स्व का बोध


स्वयं के भीतर जो है, उसे जानने से ही जीवन मिलता है। जो उसे नहीं जानता, वह प्रतिक्षण मृत्यु से और मृत्यु के भय से घिरा रहता है।

एक साधु को उसके मित्रों ने पूछा, ''यदि दुष्टजन आप पर हमला कर दें, तो आप क्या करेंगे?'' वह बोला, ''मैं अपने मजूत किले में जाकर बैठा रहूंगा।'' यह बात उसके शत्रुओं के कान तक पहुंच गई। फिर, एक दिन शत्रुओं ने उसे एकांत में घेर लिया और कहा, ''महानुभाव! वह मजबूत किला कहां है?'' वह साधु खूब हंसने लगा और फिर अपने हृदय पर हाथ रखकर बोला, ''यह है मेरा किला। उसके ऊपर कभी कोई हमला नहीं कर सकता है। शरीर तो नष्ट किया जा सकता है- पर जो उसके भीतर है- वह नहीं। वही मेरा किला है। मेरा उसके मार्ग को जानना ही मेरी सुरक्षा है।''

जो व्यक्ति इस मजबूत किले को नहीं जानता है, उसका पूरा जीवन असुरक्षित है। और, जो इस किले को नहीं जानता है, उसका जीवन प्रतिक्षण शत्रुओं से घिरा है। ऐसे व्यक्ति को अभी शांति और सुरक्षा के लिए कोई शरणस्थल नहीं मिला है। और, जो उस स्थल को बाहर खोजते हैं, वे व्यर्थ ही खोजते हैं, क्योंकि वह तो भीतर है।

जीवन का वास्तविक परिचय स्वयं में प्रतिष्ठित होकर ही मिलता है, क्योंकि उस बिंदु के बाहर जो परिधि है, वह मृत्यु से निर्मित है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

श्रेष्ठता आपके हाथ में!



मनुष्य के पैर नरक को और उसका सिर स्वर्ग को छूता है। ये दोनों ही उसकी संभावनाएं हैं। इन दोनों में से कौन-सा बीज वास्तविक बनेगा, यह उस पर, केवल उस पर निर्भर करता है।

मनुष्य की श्रेष्ठता स्वयं उसके हाथों में है। प्रकृति ने तो उसे मात्र संभावनाएं दी हैं। उसका रूप निर्र्णीत नहीं है। वह स्वयं का स्वयं ही सृजन करता है। यह स्वतंत्रता महिमापूर्ण है। किंतु, हम चाहें तो इसे ही दुर्भाग्य भी बना सकते हैं। और, अधिक लोगों को यह स्वतंत्रता दुर्भाग्य ही सिद्ध होती है। क्योंकि, सृजन की क्षमता में विनाश की क्षमता और स्वतंत्रता भी तो छिपी है! अधिकतर लोग दूसरे विकल्प का ही प्रयोग करते हें। क्योंकि, निर्माण से विनाश आसान होता है। और, स्वयं को मिटाने से आसान और क्या है? स्व-विनाश के लिए आत्मसृजन में न लगना ही काफी है। उसके लिए अलग से और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। जो जीवन में ऊपर की ओर नहीं उठ रहा है, वह अनजाने और अनचाहे ही पीछे और नीचे गिरता जाता है।

मैंने सुना है कि किसी सभा में चर्चा चली थी कि मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है, क्योंकि वह सब प्राणियों को वश में कर लेता है। किंतु, कुछ का विचार था कि मनुष्य तो कुत्ते से भी नीचा है, क्योंकि कुत्तों का संयम मनुष्य से कई गुना श्रेष्ठ होता है। इस विवाद में हुसैन उपस्थित थे। दोनों पक्ष वालों ने उनसे निर्णायक मत देने को कहा। हुसैन ने कहा था, ''मैं अपनी बात कहता हूं। उसी से निर्णय कर लेना। जब तक मैं अपना चित्त और जीवन पवित्र कामों में लगाये रहता हूं, तब तक देवताओं के करीब होता हूं। किंतु, जब मेरा चित्त और जीवन पापमय होता है, तो कुत्ते भी मुझ जैसे हजार हुसैनों से श्रेष्ठ होते हैं।''

मनुष्य मृण्मय और चिन्मय का जोड़ है। जो देह का और, उसकी वासनाओं का अनुसरण करता है, वह नीचे से नीचे उतरता जाता है। और, जो चिन्मय के अनुसंधान में रत होता है, वह अंतत: सच्चिदानंद को पाता है और स्वयं भी वही हो जाता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रत्येक घटना कुछ न कुछ सिखाती है!

आंखें खुली हों, तो पूरा जीवन ही विद्यालय है। और, जिसे सीखने की भूख है, वह प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक घटना से सीख लेता है। और, स्मरण रहे कि जो इस भांति नहीं सीखता है, वह जीवन में कुछ भी नहीं सीख पाता। इमर्सन ने कहा है : ''हर शख्स, जिससे मैं मिलता हूं, किसी न किसी बात में मुझ से बढ़कर है। वही, मैं उससे सीखता हूं।''

एक दृश्य मुझे स्मरण आता है। मक्का की बात है। एक नाई किसी के बाल बना रहा था। उसी समय फकीर जुन्नैद वहां आ गये और उन्होंने कहा : ''खुदा की खातिर मेरी भी हजामत कर दें।'' उस नाई ने खुदा का नाम सुनते ही अपने गृहस्थ ग्राहक से कहा, 'मित्र, अब थोड़ी मैं आपकी हजामत नहीं बना सकूंगा। खुदा की खातिर उस फकीर की सेवा मुझे पहले करनी चाहिये। खुदा का काम सबसे पहले है।' इसके बाद फकीर की हजामत उसने बड़े ही प्रेम और भक्ति से बनाई और उसे नमस्कार कर विदा किया। कुछ दिनों बाद जब जुन्नैद को किसी ने कुछ पैसे भेंट किये, तो वे उन्हें नाई को देने गये। लेकिन उस नाई ने पैसे न लिये और कहा : ''आपको शर्म नहीं आती? आपने तो खुदा की खातिर हजामत बनाने को कहा था, रुपयों की खातिर नहीं!'' फिर तो जीवन भर फकीर जुन्नैद अपनी मंडली में कहा करते थे, ''निष्काम ईश्वर-भक्ति मैंने हज्जाम से सीखी है।''

क्षुद्रतम् में भी विराट संदेश छुपे हैं। जो उन्हें उघाड़ना जानता है, वह ज्ञान को उपलब्ध होता है। जीवन में सजग होकर चलने से प्रत्येक अनुभव प्रज्ञा बन जाता है। और, जो मू‌िर्च्छत बने रहते हें, वे द्वार आये आलोक को भी वापस लौटा देते हैं।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)


चित्त की पूर्ण स्वतंत्रता


सत्य को चाहते हो, तो चित्त को किसी 'मत' से मत बांधो। जहां मत है, वहां सत्य नहीं आता। मत और सत्य में विरोध है।

सत्य की खोज के लिए मुक्त-जिज्ञासा पहली सीढ़ी है। और, जो व्यक्ति स्वानुभूति के पूर्व ही किन्हीं सिद्धांतों और मतों से अपने चित्त को बोझिल कर लेता है, उसकी जिज्ञासा कुंठित और अवरुद्ध हो जाती है।

जिज्ञासा- खोज की गति और प्राण है। जिज्ञासा के माध्यम से ही विवेक जाग्रत होता और चेतना ऊ‌र्ध्व बनती है। लेकिन, जिज्ञासा आस्था से नहीं, संदेह से पैदा होती है और इसलिए मैं आस्था को नहीं, सत्य-पथ के राही का पाथेय मानता हूं। संदेह स्वस्थ चिंतन का लक्षण है और उसके सम्यक अनुगमन से ही सत्य के ऊपर पड़े परदे क्रमश: गिरते जाते हैं और एक क्षण सत्य का दर्शन होता है।

यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों ही आस्थावान होते हैं। आस्था विधायक और नास्तिक दोनों ही प्रकार की होती है। संदेह चित्त की एक तीसरी ही अवस्था है। वह अविश्वास नहीं है और न ही विश्वास है। वह तो दोनों से मुक्त खोज के लिए स्वतंत्रता है।

और, सत्य की खोज वे कैसे कर सकते हैं, जो कि पूर्व से ही किन्हीं मतों से आबद्ध हें? मतों के खूंटों से विश्वास या अविश्वास की जंजीरों को जो खोल देता है, उसकी नाव ही केवल सत्य के सागर में यात्रा करने में समर्थ हो पाती है।

सत्य के आगमन की शर्त है : चित्त की पूर्ण स्वतंत्रता। जिसका चित्त किन्हीं सिद्धांतों में परतंत्र है, वह सत्य के सूर्य के दर्शन से वंचित रह जाता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जीना सोद्देश्य!


जीवन एक कला है। वह कैसे भी जी लेने का नाम नहीं है। वस्तुत: जो सोद्देश्य जीता है, वही केवल जीता है।
जीवन का क्या अर्थ है? हमारे होने का अभिप्राय? क्या है उद्देश्य? हम क्या होना और क्या पाना चाहते हैं?
जीवन में यदि गंतव्य का बोध न हो, तो गति सम्यक कैसे हो सकती है? और यदि कहीं पहुंचना न हो, तो संतृप्ति को कैसे पाया जा सकता है?
जिसे समग्र जीवन के अर्थ का विचार नहीं है, उसके पास फूल तो हैं और वह उनकी माला भी बनाना चाहता है, किंतु उसके पास ऐसा धागा नहीं है, जो उन्हें जोड़ सके और एक कर सके। अंतत: वह पायेगा कि फूल माला नहीं बन सके हैं और उसके जीवन में न दिशा है और न कोई एकता है। उसके समस्त अनुभव आणविक ही होंगे और उनसे उस ऊर्जा का जन्म नहीं होगा, जो कि ज्ञान बन जाती है। वह जीवन के उस समग्र अनुभव से वंचित ही रह जावेगा, जिसके अभाव में जीना और न-जीना बराबर ही हो जाता है। उसका जीवन एक ऐसे वृक्ष का जीवन होगा, जिसमें कि न फूल लगे, न फल लगे। ऐसा व्यक्ति सुख-दुख तो जानेगा, लेकिन आनंद नहीं। क्योंकि, आनंद की अनुभूति तो जीवन को उसकी समग्रता में अनुभव करने से ही पैदा होती है।
आनंद को पाना है, तो जीवन को फूलों की एक माला बनाओ। और, समस्त अनुभव को एक लक्ष्य के धागे से अनस्यूत करो। जो इससे अन्यथा करता है, वह सार्थकता और कृतार्थता को नहीं पाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ध्यान की विधि कैसे चुने!


हमेशा उस विधि से शुरू करें जो रुचिकर लगे। ध्यान को जबरदस्ती थोपना नहीं चाहिए। अगर जबरदस्ती ध्यान को थोपा गया तो शुरुआत ही गलत हो जाएगी। जबरदस्ती की गई कोई भी चीज सहज नहीं हो सकती। अनावश्यक कठिनाई पैदा करने की कोई जरूरत नहीं है। यह बात अच्छे से समझ लेनी है। क्योंकि जिस दिशा में मन की सहज रुचि हो, उस दिशा में ध्यान सहजता से घटता है।

जो लोग शरीर के तल पर ज्यादा संवेदनशील हैं, उनके लिए ऐसी विधि है, जो शरीर के माध्यम से ही आत्यंतिक अनुभव पर पहुंचा सकती हैं। जो भाव-प्रवण हैं, भावुक प्रकृति के हैं, वे भक्ति-प्रार्थना मार्ग पर चल सकते हैं। जो बुद्धि-प्रवण हैं, बुद्धिजीवी हैं, उनके लिये ध्यान, सजगता, साक्षीभाव उपयोगी हो सकते हैं।

लेकिन मेरी ध्यान की विधियां एक प्रकार से अलग हट कर हैं। मैंने ऐसी ध्यान-विधियों की संरचना की है, जो तीनों प्रकार के लोगों द्वारा उपयोग में लाई जा सकती हैं। उनमें शरीर का पूरा उपयोग है, भाव का भी पूरा उपयोग है और होश का भी पूरा उपयोग है। तीनों का एक साथ उपयोग है और वे अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग ढंग से काम करती हैं। शरीर, हृदय, मन- मेरी सभी विधियां इसी श्रंखला में काम करती हैं। वे शरीर पर शुरू होती हैं, वे हृदय से गुजरती हैं, वे मन पर पहुंचती हैं और फिर वे मनातीत में अतिक्रमण कर जाती हैं।

स्मरण रहे, जो हमें रुचिकर लगता है, उसी में हम गहरे जा सकते हैं- केवल उसी में गहरे जा सकते हैं। रुचिकर लगने का मतलब ही यह है कि उसका हमसे तालमेल है। हमारा छंद उसकी लय से मेल खाता है। विधि के साथ हम एक हार्मनी में हैं। तो जब कोई विधि रुचिकर लगे, तो फिर और-और विधियों के लोभ में न पड़े, फिर उसी विधि में और-और गहरे उतरें। उस विधि को प्रतिदिन या अगर संभव हो तो दिन में दो बार अवश्य करें। जितना हम इसे करेंगे, उतना आनंद बढ़ता जाएगा। किसी भी विधि को तभी छोड़े जब आनंद आना बंद बंद हो जाए। उसका मतलब है कि विधि का काम पूरा हो गया, अब दूसरी विधि की तलाश की जाए। कोई भी अकेली विधि हमें अंत तक नहीं ले जा सकती। इस यात्रा पर हमें कई बार ट्रेन बदलनी पड़ेगी। हर विधि हमें एक अमुक अवस्था तक पहुंचाएगी। उसके बाद उसका कोई उपयोग नहीं है। उसका काम पूरा हो गया।

दो बातें स्मरण रखनी हैं : जब किसी विधि में आनंद आए तो उसमें जितने गहरे जा सके जाएं। लेकिन उसके आदी न हो जाएं, क्योंकि एक दिन उसके पार भी जाना है। अगर हम उसके बहुत आदी हो जाते हैं, तो यह भी एक प्रकार का नशा है, फिर हम उसे छोड़ नहीं सकते। अब उसमें कोई आनंद भी नहीं आता-इससे कुछ मिलता भी नहीं-लेकिन यह एक आदत हो गयी। फिर चाहे तो इसे हम करते रह सकते हैं, लेकिन हम गोल-गोल घूमते है, यह उसके आगे नहीं ले जा सकती।

तो आनंद मापदंड है। जब तक आनंद आए, जारी रखें। आनंद का कण भी पीछे न छूट जाए। उसका पूरा रस निचोड़ लें, एक बूंद भी बाकी न बचे। और फिर उसे छोड़ने की भी तैयारी रखें। फिर कोई दूसरी विधि चुन लें, जिसमें फिर आनंद आता हो। हो सकता है, हमें कई बार विधि बदलनी पड़े। यह अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होगा, लेकिन ऐसी बहुत कम संभावना है कि एक विधि से पूरी यात्रा हो जाए।

लेकिन बहुत सी विधियां एक साथ करने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि हम उलझन में पड़ सकते हैं, विपरीत प्रक्रियाएं एक साथ कर सकते हैं और तब तकलीफ होगी, दर्द होगा।

तो कोई भी दो ध्यान की विधियां चुन लें और फिर उन्हें सतत करें। असल में, मैं तो चाहूंगा कि कोई एक ध्यान ही चुनें, यह सबसे अच्छा होगा। जो ध्यान हमें भाए, उसे दिन में कई बार करना ज्यादा बेहतर है। इससे उसमें गहराई आती है।

अगर हम कई ध्यान एक साथ करते हैं- एक दिन एक, दूसरे दिन दूसरा। और हम अपने ही ध्यान गढ़ लेते हैं- तो ऊहापोह बढ़ेगा। विज्ञान भैरव तंत्र में ध्यान की एक सौ बारह विधियां हैं। हम पागल हो जा सकते हैं। हम वैसे ही पागल हैं!

ध्यान की ये विधियां कोई मनोरंजन नहीं हैं। ये कभी-कभी खतरनाक भी हो सकती हैं। हम मन के सूक्ष्म, अति सूक्ष्म यंत्र के साथ खेल रहे हैं। कभी एक छोटी सी चीज, जिसका हमें होश भी नहीं कि हम क्या कर रहे हैं, खतरनाक सिद्ध हो सकती है। इसलिए इन विधियों में कोई हेरफेर न करें और अलग-अलग विधियों को मिलाकर अपनी ही कोई खिचड़ी विधि न ईजाद करें। कोई भी दो विधियां चुन लें और कुछ सप्ताह उनका प्रयोग करके देखें।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

अहं-दृष्टिं का अवरोध


सत्य और स्वयं में जो सत्य को चुनता है, वह सत्य को पा लेता है और स्वयं को भी। और, जो स्वयं को चुनता है, वह दोनो को खो देता है।
मनुष्य को सत्य होने से पूर्व स्वयं को खोना पड़ता है। इस मूल्य को चुकाये बिना सत्य में कोई गति नहीं है। उसका होना ही बाधा है। वही स्वयं सत्य पर पर्दा है। उसकी दृष्टिं ही अवरोध है- वह दृष्टिं जो कि 'मैं' के बिंदु से विश्व को देखती है। 'अहं-दृष्टिं' के अतिरिक्त उसे सत्य से और कोई भी पृथक नहीं किये है। मनुष्य का 'मैं' हो जाना ही, परमात्मा से उसका पतन है। 'मैं' की पार्थिवता में ही वह नीचे आता है और 'मैं' के खोते ही वह अपार्थिव और भागवत-सत्ता में ऊपर उठ आता है। 'मैं' होना नीचे होना है। 'न मैं' हो जाना ऊपर उठ जाना है।
किंतु, जो खोने जैसा दीखता है, वह वस्तुत: खोना नहीं-पाना है। स्वयं की, जो सत्ता खोनी है, वह सत्ता नहीं स्वप्न ही है और उसे खेकर जो सत्ता मिलती है, वही सत्य है।
बीज जब भूमि के भीतर स्वयं को बिलकुल खो देता है, तभी वह अंकुरित होता है और वृक्ष बनता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)