मनुष्य का प्रौढ़ होना!


एक लड़की रो रही है। उसकी गुडि़या टूट गई है। और अब मैं सोचता हूं कि सब रोना क्या गुडि़यों के टूट जाने के लिए ही रोना नहीं है।
कल संध्या एक वृद्ध आये थे। उन्होंने जीवन में जो चाहा था, वह नहीं हो सका। वे उदास थे और संतापग्रस्त थे। एक महिला आज मिली थीं और बातें करते-करते आंसू पोंछ लेती थी। उन्होंने स्वप्न देखे थे और वे सत्य नहीं हुए हैं। और अब यह लड़की रो रही है। और क्या लड़की की आंखों में सब आंसुओं की बुनियादी झलक नहीं है! और उसके सामने टूटी पड़ी गुडि़यां में क्या सब आंसूओं का मूल साकार नहीं हुआ है? उसे कोई समझा रहा है कि आखिर गुडि़या ही तो है, उसके लिए रोना क्या है! यह सुन मुझे हंसी आ गयी है। काश, मनुष्य इतना ही जान ले तो क्या समस्त दुख समाप्त नहीं हो जाते?
गुडि़या-बस गुडि़या है, यह जानना कितना कठिन है!
मनुष्य मुश्किल से इतना प्रौढ़ हो पाता है कि यह जान सके। शरीर का प्रौढ़ होना एक बात है, मनुष्य का प्रौढ़ होना बिलकुल दूसरी बात है। प्रौढ़ता क्या है? मनुष्य की प्रौढ़ता मन से मुक्त होना है। मन जब तक है, तब तक गुडि़यों को बनाता रहता है। मन से मुक्त होते ही गुडि़यों से मुक्ति होती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

कागज के फूल

एक मित्र कागज के कुछ फूल भेंट कर गये हैं। इन फूलों को देखता हूं- जो दिख रहा है, उसके पार उनमें कुछ भी नहीं है। उनमें सब कुछ दृश्य है, अदृश्य कुछ भी नहीं। और बाहर क्यारियों में गुलाब के फूल खिले हैं, उनमें जो दिख रहा है, उसके पार कुछ अनदिखा भी है और वह अदृश्य ही उनका प्राण है।
आधुनिक सभ्यता कागज के फूलों की सभ्यता है। दिखने पर, दृश्य पर वह समाप्त है और इसलिये निष्प्राण भी है। अदृश्य से, अज्ञात से नाता टूट गया है। और इसलिए मनुष्य जितना आज जड़ों से अलग हो गया है, उतना इसके पूर्व कभी भी नहीं हुआ था।
वृक्ष, फूल, फल, पत्ते। सब दृश्य हैं, पर जड़े भूमि में होती हैं- जड़ें अज्ञात और अदृश्य होती हैं। और जो जड़े देखी जा सकती हैं, सब जड़ें उन पर ही समाप्त नहीं हो जाती हैं- और जड़ें भी हैं, जो देखी नहीं जा सकतीं।
प्राण यह जो महाप्राण से संयुक्त है, वह केंद्र अज्ञात ही नहीं, अज्ञेय भी है। इस अज्ञेय से संयुक्त मनुष्य वास्तविक जड़ों को पा जाता है। इस अज्ञेय को विचारों से नहीं पाया जा सकता है। विचार की सीमा ज्ञेय पर समाप्त है।
विचार स्वयं ज्ञेय और दृश्य हैं। और जो दृश्य है, वह अदृश्य को जानने का मध्यम नहीं बन सकता है। सत्ता विचार के पार है। अस्तित्व विचार के अतीत है। अस्तित्व को इसलिये जाना नहीं जाता है, हुआ जाता है। उससे पृथक, दर्शक होकर परिचित होना नहीं होता, वरन उसमें एक होकर होना होता है।
विचार छोड़कर, शांत, शून्य होकर, वह अद्वैत आता है, जो सत्य में, सत्ता में खड़ा कर देता है। कागज के फूल देखने हों, तो दूर से देखे जा सकते हैं। उनका द्रष्टा हुआ जा सकता है। पर, असली फूल देखने हों, तो फूल बन जाना जरूरी है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

कल्पना, स्वप्न और धारणाओं के विसर्जन करो


सुबह ही सुबह एक युवक आ गये हैं। उदास दिखते हैं और लगता है, जैसे भीतर किसी एकाकीपन ने घेर लिया है। कुछ जैसे खो गया है और आंखें उसे खोजती मालूम होती है। मेरे पास वे कई वर्ष से आ रहे हैं और ऐसे भी एक दिन आयेंगे यह भी भलीभांति जानता था। इसके पूर्व उनमें काल्पनिक आनंद था, वह धीरे-धीरे विलीन हो गया है।
कुछ देर सन्नाटा सरकता रहा है। उन्होंने आंखें बंद कर ली हैं और कुछ सोचते मालूम होते हैं। फिर प्रकटत: बोले, 'मैं अपनी आस्था खो चुका हूं, मैं एक स्वप्न में था, वह जैसे खंडित हो गया है। ईश्वर साथ मालूम होते था, अब अकेला रह गया हूं और बहुत घबराहट होती है। इतना असहाय तो मैं कभी भी नहीं था। पीछे वापस लौटना चाहता हूं, पर वह भी अब संभव नहीं दिखता है। वह सेतु खंडहर सा हो गया है।'
मैं कहता हूं : जो नहीं था, केवल वही छीना जा सकता है। जो है, उसका छीनना संभव नहीं है। स्वप्न और कल्पना के साथी से एकाकीपन मिटता नहीं है, केवल मूच्र्छा में दब जाता है। ईश्वर की कल्पना और मानसिक प्रक्षेप से मिला आनंद वास्तविक नहीं है। वह सहारा नहीं भ्रांति है। और भ्रांतियों से जितनी जल्दी छुटकारा हो, उतना ही अच्छा है। ईश्वर को वस्तुत: पाने के लिए समस्त मानसिक धारणाओं को त्यागना पड़ता है। और इन धारणाओं में ईश्वर की धारणा भी अपवाद नहीं है। वह भी छोड़नी पड़ती है। यही त्याग है और यही तप है। क्योंकि स्वप्नों को छोड़ने से अधिक कष्ट और किसी बात में नहीं है।
कल्पना, स्वप्न और धारणाओं के विसर्जन पर, 'जो है' वह अभिव्यक्त होता है। निद्रा टूटती है और जागरण आता है। फिर जो पाना है, वही वास्तविक पाना है, क्योंकि उसे कोई छीन नहीं सकता है। वह किसी और अनुभूति से खंडित नहीं होता है, क्योंकि वह परानुभूति नहीं, स्वानुभूति है। वह किसी दृश्य का दर्शन नहीं, स्वयं ईश्वर में होना है। ईश्वर की काल्पनिक धारणा और आस्था खो गयी है, तो घबराओ मत। यह शुभ ही है।
सब धारणाएं खो दो और फिर देखो। तब जो दिखाई पड़ता है, वही ईश्वर है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मन आनंदोमुखी है


एक साधु कल आये थे। ध्यान की साधना पर उनसे बातें हुई हैं। यह जानकार बहुत आश्चर्य होता है कि मन के स्वरूप के संबंध में कितनी भ्रांत और मिथ्या धारणाएं प्रचलित हैं। उसे शत्रु मानकर साधना प्रारंभ करने से सब साधना गलत हो जाती हैं। न मन शत्रु है, न शरीर शत्रु है। वे तो यंत्र हैं और सहयोगी हैं। चेतना उनका जैसा उपयोग करना चाहे, कर सकती है। प्रारंभ से ही शत्रुता और संघर्ष की वृत्ति-दमन करती है। और परिणाम स्वरूप सारा जीवन विषाक्त हो जाता है।
मनुष्य का मन स्वभावत: आनंदोमुखी है। इससे कुछ बुरा भी नहीं है। यह तो उसका स्वरूप के प्रति आकर्षण है। यह न हो, तो व्यक्ति कभी आत्मिक जीवन की ओर नहीं जा सकता। यह मन आनंद की खोज संसार में करता है और फिर जब उसे वहां नहीं पाता है, तो भीतर की ओर मुड़ता है।
आनंद केंद्र है-संसार का भी, मोक्ष का भी। उसकी धुरी पर ही सारा लौकिक-पारलौकिक जीवन घूमता है।
इस आनंद की झलक बाहर दिखती है, इससे बाहर दौड़ होती है। ध्यान से इस आनंद का वास्तविक स्रोत दिखने लगता है, इससे दिशा वहां मुड़ जाती है। मन को जबरदस्ती भीतर नहीं मोड़ना है। इस दमन से ही वह शत्रु मालूम होने लगता है। आनंद का नया आयाम खोलना है। इस आयाम के खुलते ही मन अपने आप भीतर जाता पाया जाता है। वह तो आनंदोमुखी है। जहां आनंद है, वहां उसकी सहज गति है।
आनंद जीवन का लक्ष्य है। आनंद-अखंड आनंद, जीवन का उद्देश्य है। संसार में उसकी झलक है- प्रतिफलन है। मोक्ष में उसका मूलस्रोत है। बाहर उसका प्रक्षेप है, भीतर उसका मूल है। परिधि पर छाया है, केंद्र उसके प्राण हैं।
इससे संसार-मोक्ष का विरोधी नहीं है। बाहर-भीतर का शत्रु नहीं है। समस्त सत्ता एक संगीत है। इस सत्य के दर्शन होते ही व्यक्ति बंधन के बाहर हो जाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

स्व-अज्ञान मूर्च्‍छा है


एक पूर्णिमा की रात्रि मधुशाला से कुछ लोग नदी-तट पर नौका विहार को गये थे। उन्होंने एक नौका को खेया, अर्ध-रात्रि से प्रभात तक वे अथक पतवार चलाते रहे थे। सुबह सूरज निकला, ठंडी हवाएं बहीं तो उनकी मधु-मूर्च्‍छा टूटने लगी। उन्होंने सोचा कि अब वापस लौटना उचित है। यह देखने के लिए कि कहां तक चले आये हैं, वे नौका से तट पर उतरे। पर तट पर उतरते ही उनकी हैरानी की सीमा न रही, क्योंकि उन्होंने पाया कि नौका वहीं खड़ी है, जहां रात्रि उन्होंने उसे पाया था!
रात्रि वे भूल ही गये थे कि पतवार चलाना भर पर्याप्त नहीं है, नौका को तट से खोलना भी पड़ता है।
आज संध्या यह कहानी कही है। एक वृद्ध आये थे। वे कह रहे थे, मैं जीवन भर चलता रहा हूं, लेकिन अब अंत में ऐसा लगता है कि कहीं पहुंचना नहीं हुआ। उनसे ही यह कहानी कहनी पड़ी है। मनुष्य मू‌िर्च्छत है। स्व-अज्ञान उसकी मूच्र्छा है।
इस मूच्र्छा में समस्त कर्म उसका यांत्रिक है। इस विवेक-शून्य स्थिति में वह चलता है, जैसे कोई निद्रा में चलता है, पर कहीं पहुंच नहीं पाता है। नाव की जंजीर जैसे तट से बंधी रह गयी थी, ऐसे ही इस स्थिति में वह भी कहीं बंधा रह जाता है।
इस बंधन को धर्म ने वासना कहा है। वासना से बंधा मनुष्य, आनंद के निकट पहुंचने के भ्रम में बना रहता है। पर उसकी दौड़ एक दिन मृग-मरीचिका सिद्ध होती है। वह कितनी ही पतवार चलाये, उसकी नाव अतृप्ति के तट को छोड़ती ही नहीं है। वह रिक्त और अपूर्ण ही जीवन को खो देता है। वासना स्वरूपत: दुष्पूर है। जीवन चूक जाता है- वह जीवन जिसमें दूसरा किनारा पाया जा सकता था, वह जीवन जिसमें यात्रा पूरी हो सकती थी, व्यर्थ हो जाता है और पाया जाता है कि नाव वहीं की वहीं खड़ी है।
प्रत्येक नाविक जानता है कि नाव को सागर में छोड़ने के पहले तट से खोलना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य को भी जानना चाहिए कि आनंद के, पूर्णता के, प्रकाश के सागर में नाव छोड़ने के पूर्व तट वासना की जंजीरें अलग कर लेनी होती हैं। इसके बाद तो फिर शायद पतवार भी नहीं चलानी पड़ती है! रामकृष्ण ने कहा है, 'तू नाव तो छोड़, पाल तो खोल, प्रभु की हवाएं प्रतिक्षण तुझे ले जाने को उत्सुक हैं।'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जहां मृत्यु जीवन है


आकाश आज तारों से नहीं भरा है। काली बदलियां घिरी हैं और रह-रह कर बूंदे पड़ रही हें।
रातरानी के फूल खिल गये हैं और हवाएं सुवासित हो गयी हैं।
मैं हूं ऐसा कि जैसे नहीं ही हूं और न होकर, होना पूर्ण हो गया है। एक जगत है, जहां मृत्यु जीवन है और जहां खो जाना, पा जाना है। एक दिन सोचता था, बूंद को सागर में गिरा देना है। अब पाता हूं कि यह तो सागर ही बूंद में गिर आया है।
मनुष्य का 'होना' ही उसका बंधन है। उसका शून्य होना मुक्ति है। यह 'होना' की गांठ व्यर्थ ही भटकती है। और शून्य होने का भय पूर्ण होने से रोकता है। जब तक 'न-कुछ' होने की तैयारी नहीं है, तब तक मनुष्य 'न-कुछ' ही बना रहता है। मृत्यु में उतरने का जब तक साहस नहीं है, तब तक मृत्यु में ही भटकना होता है। पर जो मृत्यु लेने को तैयार हो जाता है, वह पाता है कि मृत्यु है ही नहीं। और जो मिटने को राजी हो जाता है, वह पाता है कि उसमें कुछ है जो कि मिट ही नहीं सकता है।
ऐसा विरोध का नियम, जीवन का नियम है। इस नियम को जानना योग है। और ठीक से जान लेना उसके बाहर हो जाना है। विरोध के इस नियम का ज्ञात न होना ही भटकाता है। उसके ज्ञात हो जाने से भटकन समाप्त हो जाती है। और वह उपलब्ध होता है, जो कि यात्रा का पड़ाव नहीं, यात्रा का अंत है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

स्व में होना ही दुख-निरोध है

रात्रि घनी हो रही है। आकाश में थोड़े से तारे हैं और पश्चिम में खंडित चांद लटका हुआ है। बेला खिली है और उसकी गंध हवा में तैर रही है।
मैं एक महिला को द्वार तक छोड़कर वापस लौटा हूं। में उन्हें जानता नहीं हूं। कोई दुख उनके चित्त को घेरे है। उसकी कालिमा उनके चारों ओर एक मंडल बनकर खड़ी हो गयी है।
यह दुख मंडल उनके आते ही मुझे अनुभव हुआ था। उन्होंने भी, बिना समय खोये, आते ही पूछा था कि 'क्या दुख मिटाया जा सकता है?' मैं उन्हें देखता हूं, वे दुख की प्रतिमा मालूम होती हैं।
और सारे लोग ही धीरे-धीरे ऐसी ही प्रतिमाएं होते जा रहे हें। वे सभी दुख मिटाना चाहते हैं, पर नहीं मिटा पाते हैं, क्योंकि दुख का, उनका निदान सत्य नहीं है।
चेतना की एक स्थिति में दुख होता है। वह उस स्थिति का स्वरूप है। उस स्थिति के भीतर दुख से छुटकारा नहीं है। कारण, वह स्थिति ही दुख है। उसमें एक दुख हटायें, तो दूसरा आ जाता है। यह श्रंखला चलती जाती है। इस दुख से छूटें, उस दुख से छूटें, पर दुख से छूटना नहीं होता है। दुख बना रहता है, केवल निमित्त बदल जाते हैं। दुख से मुक्ति पाने से नहीं, चेतना की स्थिति बदलने से ही दुख निरोध होता है- दुख-मुक्ति होती है।
एक अंधेरी रात गौतम बुद्ध के पास एक युवक पहुंचा था, दुखी, चिंतित, संताप ग्रस्त। उसने जाकर कहा था, 'संसार कैसा दुख है, कैसी पीड़ा है!' गौतम बुद्ध बोले थे,'मैं जहां हूं, वहां आ जाओ, वहां दुख नहीं है, वहां संताप नहीं है।'
एक चेतना है, जहां दुख नहीं है। इस चेतना के लिए ही बुद्ध बोले थे, 'जहां मैं हूं।' मनुष्य की चेतना की दो स्थितियां हैं, अज्ञान की और ज्ञान की, पर-तादात्म्य की और स्व-बोध की। मैं जब तक 'पर' से तादात्म्य कर रहा हूं, तब तक दुख है। यह पर-बंधन ही दुख है। 'पर' से मुक्त होकर 'स्व' को जानना और स्व में होना दुख-निरोध है। मैं अभी 'मैं' नहीं हूं, इसमें दुख है। मैं वस्तुत: जब 'मैं' होता है, तब दुख मिटता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)