संयम सत्य का द्वार


संयम क्या है? अस्पर्श-भाव संयम है। तटस्थ साक्षी-भाव संयम है। संसार में 'होना' और साथ ही 'नहीं-होना' संयम है।
एक बार कन्फ्यूशियस से येन-हुई ने पूछा, ''मैं मन पर संयम रखने के लिए क्या करूं?'' कन्फ्यूशियस ने कहा, ''तुम कानों से नहीं सुनते, मन से सुनते हो; मन से भी नहीं सुनते, अपनी आत्मा से सुनते हो। प्रयत्न करो कि केवल कानों से ही सुनोगे। मन को कानों की सहायता करने की जरूरत न पड़े। तब शून्यावस्था में आत्मा बाह्य प्रभावों को अक्रियाता से ही ग्रहण करेगी। ऐसी समाधि में ही संयम है। और ऐसी अवस्था में ही भगवान का निवास है।''
येन-हुई ने कहा, ''किंतु इस भांति तो मरा व्यक्तित्व ही खो जाएगा? क्या शून्यावस्था का यही अर्थ नहीं है?'' कन्फ्यूशियस बोला, ''हां, यही अर्थ है। सामने, उस झरोखे को देखते हो? इसके होने से यह कक्ष प्राकृतिक सौंदर्य से जगमगा उठा है। परंतु, प्राकृतिक दृश्य बाहर ही हैं। चाहो तो अपने कानों और अपनी आंखों का प्रयोग अपने अंतर को इसी भांति ज्योतित करने के लिए कर सकते हो। इंद्रियों को झरोखा बनाओ और स्वयं शून्य हो रहो। इस अवस्था को ही मैं संयम कहता हूं।''
मैं आंखों से देखता हूं, कानों से सुनता हूं, पैरों से चलता हूं- और फिर भी 'मैं' सबसे दूर हूं, वहां न देखना है, न सुनना है, न चलना है। इंद्रियों से जो भी आता हो, उससे अलिप्त और तटस्थ खड़े होना सीखो। इस भांति अस्पर्श में प्रतिष्ठित हो जाने का नाम संयम है। और, संयम सत्य का द्वार है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

आंखें खोलो !


धर्म एक है, सत्य एक है और जो उसे खण्डों में देखते हों, जानें कि जरूर उनकी आंखें ही खण्डित हैं।
एक सुनार था। वह राम का भक्त था। भक्ति उसकी ऐसी अंधी थी कि राम के अतिरिक्त उसका किसी और मूर्ति पर कोई आदर न था। वह कभी किसी और मूर्ति के दर्शन नहीं करता था। दूसरी मूर्तियों के सामने वह अपनी आंखें बंद कर लेता था! एक दिन देश के राजा ने कृष्ण की मूर्ति के लिए जड़ाऊ मुकुट बनाने की उसे आज्ञा दी। वह सुनार बहुत धर्म संकट में पड़ा। कृष्ण की मूर्ति के सिर का नाप वह कैसे ले? किसी भांति आंखों पर पट्टी बांधकर वह मूर्ति का नाप लेने गया। लेकिन, कृष्ण की मूर्ति का नाप लेते समय उसे ऐसा अनुभव हुआ कि वह अपनी जानी-पहचानी राम की मूर्ति को ही टटोल रहा है! उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा और उसने एक ही झटके में अपनी आंखों की पट्टी निकालकर फेंक दी। इस घटना में उसकी बाहर की ही नहीं, भीतर की पट्टी भी दूर फिंक गई।। उसकी आंखें पहली बार खुलीं और उसने देखा कि सभी रूप प्रभु के हैं, क्योंकि उसका तो कोई भी रूप नहीं है! जिसका कोई रूप हो, उसके सभी रूप नहीं हो सकते हैं। जिसका कोई रूप नहीं है, वही सभी रूपों में हो सकता है।
यह कहानी सत्य है या नहीं, मुझे ज्ञात नहीं। लेकिन, मंदिरों, मस्जिदों और गिरजों में जाते लोगों की आंखों पर मैं ऐसी ही पट्टियां बंधी रोज देखता हूं। मैं उनसे इस कहानी को कहता हूं। वे मुझसे पूछते हैं कि क्या यह कहानी सत्य है? मैं कहता हूं कि अपनी आंखों पर बंधी पट्टीयों को टटोलें, तो आधी कहानी तो सत्य मालूम होगी ही और यदि उन पट्टियों को निकाल भी फेंकें तो शेष आधी कहानी भी सत्य हो जाती है!
आंखें खोलो और देखो। अपने ही हाथों से हम सत्य की पूर्णता से स्वयं को वंचित किए बैठे हैं। सब धारणाएं और आग्रहों को छोड़कर जो देखता है, वह सब जगह एक ही सत्ता और एक ही परमात्मा का अनुभव करता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

अंतस में खोजो


आनंद चाहते हो? आलोक चाहते हो? तो सबसे पहले अंतस में खोजो। जो वहां खोजता है, उसे फिर और कहीं नहीं खोजना पड़ता है। और, जो वहां नहीं खोजता, वह खोजता ही रहता है, किंतु पता नहीं है।
एक भिखारी था। वह जीवन भर एक ही स्थान पर बैठ कर भीख मांगता रहा। धनवान बनने की उसकी बढ़ी प्रबल इच्छा थी। उसने बहुत भीख मांगी। पर, भीख मांग-मांग कर क्या कोई धनवान हुआ है? वह भिखारी था, सो भिखारी ही रहा। वह जिया भी भिखारी और मरा भी भिखारी। जब वह मरा तो उसके कफन के लायक भी पूरे पैसे उसके पास नहीं थे! उसके मर जाने पर उसका झोंपड़ा तोड़ दिया गया और वह जमीन साफ की गई। उस सफाई में ज्ञात हुआ कि वह जिस जगह बैठकर जीवन भर भीख मांगता रहा, उसके ठीक नीचे भारी खजाना गड़ा हुआ था।
मैं प्रत्येक से पूछना चाहता हूं कि क्या हम भी ऐसे ही भिखारी नहीं हैं? क्या प्रत्येक के भीतर ही वह खजाना नहीं छिपा हुआ है, जिसे कि हम जीवन भर बाहर खोजते रहते हैं!
इसके पूर्व कि शांति और संपदा की तलाश में तुम्हारी यात्रा प्रारंभ हो, सबसे पहले उस जगह को खोद लेना, जहां कि तुम खड़े हो। क्योंकि, बड़े से बड़े खोजियों और यात्रियों ने सारी दुनिया में भटक कर अंतत: खजाना वहीं पाया है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ध्यान- सृजन में डूब जाएं!


कला एक ध्यान है। कोई भी कार्य ध्यान बन सकता है, यदि हम उसमें डूब जाएं। तो एक तकनीशियन मात्र मत बने रहें। यदि आप केवल एक तकनीशियन हैं, तो पेंटिंग कभी ध्यान नहीं बन पाएगी। हमें पेंटिंग में पूरी तरह डूबना होगा, पागल की तरह उसमें खो जाना पड़ेगा। इतना खो जाना पड़ेगा कि हमें भी खबर न रह जाए कि हम कहां जा रहे हैं, कि हम क्या कर रहे हैं कि हम कौन हैं!
यह पूरी तरह खो जाने की स्थिति ही ध्यान होगी। इसे घटने दें। चित्र हम न बनाएं, बल्कि बनने दें। और, मतलब यह नहीं है कि हम आलसी हो जाएं। नहीं, फिर तो वह कभी नहीं बनेगा। यह हम पर उतरना चाहिए, हमें परी तरह सक्रिय होना है और फिर भी कर्ता नहीं बनना है। यह पूरी कीमिया है, यह पूरी कला है- हमें सक्रिय होना है, लेकिन फिर भी कर्ता नहीं बनना है।
कैनवास के पास जाएं। कुछ मिनटों के लिए ध्यान में उतर जाएं, कैनवास के सामने शांत हो कर बैठ जाएं। यह 'सहज लेखन' जैसा होना चाहिए, जिसमें पैन अपने हाथ में लेकर हम शांत बैठ जाते हैं और अचानक हाथ में एक स्पंदन सा महसूस होता है। हमने कुछ किया नहीं, हम भलीभांति जानते हैं। हम तो सिर्फ शांत-मौन प्रतीक्षा कर रहे थे। एक स्पंदन सा होता है और हाथ चलने लगता है, कुछ उतरने लगता है।
उसी तरह से हमें पेंटिंग शुरू करनी चाहिए। कुछ मिनटों के लिए ध्यान में डूब जाएं, सिर्फ उपलब्ध रहें- कि जो भी होगा, हम उसे होने देंगे। हम अपनी सारी प्रतिभा, सारी कुशलता का उपयोग, जो भी होगा, उसे होने देंगे।
इस भाव दशा के साथ-साथ ब्रश उठाएं और शुरू करें। आहिस्ता शुरू करें, ताकि आप बीच में न आएं। बहुत आहिस्ता शुरू करें। जो भी भीतर से बहे, बहने दें और उसमें लीन हो जाएं। शेष सब भूल जाएं। कला सिर्फ कला के लिए ही हो, तभी वह ध्यान है। उसका कोई और लक्ष्य नहीं होना चाहिए। और, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हम पेंटिंग बेचे नहीं या उसका प्रदर्शन न करें- वह बिलकुल ठीक है। पर बाई-प्राडक्ट है। वह उसका उद्देश्य नहीं है। भोजन की जरूरत है, तो पेंटिंग बेचनी भी पड़ती है। हालांकि बेचने में पीड़ा होती है, यह अपना बच्चा बेचने जैसा ही है। मगर जरूरत है, तो ठीक है। दुख भी होता है, लेकिन वह उद्देश्य नहीं था, बेचने के लिए चित्र नहीं बनाया गया था। वह बिक गया- यह बिलकुल दूसरी बात है- लेकिन बनाते समय कोई उद्देश्य नहीं है। नहीं तो हम तकनीशियन ही रह जाएंगे।
हमें तो मिट जाना चाहिए। हमें मौजूद रहना चाहिए। जो भी हम कर रहे हों, उसमें बिना किसी नियंत्रण कि हमें पूरी तरह खो जाना चाहिए।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

सहनशीलता


सहनशीलता जिसमें नहीं है, वह शीघ्र टूट जाता है। और, जिसने सहनशीलता के कवच को ओढ़ लिया है, जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें उसे और मजबूत कर जाती हैं।
मैंने सुना है : एक व्यक्ति किसी लुहार के द्वार से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़े की चोटों को सुना और भीतर झांककर देखा। उसने देखा कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर और विकृत होकर पड़े हुए हैं। समय और उपयोग ने ही उनकी ऐसी गति की होगी। उस व्यक्ति ने लुहार से पूछा, ''इतने हथोड़ों को इस दशा तक पहुंचाने के लिए कितनी निहाइयों की आपको जरूरत पड़ी?'' लुहार हंसने लगा और बोला, ''केवल एक ही मित्र, एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है, क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई सहती है।''
यह सत्य है कि अंत में वही जीतता है, जो चोटों को धैर्य से स्वीकार करता है। निहाई पर पड़ती हथौड़ों की चोटों की भांति ही उसके जीवन में भी चोटों की आवाज तो बहुत सुनी जाती है, लेकिन अंतत: हथौड़े टूट जाते हैं और निहाई सुरक्षित बनी रहती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

स्वयं की खोज


स्मरण रखना कि इस जगत में स्वयं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं पाया जा सकता है। जो उसे खोजते हैं, वे पा लेते हैं और जो उससे अन्यथा कुछ खोजते हैं, वे अंतत: असफलता और विषाद को ही उपलब्ध होते हैं। वासनाओं के पीछे छोड़ने वाले लोग नष्ट हुए हैं- नष्ट होते हैं- और नष्ट होंगे। वह मार्ग आत्म-विनाश का है।
''एक छोटे से घुटने के बल चलने वाले बालक ने एक दिन सूर्य के प्रकाश में खेलते हुए अपनी परछाई देखी। उसे एक अद्भुत वस्तु जान पड़ी। क्योंकि, वह हिलता तो उसकी वह छाया भी हिलने लगती थी। वह छाया का सिर पकड़ने का उद्योग करने लगा। किंतु, जैसे ही वह छाया का सिर पकड़ने के लिए बढ़ता कि वह दूर हो जाता। वह कितना ही बढ़ता गया, लेकिन पाया कि सिर तो सदा उतना ही दूर है। उसके और छाया के बीच फासला कम नहीं होता था। थक कर और असफलता से वह रोने लगा। द्वार पर भिक्षा को आए हुए एक भिक्षु ने यह देखा। उसने पास आकर बालक का हाथ उसके सिर पर रख दिया। बालक रोता था, हंसने लगा; इस भांति छाया का मस्तक भी उसने पकड़ लिया था।''
कल मैंने यह कथा कही और कहा, ''आत्मा पर हाथ रखना जरूरी है। जो छाया को पकड़ने में लगते हैं, वे उसे कभी भी नहीं पकड़ पाते। काया छाया है। उसके पीछे जो चलता है, वह एक दिन असफलता से रोता है।''
वासना दुष्पूर है। उसका कितना ही अनुगमन करो, वह उतनी ही दुष्पूर बनी रहती है। उससे मुक्ति तो तब होती है, जब कोई पीछे देखता है और स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

समता ही परमेश्वर!



अंत:करण जब अक्षुब्ध होता है और दृष्टिं सम्यक, तब जिस भाव का उदय होता है, वही भाव परमसत्ता में प्रवेश का द्वार है। जिनका अंत:करण क्षुब्ध है और दृष्टिं असम्यक, वे उतनी ही मात्रा में सत्य से दूर होते हैं। श्री अरविंद का वचन है, 'सम होने याने अनंत हो जाना।' असम होना ही क्षुद्र होना है और सम होते ही विराट को पाने का अधिकार मिल जाता है।

''धर्म क्या है?'' मैंने कहा : ''सम भाव।'' जिन्होंने पूछा था, वे कुछ समझे नहीं। फिर, उन्होंने पूछा। मैंने उनसे कहा, ''चित्त की एक ऐसी दशा भी है, जहां कुछ भी अशांत नहीं करता है। अंधकार और प्रकाश वहां समान दीखते हैं। और सुख-दुखों का उस भाव में समान स्वागत और स्वीकार होता है। वह चित्त की धर्म-दशा है। ऐसी अवस्था में ही आनंद उत्पन्न होता है। जहां विरोधी भी विपरीत परिणाम नहीं लाते और जहां कोई भी विकल्प चुना नहीं जाता है, उस निर्विकल्प दशा में ही स्वयं में प्रवेश होता है।'' फिर वे जाने को ही थे और मुझे कुछ स्मरण आया। मैंने कहा : ''सुनो, एक साधु हुआ है- जोशु। उससे किसी ने पूछा था कि क्या धर्म को प्रकट करने वाला कोई एक शब्द है। जोशु ने कहा : 'पूछोगे तो दो हो जाएंगे।' किंतु पूछने वाला नहीं माना, तो जोशु बोला था : 'वह शब्द है- हाँ।' ''

जीवन की समस्तता और समग्रता के प्रति स्वीकार को पा लेने का नाम ही सम-भाव है। वही है समाधि। उसमें ही 'मैं' मिटता और विश्व-सत्ता से मिलन होता है। जिसके चित्त में 'नहीं' है, वह समग्र से एक नहीं हो पाता है। सर्व के प्रति 'हां' अनुभव करना जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है। क्योंकि, वह 'स्व' को मिटाती है और स्वयं से मिलती है। मैंने सबसे बड़ी संपत्ति 'सम-भाव' को जाना है। समत्व अद्वितीय है। आनंद और अमृत केवल उसे ही मिलते हैं, जो उस दशा को स्वयं में आविष्कृत कर लेता है। वह स्वयं के परमात्मा होने की घोषणा है। कृष्ण का आश्वासन है 'समता ही परमेश्वर है।'


(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)