स्व-ज्ञान ही जीवन है


रात पानी बरसा है। उसका गीलापन अभी तक है और मिट्टी से सोंधी सुगंध उठ रही है। सूरज काफी ऊपर उठ आया है और गायों का एक झुंड जंगल जा रहा है। उनकी काठ की घंटियां बड़ी मधुर बज रही हैं। मैं थोड़ी देर तक उन्हें सुनता रहा हूं। अब गायें दूर निकल गयी हैं और घंटियों की फीकी प्रतिध्वनि ही शेष रह गयी है।
इतने में कुछ लोग मिलने आये हैं। पूछ रहे हैं, 'मृत्यु क्या है?'
मैं कहता हूं, 'जीवन को हम नहीं जानते हैं, इसलिए मृत्यु है। स्व-विस्मरण मृत्यु है, अन्यथा मृत्यु नहीं है, केवल परिवर्तन है। 'स्व' को न जानने से एक कल्पित 'स्व' हमने निर्मित किया है। यही है हमारा 'मैं' -अहंकार।'
यह है नहीं, केवल भासता है। यह झूठी इकाई ही मृत्यु में टूटती है। इसके टूटने से दुख होता है, क्योंकि इसी से हमने अपना तादात्म्य स्थापित किया था। जीवन में ही इस भ्रांति को पहचान लेना मृत्यु से बच जाना है। जीवन को जान लो और मृत्यु समाप्त हो जाती है। जो है, वह अमृत है। उसे जानते ही नित्य, शाश्वत जीवन उपलब्ध हो जाता है।
कल एक सभा में यही कहा है : 'स्व-ज्ञान जीवन है। स्व-विस्मरण मृत्यु है।'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मौन का संगीत

दोपहर की शांति। उजली धूप और पौधे सोये-सोये
से एक जामुन की छाय तले दूब पर आ बैठा हूं। रह-रह कर पत्ते ऊपर गिर रहे हैं- अंतिम, पुराने पत्ते मालूम होते हैं। सारे वृक्षों पर नई पत्तियां आ गई हैं। और नई पत्तियों के साथ न मालूम कितनी नई चिडि़यों और पक्षियों का आगमन हुआ है। उनके गीतों का जैसे कोई अंत ही नहीं है। कितने प्रकार की मधुर ध्वनियां इस दोपहर को संगीत दे रही हैं, सुनता हूं और सुनता रहता हूं और फिर मैं भी एक अभिनव संगीत-लोक में चला जाता हूं।
'स्व' का लोक, संगीत का लोक ही है।
यह संगीत प्रत्येक के पास है। इसे पैदा नहीं करना होता है। यह सुन पड़े, इसके लिए केवल मौन होना होता है। चुप होते ही कैसे एक परदा उठ जाता है! जो सदा से था, वह सुन पड़ता है और पहली बार ज्ञात होता है कि हम दरिद्र नहीं हैं। एक अनंत संपत्ति का पुनराधिकार मिल जाता है। फिर कितनी हंसी आती है- जिसे खोजते थे, वह भीतर ही बैठा था!
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

विवेक, बुद्धि और वृत्ति


मैं तीन छोटे-छोटे शब्दों पर मनुष्य की समग्र चेतना को घूमते देखता हूं। वे तीन शब्द कौन से हैं?
वे शब्द हैं- विवेक, बुद्धि और वृत्ति।
विवेक से श्रेष्ठतम चलते हैं। बुद्धि से वे जो मध्य में हैं। और वृत्ति चेतना की निम्नतम दशा है।
वृत्ति पाशविक है। बुद्धि मानवीय है। विवेक दिव्य है।
वृत्ति सहज और आंधी है। वह निद्रा है। वह अचेतन का जगत है। वहां न शुभ है, न अशुभ है। कोई भेद वहां नहीं है। इसमें कोई अंतर्सघर्ष भी नहीं है। वह आंधी वासनाओं का सहज प्रवाह है।
बुद्धि न निद्रा है, न जागरण है। वह अर्ध-मूच्र्छा है। वह वृत्ति और विवेक के बीच संक्रमण है। वह दहलीज है। उसमें एक अंश चैतन्य हो गया है। लेकिन शेष अचेतन है। इससे भेद बोध है। शुभ-अशुभ का जन्म है। वासना भी है, विचार भी है।
विवेक पूर्ण जागृति है। वह शुद्ध चैतन्य है। वह केवल प्रकाश है। वहां भी कोई संघर्ष नहीं है। वह भी सहज है। वह शुभ का, सत का, सौंदर्य का सहज प्रवाह है।
वृत्ति भी सहज, विवेक भी सहज। वृत्ति आंधी सहजता, विवेक सजग सहजता। बुद्धि भर असहज है। उसमें पीछे की ओर वृत्ति है, आगे की और विवेक है। उसके शिखर की लौ विवेक की ओर और आधार की जड़े वृत्ति में हैं। सतह कुछ, तलहटी कुछ। यही खिंचाव है। पशु में डूबने का आकर्षण- प्रभु में उठने की चुनौती- उसमें दोनों एक साथ हैं!
इस चुनौती से डरकर जो पशु में डूबने का प्रयास करते हैं, वे भ्रांति में हैं। जो अंश चैतन्य हो गया है, वह अब अचेतन नहीं हो सकता है। जगत-व्यवस्था में पीछे लौटने का कोई मार्ग नहीं है।
इस चुनौती को मानकर जो सतह पर शुभ-अशुभ का चुनाव करते हैं, वे भी भ्रांति में हैं। उस तरह का चुनाव व आचरण-परिवर्तन सहज नहीं हो सकता है। वह केवल चेष्टिंत अभिनय है। और जो चेष्टिंत है, वह शुभ नहीं है। प्रश्न सतह पर नहीं है, तलहटी में है। वह जो सोया है, उसे जगाना है। अशुभ नहीं, मूच्र्छा छोड़नी है।
अंधेरे में दिया जलाना है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मनुष्य-मनुष्यता


पूर्णिमा है, लेकिन आकाश बादलों से ढका है। मैं राह से आया हूं। एक रेत के ढेर पर कुछ बच्चे खेल रहे थे। उन्होंने रेत के कुछ घर बनाए और उस पर से ही उनके बीच में झगड़ा हो गया था। रेत के घरों पर ही सारे झगड़े होते हैं। वे तो बच्चे ही थे, पर थोड़ी देर में जो बच्चे नहीं थे, वे भी उसमें सम्मिलित हो गये। बच्चों के झगड़े में, बाद में उनके बड़े भी सम्मिलित हो गये थे।
मैं किनारे खड़ा सोचता रहा कि बच्चों और बड़ों का विभाजन कितना कृत्रिम है! आयु वस्तुत: कोई भेद नहीं लाती और उससे प्रौढ़ता का कोई संबंध नहीं है।
हममें से अधिक बच्चे ही मर जाते हैं। लाओत्से के संबंध में कथा है कि वह बूढ़ा ही पैदा हुआ था। यह बात बहुत अस्वाभाविक लगती है। पर क्या इससे भी अधिक अस्वाभाविक घटना यह नहीं है कि कोई मरते समय तक भी प्रौढ़ता को उपलब्ध न हो पाये! शरीर विकसित हो जाते हैं, पर चित्त वहीं का वहीं ठहरा रह जाता है। तभी तो संभव है कि रेत के घरों पर झगड़े चलें और आदमी- आदमी के वस्त्रों को उतार क्षण में नग्न हो जाये और जाहिर कर दे कि सब विकास की बातें व्यर्थ हैं। और कौन कहता है कि मनुष्य पशु से पैदा हुआ है? मनुष्य के पशु से पैदा होने की बात गलत है, क्योंकि वह तो अभी भी पशु ही है।
क्या कभी मनुष्य पैदा नहीं हुआ है?
मनुष्य को गहरा देखने में जो उत्तर मिलता है। वह 'हां' में नहीं मिलता है। डायोजनीज दिन को, भरी दोपहरी में भी अपने साथ एक जलती हुई लालटेन लिये रहता था और कहता था कि मैं मनुष्य को खोज रहा हूं। वह जब वृद्ध हो गया था, तो किसी ने उससे पूछा, 'मनुष्य खोज लेने की आशा है।' उसने कहा, 'हां', क्योंकि अब भी जलती हुई लालटेन मेरे पास है।'
मैं खड़ा रहा हूं और उस रेत के ढेर के पास बहुत भीड़ इकट्ठी हो गयी है और लोग गाली-गलौज का और एक-दूसरे को डराने-धमकाने का बहुत रस-मुग्ध हो पान कर रहे हैं। जो लड़ रहे हैं, उनकी आंखों में भी बहुत चमक मालूम हो रही है। कोई पाशविक आनंद जरूर उनकी आंखों और गतिविधियों में प्रवाहित हो रहा है।
जिब्रान ने लिखा है- एक दिन मैंने खेत में खड़े एक काठ के पुतले से पूछा, 'क्या तुम इस खेत में खड़े-खड़े उकता नहीं जाते हो?' उसने उत्तर दिया, 'ओह! पक्षियों को डराने का आनंद इतना है कि समय कब बीत जाता है, कुछ पता ही नहीं चलता।' मैंने क्षण भर सोचकर कहा, 'यह सत्य है, क्योंकि मुझे भी इस आनंद का अनुभव है।' पुतला बोला, 'हां, वे ही व्यक्ति जिनके शरीर में घास-फूस भरा है, इस आनंद से परिचित हो सकते हैं!' पर इस आनंद से तो सभी परिचित मालूम हाते हैं। क्या हम सबके भीतर घास-फूस ही नहीं भर हुआ है? और क्या हम भी खेत में खड़े झूठे आदमी ही नहीं हैं?
उस रेत के ढेर पर यही आनंद देखकर लौटा हूं और क्या सारी पृथ्वी के ढेर पर भी यही आनंद नहीं चल रहा है?
यह अपने से पूछता हूं और रोता हूं। उस मनुष्य के लिए रोता हूं, जो कि पैदा हो सकता है, पर पैदा नहीं हुआ है। जो कि प्रत्येक के भीतर है, पर वैसे ही छिपा है, जैसे राख में अंगारे छिपा होता है।
वस्तुत: शरीर घास-फूस के ढेर से ज्यादा नहीं है। जो उस पर समाप्त है, अच्छा था कि वह किसी खेत में होता, तो कम से कम फसलों को पक्षियों से बचाने के काम तो आ जाता। मनुष्य की सार्थकता तो उतनी भी नहीं है!
शरीर से जो अतीत है, उसे जाने बिना कोई मनुष्य नहीं बनता है। आत्मा को जाने बिना कोई मनुष्य नहीं बनता है। मनुष्य की भांति पैदा हो जाना एक बात है, मनुष्य होना बिलकुल दूसरी बात है।
मनुष्य को तो स्वयं के भीतर स्वयं को जन्म देना होता है। यह वस्त्रों की भांति नहीं है कि उसे ओढ़ा जा सके। मनुष्यता के वस्त्रों को ओढ़कर कोई मनुष्य नहीं बनता है, क्योंकि वे उसी समय तक उसे मनुष्य बनाये रखते हैं, जब तक कि मनुष्यता की वस्तुत: कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है। आवश्यकता आते ही वे कब गिर जाते हैं, ज्ञात भी नहीं हो पाता है।
बीज जैसे अपने प्राणों को परिवर्तित का अंकुर बनता है- किन्हीं वस्त्रों को धारण करके नहीं- वैसे ही मनुष्य को भी अपनी समस्त प्राण-सत्ता एक नये ही आयाम में अंकुरित करनी होती है, तभी उसका जन्म होता है और परिवर्तन होता है।
और तब उसका आनंद कांटों को फेंकने में नहीं, कांटों को उठाने में और फूलों को बिखेरने में परिणत हो जाता है। वह घड़ी ही घोषणा करती है कि अब वह घास-फूस नहीं है- मनुष्य है, देह नहीं, आत्मा है।
गुरजिएफ ने कहा है, 'इस भ्रम को छोड़ दें कि प्रत्येक के पास आत्मा है।' सच ही जो सोया है, उसके पास आत्मा है या नहीं, इससे क्या अंतर पड़ता है! वही वास्तविक है- जो है। आत्मा सबकी संभावना है, पर उसे जो सत्य बनाता है, वही उसे पाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

समाधि


मैं मनुष्य को शब्दों से घिरा देखता हूं। पर शास्त्र और शब्द व्यर्थ हैं। उस भांति सत्य के संबंध में जाना जा सकता है, लेकिन सत्य को जानने का वह मार्ग नहीं है।
शब्द से सत्ता नहीं आती है। सत्ता का द्वार शून्य है।
शब्द से नि:शब्द में छलांग लगाने का साहस ही धार्मिकता है।
विचार 'पर' को जानने का उपाय है। वह 'स्व' को नहीं देता है। 'स्व' उसके पीछे जो है। 'स्व' सबके पूर्व है। 'स्व' से हम सत्ता में संयुक्त होते हैं। विचार भी 'पर' है। वह भी जब नहीं है, तब 'जो है' वह होता है। उसके पूर्व मैं 'अहं' हूं और उसमें 'ब्रह्मं' हूं।
सत्य में, सत्ता में स्व-पर मिट जाता है। वह भेद भी विचार में और विचार का ही था।
चेतना के तीन रूप हैं- बाह्य मू‌िर्च्छत-अंतर्मू‌िर्च्छत, बाह्य जाग्रत-अंतर्मू‌िर्च्छत और बाह्य जाग्रत-अंतर्जाग्रत। पहला रूप : मूच्र्छा- अचेतना का है। वह जड़ता है। वह विचार पूर्व की स्थिति है। दूसरा रूप : अर्ध-मूच्र्छा- अर्ध चेतना का है। वह जड़ और चेतना के बीच है। वह विचार की स्थिति है। तीसरा रूप : अमूच्र्छा- पूर्ण चेतना का है। वह पूर्ण चैतन्य है और विचारातीत है।
सत्य को जानने के लिए केवल विचाराभाव ही नहीं पाना है। वह तो जड़ता में, मूच्र्छा में ले जाते है। धर्म के नाम से प्रचलित बहुत सही क्रियाएं मूच्र्छा में ही ले जाती हैं। शराब, सेक्स और संगीत भी मूच्र्छा में ही ले जाती हैं। मूच्र्छा में पलायन है। वह उपलब्धि नहीं है।
सत्य को पाने के लिए विचार-शून्यता ओर चैतन्य पाना होता है। उस स्थिति का नाम समाधि है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

समयातीत होना आनंद है

कल दोपहर एक पहाड़ी के आंचल में था। धूप-छाया के विस्तार में बड़ी सुखद घडि़यां बीतीं। निकट ही था, एक तालाब और हवा के तेज थपेड़ों ने उसे बेचैन कर रखा था। लहरें उठती-गिरतीं और टूटती उसका सब कुछ विक्षुब्ध था।
फिर हवाएं सो गयीं और तालाब भी सो गया।
मैंने कहा, 'देखो, जो बेचैन होता है, वह शांत भी हो सकता है। बेचैनी अपने में शांति छपाए हुए है। तालाब अब शांत है, तब भी शांत था। लहरें ऊपर ही थीं, भीतर पहले भी शांति थी।'
मनुष्य भी ऊपर ही अशांत है। लहरें ऊपर ही हैं, भीतर गहराई में घना मौन है। विचारों की हवाओं से दूर चलें और शांत सरोवर के दर्शन हो जाते हैं। यह सरोवर 'अभी और यहीं' पाया जा सकता है। समय का प्रश्न नहीं है, क्योंकि समय वहीं तक है, जहां तक विचार हैं। ध्यान समय के बाहर है। ईशा ने कहा, 'और वह समय नहीं है। .....'
समय में दुख है। समय दुख है। समयातीत होना आनंद
में होना है।
चलो मित्र, समय के बाहर चलें- वहीं हम हैं। समय के भीतर जो दिखता है, वह समय के बाहर ही है। इतना जानना ही चलना है। जाना कि हवाएं रुक जाती हैं और सरोवर शांत हो जाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

आंखें खोलो, स्वर्ग का राज तुम्हारा है


नीले नभ के नीचे सूरज की गर्मी फैल गयी है। सर्दी घनी हो गई है और दूब पर जमे ओस के कण बर्फ जैसे ठण्डे लगते हैं। फूलों से ओस की बूंदे टपक रही हैं। रातरानी रात भर सुगंध देकर सो गई है।एक मुर्गा बांग देता है और फिर दूर-दूर से उसके प्रत्युत्तर आते हैं। वृक्ष मलय के झोंकों से कांप रहे हैं और चिडि़यों के गीत बंद ही नहीं होते हैं।सुबह अपने हस्ताक्षर सब जगह कर देती है। सारा जगत अचानक कहने लगता है कि सुबह हो गई है।मैं बैठा दूर वृक्षों में खो गये रास्ते को देखता हूं। धीरे-धीरे राह भरने लगती है और लोग निकलते हैं। वे चलते, पर सोये से लगते हैं। किसी आंतरिक तंद्रा ने सबको पकड़ा हुआ है। सुबह के इन आनंद क्षणों के प्रति वे जागे हुए नहीं लगते हैं, जैसे कि उन्हें ज्ञात ही नहीं कि जो जगत के पीछे है, वह इन क्षणों में अनायास प्रकट हो जाता है।जीवन में कितना संगीत है और मनुष्य कितना बधिर है!जीवन में कितना सौंदर्य है और मनुष्य कितना अंधा है!जीवन में कितना आनंद है और मनुष्य कितना संवेदन-शून्य है!उस दिन उन पहाडि़यों पर गया था। उन सुंदर पर्वत-पंक्तियों में हम देर तक रुके थे; पर जो मेरे साथ थे, वे जीवन की दैनंदिन क्षुद्र बातों में ही लगे हुए थे। उन सब बातों में जिनका कोई अर्थ नहीं, जिनका होना न होना बराबर है। इन बातों की ओट ने उन्हें उस पर्वतीय संध्या के सौंदर्य से वंचित कर दिया था। इस तरह क्षुद्र में आवेष्टिंत हम विराट से अपरिचित रह जाते हैं और जो निकट ही है, वह अपने हाथों दूर पड़ जाता है।मैं कहना चाहता हूं, ''ओ मनुष्य! तुझे खोना कुछ भी नहीं है, सिवाय अपने अंधेपन के और पा लेना है, सब-कुछ। अपने हाथों बने भिखारी! आंखें खोल। पृथ्वी और स्वर्ग का सारा राज्य तेरा है।''(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)