उपकृत हूं।' उनकी आंखें बहुत सरल और शांत हो गयी हैं और उनकी मुस्कराहट बहुत भली लग रही है। वे वृद्ध हैं, पर बिलकुल बालक लग रहे हैं।
काश, यह उन सभी को दीख सके जो प्रभु में उत्सुक होते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

दीपक की लौ की भांति ही मनुष्य की चेतना है

सांझ से ही आंधी-पानी है। हवाओं के थपेड़ों ने बड़े वृक्षों को हिला डाला है। बिजली बंद हो गई है और नगर में अंधेरा है।
घर में एक दीपक जलाया गया है। उसकी लौ ऊपर की ओर उठ रही है। दीया भूमि का भाग है, पर लौ न मालूम किसे पाने निरंतर ऊपर की ओर भागती रहती है।
इस लौ की भांति ही मनुष्य चेतना भी है।
शरीर भूमि पर तृप्त है, पर मनुष्य में शरीर के अतिरिक्त भी कुछ है, जो निरंतर भूमि से ऊपर उठना चाहता है। यह चेतना ही, यह अग्नि-शिखा ही मनुष्य का प्राण है। यह निरंतर ऊपर उठने की उत्सुकता ही उसकी आत्मा है।
यह लौ है, इसलिए मनुष्य मनुष्य है, अन्यथा सब मिट्टी है।
यह लौ पूरी तरह जले तो जीवन में क्रांति घटित हो जाती है। यह लौ पूरी तरह दिखाई देने लगे तो मिट्टी के बीच ही मिट्टी को पार कर लिया जाता है।
मनुष्य एक दीया है। मिट्टी भी है, उसमें ज्योति भी है। मिट्टी पर ही ध्यान रहा, तो जीवन व्यर्थ हो जाता है। ज्योति पर ध्यान जाना चाहिए। ज्योति पर ध्यान जाते ही सब कुछ परिवर्तित हो जाता है, क्योंकि तब मिट्टी में ही प्रभु के दर्शन हो जाते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

दुख-विस्मरण से दुख नहीं मिटता

एक मंदिर पड़ोस में है। रात्रि वहां रोज ही भजन-कीर्तन होने लगता है। धूप की तीव्र गंध उसके बंद प्रकोष्ठ में भर जाती है। फिर आरती-वंदन होता है। वाद्य बजते हैं। घंटो का निनाद होता है और ढोल भी बजते हैं। फिर पुजारी नृत्य करता है और भक्तगण भी नाचने लगते हैं।यह देखने एक दिन मंदिर के भीतर गया था। जो देखा वह पूजा नहीं, मूच्र्छा थी। वह प्रार्थना के नाम पर आत्म-विस्मरण था। अपने को भूलना दुख-विस्मरण देता है। जो नशा करता है, वही काम धर्म के ऐसे रूप भी कर देता है।जीवन-संताप को कौन नहीं भूलना चाहता है? मादक द्रव्य इसीलिए खोजे जाते हैं। मादक-क्रिया काण्ड भी इसीलिए खोजे जाते हैं। मनुष्य ने बहुत तरह की शराबें बनाई हैं और सबसे खतरनाक शराबें वे हैं, जो कि बोतलों में बंद नहीं होती।दुख-विस्मरण से दुख मिटता नहीं है। उसके बीज ऐसे नष्ट नहीं होते, विपरीत, उसकी जड़े और मजबूत होती जाती हैं। दुख को भूलना नहीं, मिटाना होता है। उसे भूलना धर्म नहीं, वंचना है।दुख-विस्मरण का उपाय जैसे स्व-विस्मरण है, वैसे ही दुख-विनाश का स्व-स्मरण है।धर्म वह है, जो स्व को परिपूर्ण जाग्रत करता है। धर्म के शेष सब रूप मिथ्या हैं। स्व-स्मृति पथ है, स्व-विस्मृत विपथ है। यह भी स्मरण रहे कि स्व-विस्मृति से स्व मिटता नहीं है। प्रच्छन्न धरा प्रवाहित ही रहती है। स्व-स्मृति से ही स्व विसर्जित होता है।जो स्व को परिपूर्ण जानता है, वह स्व के विसर्जन को उपलब्ध हो, सर्व को पा लेता है। स्व के विस्मरण से नहीं, स्व के विसर्जन से सर्व की राह है।प्रभु के स्मरण से स्व को भूलना भूल है। स्व के बोध से स्व को मिटाना मार्ग है और जब स्व नहीं रह जाता है, तब जो शेष रह जाता है, वही प्रभु है। प्रभु स्व के विस्मरण से नहीं, स्व के विसर्जन से उपलब्ध होता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

सागर को पाना नहीं, पीना है

एक प्रभात गौतम बुद्ध बोलने को थे। पर इसके पहले कि वे अपना मौन तोड़ते, विहार के द्वार पर एक विहंग गीत गाने लगा था। उस शांत, उस निस्तब्ध प्रभात में फिर वे चुप ही रहे। सूर्य अपनी किरणों का जाल बुनता रहा और पक्षी गीत गाता रहा। बुद्ध चुप थे, तो सभी चुप थे। और उस मौन में, उस शून्य में वह गीत दिव्य हो गया था। गीत पूरा हुआ तो शून्य और गहरा हो गया था। बुद्ध फिर उठ गये। उस दिन वे कुछ भी नहीं बोले। उस दिन बस मौन प्रवचन ही हुआ था। उस मौन से उन्होंने जो कहा, वह किसी शब्द से कभी नहीं कहा गया है।
इस जगत में और इस जीवन में जो भी है, सब दिव्य है, सब भागवत है। सब में विराट की छाप और छाया है। वही सब में प्रच्छन्न है। वही सब में प्रकट है। उसका ही रूप है, उसकी ही ध्वनि है। पर हम चुप नहीं हैं, इसलिए उसे नहीं सुन पाते हैं। हमारी आंखें खुली नहीं हैं, इसलिए उसका दर्शन नहीं हो पाता है।
हम अतिशय हैं, इसलिए 'वह' नहीं होता है।
हम खाली हों, तो वह अभी और यहीं है।
सत्य है, वह स्व-मूच्र्छा में है, जैसे प्रकाश हो पर आंख बंद हो और फिर स्व को नहीं जगाते हैं, सत्य की खोज करते हैं। आंख तो खोलते नहीं हैं और प्रकाश का अनुसंधान करते हैं। इस भूल में कभी मत पड़ना। सब खोज छोड़ो और चुप हो जाओ। चित्त को चुप कर लो और सुनों। आंखें खुली कर लो और देखो। जैसे पानी की मछली मुझ से पूछे कि उसे सागर खोजना है, तो उससे मैं क्या कहूंगा? मैं उससे कहूंगा : खोज छोड़ों और देखो कि तुम सागर में ही हो। प्रत्येक सागर में है। सागर को पाना नहीं, पीना शुरू करना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)