सत्य एक, द्वार अनेक



सत्य एक है। उस तक पहुंचने के द्वार अनेक हो सकते हैं। पर, जो द्वार के मोह में पड़ जाता है, वह द्वार पर ही ठहर जाता है। और सत्य के द्वार उसके लिए कभी नहीं खुलते हैं।
सत्य सब जगह है। जो भी है
, सभी सत्य है। उसकी अभिव्यक्तियां अनंत हैं। वह सौंदर्य की भांति है। सौंदर्य कितने रूपों में प्रकट होता है, लेकिन इससे क्या वह भिन्न-भिन्न हो जाता है! जो रात्रि तारों में झलकता है और जो फूलों में सुगंध बनकर झरता है और जो आंखों से प्रेम में प्रकट होता है- वह क्या अलग-अलग है? रूप अलग हों, पर जो उनमें स्थापित होता है, वह तो एक ही है।

किंतु जो रूप पर रुक जाता है, वह आत्मा को नहीं जान पाता और जो सुंदर पर ठहर जाता है, वह सौंदर्य तक नहीं पहुंच पाता है।

ऐसे ही, जो शब्द में बंध जाते हैं, वे सत्य से वंचित रह जाते हैं।

जो जानते हैं, वे राह के अवरोधों को सीढि़यां बना लेते हैं और जो नहीं जानते, उनके लिए सीढि़यां भी अवरोध बन जाती हैं।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रकाश को पाना है।


अंधकार की चिंता छोड़ो और प्रकाश को प्रदीप्त करो। जो अंधकार का ही विचार करते रहते हैं, वे प्रकाश तक कभी नहीं पहुंच पाते हैं।

जीवन में बहुत अंधकार है। और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुंचने और उसे पाने की आकांक्षा थी, वह क्रमश: क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार की इस स्वीकृति को मनुष्य का सबसे बड़ा पाप मानता हूं। यह मनुष्य का स्वयं अपने ही प्रति किया गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किये गये अपराधों का जन्म इस मूल-पाप से ही होता है। यह स्मरण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप नहीं कर सकता है। किंतु, कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने के लिये उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। यह भी भूल है। अंधकार को मान लेने वाला भी भूल में है। न अंधकार को मानना है, न उससे लड़ना है। जो जानता है, वह प्रकाश को जलाने की आयोजना करता है। अंधकार की अपनी सत्ता नहीं है। वह प्रकाश का अभाव मात्र है। प्रकाश के आते ही वह नहीं पाया जाता है। और ऐसा ही अशुभ है, ऐसी ही अनीति है, ऐसा ही अधर्म है। अशुभ को, अनीति को, अधर्म को मिटाना नहीं, शुभ का, नीति का, धर्म का दिया जलाना ही पर्याप्त है। धर्म की ज्योति ही अधर्म की मृत्यु है।

अंधकार से लड़ना अभाव से लड़ना है। वह विक्षिप्तता है। लड़ना है, तो प्रकाश पाने के लिये लड़ो- जो प्रकाश पा लेता है, वह अंधकार को मिटा ही देता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मैं अतृप्ति सिखाता हूं

मनुष्य को स्वयं से ही अतृप्त होना होता है, तभी उसके चरण प्रभु की दिशा में उठते हैं। जो स्वयं से तृप्त हो जाता है, वह नष्ट हो जाता है।
मैं अतृप्ति सिखाता हूं, मैं मनुष्य होने से असंतोष सिखाता हूं। मनुष्यता जीवन यात्रा का पड़ाव है, अंत नहीं। और जो उसे अंत समझ लेते हैं, वे मनुष्य से ऊपर उठने के एक अमूल्य अवसर को व्यर्थ ही खो देते हैं। हम एक लंबे विकास की मध्य कड़ी हैं। हमारा अतीत एक यात्रा-पथ था, हमारा भविष्य भी यात्रा है। विकास हम पर समाप्त नहीं है, वह हमें भी अतिक्रमण करेगा। हम अपनी ओर देखें, तो यह समझना कठिन न होगा। मनुष्य का हर भांति अधूरा और अपूर्ण होना इसका प्रमाण है। हम कोई ऐसी कृति नहीं हैं कि प्रकृति हम पर रुक जावे।
प्रभु के पूर्व विकास- यदि वस्तुत: है, तो वह कहीं भी नहीं रुक सकता है। प्रभु की पूर्णता पाने के पूर्व, विकास का न कोई सार्थक अंत हो सकता है, और न कोई अभिप्राय या अर्थ। मनुष्य प्रभु को पाने का मार्ग है। और जो मंजिल को छोड़ मार्ग से ही संतुष्ट हो जावें, उनके दुर्भाग्य को क्या कहें? पशु को हमने पीछे छोड़ा है, प्रभु को हमें आगे पाना है। हम पशु और प्रभु के बीच एक सेतु से ज्यादा नहीं हैं।
इसलिए, मैं मनुष्य के अतिक्रमण के लिये कहता हूं। मनुष्य को हमें वैसे ही पीछे छोड़ देना है, जैसे सांप अपनी केंचुली छोड़कर आगे बढ़ जाता है। मनुष्य का अतिक्रमण ही मनुष्य जीवन का सदुपयोग है। उसके अतिरिक्त सब दुरुपयोग है। मार्ग रुकने के लिए नहीं होता। उसकी सार्थकता ही उसके पार हो जाने में है।
जैसे अपने को पाते हो, उस पर ही मत रुक जाना। वह पथ का अंत नहीं प्रारंभ ही है। पूर्ण जब तक न हो जाओ, तब तक जानना कि अभी मार्ग का अंत नहीं आया है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

आत्मज्ञान की आकांक्षा

आत्मज्ञान एकमात्र ज्ञान है। क्योंकि जो स्वयं को ही नहीं जानते उनके और सब कुछ जानने का मूल्य ही क्या है?
मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाई मनुष्य का अपने प्रति ही अज्ञान है। दीये के नीचे जैसे अंधेरा होता है, वैसे ही मनुष्य उस सत्ता के ही प्रति अंधकार में होता है, जो कि उसकी आत्मा है। हम स्वयं को नहीं जानते हैं और तब यदि हमारा सारा जीवन ही गलत दिशाओं में चला जाता हो, तो आश्चर्य करना व्यर्थ है। आत्मज्ञान के अभाव में जीवन उस नौका की भांति, जिसका चलाने वाला होश में नहीं है, लेकिन नौका को चलाये जा रहा है। जीवन को सम्यक गति और गंतव्य देने के लिये स्वयं का ज्ञान आधारभूत है। इसके पूर्व कि जानूं कि मुझे क्या होना है, यह जानना बहुत अनिवार्य है कि मैं क्या हूं। मैं जो हूं, उससे परिचित होकर ही, मैं भविष्य के आधार रख सकता हूं, जो कि अभी मुझमें सोया हुआ है। मैं जो हूं, उसे जानकर ही मुझमें अभी जो अजन्मा है, उसका जन्म हो सकता है। यदि जीवन को सार्थकता देनी है, तो और कुछ जानने से पहले स्वयं को जानने में लग जाओ। उसके बाद ही शेष ज्ञान का भी उपयोग होता है। अन्यथा, अज्ञान के हाथों में आया ज्ञान आत्मघाती ही सिद्ध होता है।
ज्ञान की पहली आकांक्षा स्वयं को जानने की है। उस बिंदु पर अंधकार है, तो सब जगह अंधकार है और, वहां प्रकाश है, तो सब जगह प्रकाश है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ध्यान जीवन का सबसे बड़ा आनंद

ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है- जहां कोई विचार नहीं होते, कोई विषय नहीं होता। साधारणतया हमारी चेतना विचारों से, विषयों से, कामनाओं से आच्छादित रहती है। जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह है- विचार चल रहे हैं, कामनाएं चल रही हैं, पुरानी स्मृतियां सरक रही हैं- रात-दिन एक अनवरत सिलसिला है। नींद में भी हमारा मन चलता रहता है, स्वप्न चलते रहते हैं। यह अ-ध्यान की अवस्था है। ठीक इससे उल्टी अवस्था ध्यान की है। जब कोई विचार नहीं चलते और कोई कामनाएं सिर नहीं उठातीं- वह परिपूर्ण मौन ध्यान है। उसी परिपूर्ण मौन में सत्य का साक्षात्कार होता है। जब मन नहीं होता, तब जो होता है, वह ध्यान है।

इसलिए मन के माध्यम से कभी ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं मन नहीं हूं। जैसे-जैसे हमारा बोध गहरा होता है, कुछ झलकें मिलनी शुरू होती हैं - मौन की, शांति की- जब सब थम जाता है और मन में कुछ भी चलता नहीं। उन मौन, शांत क्षणों में ही हमें स्वयं की सत्ता की अनुभूति होती है। धीरे-धीरे एक दिन आता है, एक बड़े सौभाग्य का दिन आता है, जब ध्यान हमारी सहज अवस्था हो जाती है।

मन असहज अवस्था है। यह हमारी सहज-स्वाभाविक अवस्था कभी नहीं बन सकता। ध्यान हमारी सहज अवस्था है, लेकिन हमने उसे खो दिया है। हम उस स्वर्ग से बाहर आ गये हैं। लेकिन यह स्वर्ग पुन: पाया जा सकता है। किसी बच्चे की आंख में झांके और वहां आपको अद्भुत मौन दिखेगा, अद्भुत निर्दोषता दिखेगी। हर बच्चा ध्यान के लिए ही पैदा होता है- लेकिन उसे समाज के रंग-ढंग सीखने ही होंगे। उसे विचार करना, तर्क करना, हिसाब-किताब, सब सीखना होगा। उसे शब्द, भाषा, व्याकरण सीखना होगा। और धीरे-धीरे वह अपनी निर्दोषिता, सरलता से दूर हटता जाएगा। उसकी कोरी स्लेट समाज की लिखावट से गंदी होती जाएगी। वह समाज के ढांचे में एक कुशल यंत्र हो जाएगा- एक जीवंत, सहज मनुष्य नहीं।

बस उस निर्दोष सहजता को पुन: उपलब्ध करने की जरूरत है। उसे हमने पहले जाना है, इसलिए जब हमें ध्यान की पहली झलक मिलती है, तो एक बड़ा आश्चर्य होता है कि इसे तो हम जानते हैं! और यह प्रत्यभिज्ञा बिलकुल सही है- हमने इस पहले जाना है। लेकिन हम भूल गये हैं। हीरा कूड़े-कचरे में दब गया है। लेकिन हम जरा खोदें तो हीरा पुन: हाथ आ सकता है- वह हमारा स्वभाव है। उसे हम खो नहीं सकते, उसे हम केवल भूल सकते हैं।

हम ध्यान में ही पैदा होते हैं। फिर हम मन के रंग-ढंग सीख लेते हैं। लेकिन हमारी वास्तविक स्वभाव अंतर्धारा की तरह भीतर गहरे में बना ही रहता है। किसी भी दिन, थोड़ी सी खुदाई और हम पाएंगे कि वह धारा अभी भी बह रही है, जीवन-स्रोत के झरने ताजा जल अभी भी ला रहें हैं। और उसे पा लेना जीवन का सबसे बड़ा आनंद है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

सत्य की आकांक्षा



सत्य की साधना सतत् है। श्वास-श्वास जिसकी साधना बन जाती है, वही उसे पाने का अधिकारी होता है।

सत्य की आकांक्षा अन्य आकांक्षाओं के साथ एक आकांक्षा नहीं है। अंश मन से जो उसे चाहता है, वह चाहता ही नहीं। उसे तो पूरे और समग्र मन से ही चाहना होता है। मन जब अपनी अखंडता में उसके लिए प्यासा होता है, तब वह प्यास ही सत्य तक पहुंचने का पथ बन जाती है। स्मरण रहे कि सत्य के लिए प्रज्ज्वलित प्यास ही पथ है। प्राण जब उस अनंत प्यास से भरे होते हैं और हृदय जब अज्ञात को खोजने के लिए ही धड़कता है, तभी प्रार्थना प्रारंभ होती है। श्वासें जब उसके लिए ही आती-जाती हैं, तभी उस मौन अभीप्सा में ही परमात्मा की ओर पहले चरण रखे जाते हैं।

प्रेम- प्यासा प्रेम ही उसे पाने की पात्रता और अधिकारी है

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

अंतस की स्वतंत्रता

मनुष्य का जन्म दासता में है। हम अपने ही दास पैदा होते हैं। वासना की जंजीरों के साथ ही जगत में हमारा आना होता है। बहुत सूक्ष्म बंधन हमें बांधे हैं।

परतंत्रता जन्मजात है। वह प्रकृति प्रदत्त है। हमें उसे कमाना नहीं होता। मनुष्य पाता है कि वह परतंत्र है। पर, स्वतंत्रता अर्जित करनी होती है। उसे वही उपलब्ध होता है, जो उसके लिए श्रम और संघर्ष करता है। स्वतंत्रता के लिए मूल्य देना होता है। जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, वह निर्मूल्य नहीं मिलता। प्रकृति से मिली परतंत्रता दुर्भाग्य नहीं है। दुर्भाग्य है, स्वतंत्रता को अर्जित न कर पाना। दास पैदा होना बुरा नहीं, पर दास ही मर जाना अवश्य बुरा है। अंतस की स्वतंत्रता को पाये बिना जीवन में कुछ भी सार्थकता और कृतार्थता तक नहीं पहुंचाता है। वासनाओं की कैद में जो बंद है और जिन्होंने विवेक का मुक्ताकाश नहीं जाना है, उन्होंने जीवन तो पाया, पर वे जीवन को जानने से वंचित रह गये हैं। पिंजड़े में कैद पक्षियों और वासनाओं की कैद में पड़ी आत्माओं के जीवन में कोई भेद नहीं है। विवेक जब वासना से मुक्त होता है, तभी वास्तविक जीवन के जगत में प्रवेश होता है।

प्रभु को जानना है, तो स्वयं को जीतो। स्वयं से ही जो पराजित है, प्रभु के राज्य की विजय उनके लिए नहीं है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)