सत्य की एक झलक


सत्य की एक किरण भी बहुत है। ग्रंथों का भार जो नहीं करता है, सत्य की एक झलक भी वह कर दिखाती है। अंधेरे में उजाला करने को प्रकाश के ऊपर बड़े-बड़े शास्त्र किसी काम के नहीं, एक मिट्टी का दीया जलाना आना ही पर्याप्त है।
राल्फ वाल्डे इमर्सन के व्याख्यानों में एक बूढ़ी धोबिन निरंतर देखी जाती थी। लोगों को हैरानी हुई : एक अपढ़ गरीब औरत इमर्सन की गंभीर वार्ताओं को क्या समझती होगी! किसी ने आखिर उससे पूछ ही लिया कि उसकी समझ में क्या आता है? उस बूढ़ी धोबिन ने जो उत्तर दिया, वह अद्भुत था। उसने कहा, ''मैं जो नहीं समझती, उसे तो क्या बताऊं। लेकिन, एक बात मैं खूब समझ गई हूं और पता नहीं कि दूसरे उसे समझे हैं या नहीं। मैं तो अपढ़ हूं और मेरे लिए एक ही बात काफी है। उस बात ने मेरा सारा जीवन बदल दिया है। और वह बात क्या है? वह है कि मैं भी प्रभु से दूर नहीं हूं, एक दरिद्र अज्ञानी स्त्री से भी प्रभु दूर नहीं है। प्रभु निकट है- निकट ही नहीं, स्वयं में है। यह छोटा सा सत्य मेरी दृष्टि में आ गया है और अब मैं नहीं समझती कि इससे भी बड़ा कोई और सत्य हो सकता है!''
जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, किंतु सत्य की एक छोटी -सी अनुभूति से ही परिवर्तित हो जाता है। और, जो बहुत जानने में लग रहते हैं, वे अक्सर सत्य की उस छोटी-सी चिंगारी से वंचित ही रह जाते हें, जो कि परिवर्तन लाती है और जीवन में बोध के नये आयाम जिससे उद्घटित होते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

स्वयं से पूछो : ''मैं कौन हूं?''


''मैं कौन हूं?'' जो स्वयं से इस प्रश्न को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं। उस द्वार को खोलने की कुंजी यही है। स्वयं से पूछो कि ''मैं कौन हूं?'' और, जो प्रबलता से और समग्रता से पूछता है, वह स्वयं से ही उत्तर भी पा जाता है।
कारलाइल बूढ़ा हो गया था। उसका शरीर अस्सी वसंत देख चुका था। और जो देह कभी अति सुंदर और स्वस्थ थी, वह अब जर्जर और ढीली हो गई थी : जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे। ऐसे बुढ़ापे की एक सुबह की घटना है। कारलाइल स्नानगृह में था। स्नान के बाद वह जैसे ही शरीर को पोंछने लगा, उसने अचानक देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे कि वह अपनी मान बैठा था! शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है। वह काया अब कहां है, जिसे उसने प्रेम किया था? जिस पर उसने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो शेष रह गया है? पर, साथ ही एक अत्यंत अभिनव-बोध भी उसके भीतर अकुंडलित होने लगा : ''शरीर तो वही नहीं है, लेकिन वह तो वही है। वह तो नहीं बदला है।'' और तब उसने स्वयं से ही पूछा था : ''आह! तब फिर मैं कौन हूं?'' यही प्रश्न प्रत्येक को अपने से पूछना होता है। यही असली प्रश्न है। प्रश्नों का प्रश्न यही है। जो इसे नहीं पूछते, वे कुछ भी नहीं पूछते हैं। और, जो पूछते ही नहीं, वे उत्तर कैसे पा सकगें?
पूछो- अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूंजने दो : ''मैं कौन हूं?'' जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है। और, वह उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है। उसके पूर्व मनुष्य अंधा है। उसके बाद ही वह आंखों को पाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

यांत्रिक प्रवाह से मुक्ति!


मंदिर और उपासना-गृहों में बैठने का कोई मूल्य नहीं है और तुम्हारे हाथों में ली गई मालाएं झूठी हैं, जब तक कि विचार के यांत्रिक प्रवाह से तुम मुक्त नहीं होते हो। जो विचारों की तरंगों से मुक्त हो जाता है, वह जहां भी है, वहीं मंदिर में है और उसके हाथ में जो भी कार्य है, वही माला है।
एक व्यक्ति ने किसी साधु से कहा था, ''मेरी पत्नी मेरी धर्म-साधना में श्रद्धा नहीं रखती है। आप उसे थोड़ा समझा दें तो अच्छा है।'' दूसरे दिन सुबह ही वह साधु उसके घर गया। घर के बाहर बगिया में ही उसकी पत्नी मिल गई। साधु ने पति के संबंध में पूछा। पत्नी ने कहा, ''जहां तक मैं समझती हूं, इस समय वह किसी चमार की दुकान पर झगड़ा कर रहे हैं।'' सुबह का धुंधलका था। पति पास ही बनाए गए अपने उपासना-गृह में माला फेर रहा था। उससे इस झूठ को नहीं सहा गया। वह बाहर आकर बोला, ''यह बिलकुल असत्य है। मैं अपने मंदिर में था।'' साधु भी हैरान हुआ; पर पत्नी बोली, ''क्या सच ही तुम उपासना-गृह में थे? क्या माला हाथ में, शरीर मंदिर में और मन कहीं और नहीं था?'' पति को होश आया। सच ही वह माला फेरते-फेरते चमार की दुकान में चला गया था। उसे जूते खरीदने थे और रात्रि ही उसने अपनी पत्नी से कहा था कि सुबह होते ही उन्हें खरीदने चला जाऊंगा। फिर विचार में ही चमार से मोल-तोल पर उसका कुछ झगड़ा हो रहा था!
विचार को छोड़ो और निर्विचार हो रहो, तो तुम जहां हो प्रभु का आगमन वहीं हो जाता है। उस खोजने तुम कहां जाओगे? और, जिसे जानते ही नहीं उसे खोजोगे कैसे? उसकी खोज से नहीं, स्वयं के भीतर शांति के निर्माण से ही उसे पाया जाता है। कोई आज तक उसके पास नहीं गया है, वरन् जो अपनी पात्रता से उसे आमंत्रित करता है, उसके पास वह स्वयं ही चला आता है। मंदिर में जाना व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे स्वयं ही मंदिर बन जाते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

प्रात:कालीन ध्यान विधियां- सक्रिय ध्यान

प्रथम चरण : दस मिनट
नाक से तेजी से श्वास भीतर लें और बाहर छोड़ें। श्वास भीतर लेने और बाहर छोड़ने- दोनों पर जोर लगाएं और उन्हें अराजक बना रहने दें। श्वास फेफड़ों में गहराई से जाए। श्वास लेने और छोड़ने में तेजी लाएं, लेकिन निश्चित रहे कि श्वास गहरी बनी रहे। इसे यथाशक्ति अपनी अधिकतम समग्रता से करें- बिना अपने शरीर को तनाव पूर्ण बनाए। और, पक्का कर लें कि कंधे और गर्दन शिथिल अवस्था में हैं। श्वास जारी रखें जब तक कि आप श्वास ही श्वास न हो जाएं; श्वास को अराजक और अस्तव्यस्त बना रहने दें। अर्थात श्वास न लयबद्ध और न ही किसी पूर्वनिर्धारित नियम पर आधारित हो। एक बार ऊर्जा जग जाए, फिर शरीर को भी गति देने लगेगी। इन शारीरिक गतियों को होने दें; इन्हें और अधिक ऊर्जा निर्मित होने में सहायक होने दें। अपने हाथों और शरीर को सहज रूप से गति करने दें, ताकि वे ऊर्जा के उठने में सहयोगी बन सकें। ऊर्जा को उठता हुआ अनुभव करें। पहले चरण में अपने को जरा भी ढीला मत छोड़े और श्वास को जरा भी धीमा मत होने दें।
दूसरा चरण : दस मिनट
अपने शरीर को पूरी तरह छोड़ दें। अपने शरीर को स्वतंत्रता दें कि वह जो कुछ करना चाहे, कर सके ..विस्फोट हो जाने दें ..अपने शरीर को आविष्ट हो जाने दें। जो कुछ भी भीतर से बाहर आए, उसे रोकें नहीं। पूरी तरह से पागल हो जाएं ..गाएं, चीखें, हंसे, चिल्लाएं, रोएं, कूदें, कांपें, नाचें, हाथ-पैर चलाएं और शरीर को सब दिशाओं में गति करने दें। शुरू में थोड़ा सा अभिनय प्रक्रियाओं को गति देने में सहायक होता है। जो भी हो रहा है, उसमें अपने मन को दखल न डालने दें। स्मरण रखें कि आप आने शरीर के साथ समग्रता से सहयोग कर रहे हैं।
तीसरा चरण : दस मिनट
कंधे और गर्दन को ढीला रखते हुए अपने दोनों हाथ पूरी तरह से ऊपर उठाएं, कोहनियां शिथिल रहें, दोनों हाथ ऊपर उठाए हुए हू! ..हू! ..हू! मंत्र का जोरों से उच्चार करते हुए ऊपर उछलें, नीचे आएं। 'हू' का उच्चार अधिकतम गहरा हो और वह आपकी नाभि से उठे। हर बार जब आप नीचे आएं तब पैर के तलवे और एड़ी को धीमे से जमीन को छूने दें और उसी समय 'हू' की तीव्र ध्वनि से काम-केंद्र पर गहराई से चोट करें। इस चरण में अपनी पूरी शक्ति लगाएं; थोड़ी भी शक्ति शेष न बचाएं।
चौथा चरण : पंद्रह मिनट
रुक जाएं। जहां भी हैं, जैसे भी हैं, बिलकुल जम जाएं। शरीर को जरा भी व्यवस्थित न करें। जरा सी खांसी, कोई भी गति, कोई भी हलन-चलन ऊर्जा को क्षीण करेगी और अब तक की मेहनत को खराब करेगी। जो भी हो रहा है, उसके साक्षी बने रहें।
पांचवां चरण : पंद्रह मिनट
उत्सव मनाएं। संगीत और नृत्य के साथ अपने अंतस के अहोभाव को अभिव्यक्त करें। फलित हुई जीवंतता को दिन भर की अपनी चर्या में फैलने दें।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ऊर्जा का वर्तुल : अमृत साधना
यह एक वैज्ञानिक ओशो ध्यान विधि है -- जब आप आईने के सामने खड़े होंे, पहले अपने प्रतिबिंब को देखें ः आप देख रहे हैं और प्रतिबिंब दिख रहा है। फिर इस प्रक्रिया को उलटा देंे। ऐसा महसूस करें कि आप प्रतिबिंब हैं और प्रतिबिंब आपको देख रहा है। तत्क्षण आप देखेंेगे कि बदलाव हो रहा है, सघन ऊर्जा आपकी तरफ आ रही है।
यदि थोड़े दिन आप इसे करते हैं तो चकित होओगे कि सारे दिन कितना जीवंत महसूस करने लगे हैं। जहां कहीं वर्तुल पूरा होता है वहीं गहन मौन होता है। अधूरा वर्तुल बैचेनी पैदा करता है। जब वर्तुल पूरा हो जाता तो यह विश्राम पैदा करता है, यह आपको केंद्रित करता है। और केंद्रित होना ऊर्जावान बनाता है--और वह ऊर्जा आपकी ही है। यह तो मात्र एक प्रयोग है; फिर आप कई आयामों से प्रयास कर सकते हैंे।
जब आप गुलाब के फूल को देखेंगे, पहले कुछ पल गुलाब को देखें, और तब उल्टी प्रक्रिया प्रारंभ करें ः गुलाब का फूल आपको देख रहा है। आप आश्चर्यचकित होओगे कि गुलाब का फूल कितनी ऊर्जा आपको दे सकता है। और यही वृक्षों के साथ, और तारों के साथ और लोगों के साथ किया जा सकता है।

जन्म-मृत्यु से परे है जीवन!


मैं एक शवयात्रा में गया था। जो वहां थे, उनसे मैंने कहा- यदि यह शवयात्रा तुम्हें अपनी ही मालूम नहीं होती है, तो तुम अंधे हो। मैं तो स्वयं को अर्थी पर बंधा देख रहा हूं। काश! तुम भी ऐसा ही देख सको, तो तुम्हारा जीवन दूसरा हो जावे। जो स्वयं की मृत्यु को जान लेता है, उसकी दृष्टिं संसार से हटकर सत्य पर केंद्रित हो जाती है।
शेखसादी ने लिखा है- बहुत दिन बीते दजला के किनारे एक मुरदे की खोपड़ी ने कुछ बातें एक राहगीर से कही थीं। वह बोली थी,'ओ! प्यारे, जरा होश में चल। मैं भी कभी शाही दबदबा रखती थी और मेरे ऊपर ताज था। फतह मेरे पीछे-पीछे चली और मेरे पैर जमीन पर न पड़ते थे। होश ही न था कि एक दिन सब समाप्त हो गया। कीड़े मुझे खा गए हैं और हर पैर मुझे ठोकर मार जाता है। तू भी अपने कानों से गफलत की रुई निकाल डाल, ताकि तुझे मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत हासिल हो सके।'
मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत क्या है? और, क्या कभी हम उसे सुनते हैं! जो उसे सुन लेता है, उसका जीवन ही बदल जाता है।
जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है। उन दोनों के बीच जो है, वह जीवन नहीं, जीवन का आभास ही है। जीवन वह कैसे होगा, क्योंकि जीवन की मृत्यु नहीं हो सकती है! जन्म का अंत है, जीवन का नहीं। और, मृत्यु का प्रारंभ है, जीवन का नहीं। जीवन तो उन दोनों से पार है। जो उसे नहीं जानते हैं, वे जीवित होकर भी जीवित नहीं हैं। और, जो उसे जान लेते हैं, वे मर कर भी नहीं मरते।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या?


सुबह आती है, तो मैं सुबह को स्वीकार कर लेता हूं और सांझ आती है, तो सांझ को स्वीकार कर लेता हूं। प्रकाश का भी आनंद है और अंधकार का भी। जब से यह जाना, तब से दुख नहीं जाना है।
किसी आश्रम से एक साधु बाहर गया था। लौटा तो उसे ज्ञात हुआ कि उसका एकमात्र पुत्र मर गया है और उसकी शवयात्रा अभी राह में ही होगी। वह दुख में पागल हो गया। उसे खबर क्यों नहीं की गई? वह आवेश में अंधा दौड़ा हुआ श्मशान की और चला गया। शव मार्ग में ही था। उसके गुरु शव के पास ही चल रहे थे। उसने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया। दुख में वह मू‌िर्च्छत-सा हो गया था। फिर अपने गुरु से उसने प्रार्थना की, ''दो शब्द सांत्वना के कहें। मैं पागल हुआ जा रहा हूं।'' गुरु ने कहा, ''शब्द क्यों, सत्य ही जानो। उससे बड़ी कोई सांत्वना नहीं।'' और, उन्होंने शव-पेटिका के ढक्कन को खोला और उससे कहा, ''देखो- 'जो है', उसे देखो।'' उसने देखा। उसके आंसू थम गए। सामने मृत देह थी। वह देखता रहा और एक अंतदर्ृष्टिं का उसके भीतर जन्म हो गया। जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या? जीवन एक सत्य है, तो मृत्यु भी एक सत्य है। जो है- है। उससे अन्यथा चाहने से ही दुख पैदा होता है।
एक समय मैं बहुत बीमार था। चिकित्सक भयभीत थे और प्रियजनों की आंखों में विषाद छा गया था। और, मुझे बहुत हंसी आ रही थी, मैं मृत्यु को जानने को उत्सुक था। मृत्यु तो नहीं आई, लेकिन एक सत्य अनुभव में आ गया। जिसे भी हम
स्वीकार कर लें, वही हमें पीड़ा पहुंचाने में असमर्थ हो जाता
है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

हम सोये ही हुए हैं!


स्‍‌मरण रहे कि मैं मूर्छा को ही पाप कहता हूं। अमूर्च्छित चित्त-दशा में पाप वैसे ही असंभव है, जैसे कि जानते और जागते हुए अग्‍ि‌न में हाथ डालना। जो अमूच्‍‌र्छा को साध लेता है, वह सहज ही धर्म को उपलब्‍‌ध हो जाता है।
संत भीखण के जीवन की घटना है। वे एक रात्रि प्रवचन करते थे। आसोजी नाम का एक श्रावक सामने बैठा नींद ले रहा था। भीखण ने उससे पूछा- ‘‘आसोजी! नींद लेते हो?’’ आसोजी ने आंखें खोलीं और कहा- ‘‘नहीं महाराज!’’ थोड़ी देर और नींद फिर वापस लौट आई। भीखणजी ने फिर पूछा- ‘‘आासोजी सोते हो?’’ फिर मिला वही उत्तर- ‘‘नहीं महाराज।‘’ नींद में डूबा आदमी सच कब बोलता है! और, बोलना भी चाहे तो बोल कैसे सकता है! नींद फिर से आ गई। इस बार भीखण ने जो पूछा वह अद्भुत था। बहुत उसमें अर्थ है। प्रत्‍‌येक को स्‍‌वयं से पूछने योग्‍‌य वह प्रश्‍‌न है। वह अकेला प्रश्‍‌न ही बस, सारे तत्‍‌व-चिंतन का केंद्र और मूल है। उन्‍‌होंने जोर से पूछा- ‘‘आसोजी! जीते हो?’’ आसोजी तो सोते थे। निद्रा में सोचा कि वही पुराना प्रश्‍‌न है। फिर नींद में ‘‘जीते हो’’, ‘‘ सोते हो’’ जैसा ही सुनाई दिया होगा! आंखें तिलमिलाई और बोले- ‘‘नहीं महाराज!’’ भूल से सही उत्तर निकल गया। निद्र में जो है, वह मृत ही के तुल्‍‌य है। प्रमादपूर्ण जीवन और मृत्‍‌यु में अंतर ही क्‍‌या हो सकता है? जाग्रत ही जीवित है। जब तक हम जागते नहीं हैं- विवेक और प्रज्ञा में, तब तक हम जीवित भी नहीं हैं।
जो जीवन को पाना चाहता है, उसे अपनी निद्रा और मूच्‍‌र्छा छोड़नी होगी। साधारणत: हम सोये ही हुए हैं। और, हमारे भाव, विचार और कर्म सभी मूच्‍ि‌र्छत हैं। हम उन्‍‌हें ऐसे कर रहे हैं, जैसे कि कोई और हमसे कराता हो और जैसे कि हम किसी गहरे सम्‍‌मोहन में उन्‍‌हें कर रहे हों। जागने का अर्थ है कि मन और काया से कुछ भी मूच्‍ि‌र्छत न हो- जो भी हो, वह पूरी जागरूकता और सजगता में हो। ऐसा होने पर अशुभ असंभव हो जाता है और शुभ सहज ही फलित होता है।
‘’(सौजन्‍‌य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)