| | तो मैं आपसे निवेदन करता हूं, नैतिक होने से कोई धार्मिक नहीं होता। नैतिक होने से वस्तुतः कोई नैतिक ही नहीं होता है, क्योंकि नैतिकता अहंकार को समाप्त ही नहीं कर6ती और बढ़ाती है। और अहंकार सबसे बड़ी अनैतिकता है। धार्मिक होने से यह होता है। धार्मिक चित्त, रिलीजस माइंड एक अदभुत क्रांति है। सारा जीवन बदल जाता है। फिर चोरी से बचना नहीं पड़ता, चोरी का चित्त ही चला जाता है। फिर झूठ से बचना नहीं पड़ता, झूठ का चित्त ही चला जाता है। फिर क्रोध से बचना नहीं पड़ता, क्रोध का चित्त चला जाता है। बुद्ध एक गांव के पास से निकलते थे, कुछ लोग वहां इकट्ठे हुए और उन्होंने बुद्ध को बहुत गालियां दीं, बहुत अपमानजनक शब्द कहे। बुद्ध ने खड़े होकर सुना, और फिर बाद में उनसे कहा कि मित्रो, तुम्हारी बात पूरी हो गई हो तो मैं जाऊं, मुझे दूसरे गांव थोड़ा जल्दी पहुंचना है। वे लोग थोड़े हैरान हुए, गाली देने वाला सबसे ज्यादा हैरान तभी होता है जब दूसरा आदमी उसकी गाली लेता नहीं। अगर ले ले तब तो हैरानी खतम हो जाती है। मामला बन जाता है। वह भी हमारे तल पर उतर आता है, हम भी उसके तल पर खड़े हो जाते हैं। बात सीधी और साफ हो जाती है। लेकिन बुद्ध ने कहा कि मुझे दूसरे गांव जल्दी जाना है। अगर तुम्हारी बातें पूरी हुई हों तो मैं जाऊं। उन लोगों ने कहा: ये बातें थीं क्या? हमने इतनी गालियां दीं, इतना अपमान किया? बुद्ध ने कहा: तुमने किया वह तो ठीक है, लेकिन इतनी आजादी तो मुझे दोगे कि मैं उसे लूं या न लूं? इतना हक तो मुझे दोगे? तुमने गाली दी वह ठीक लेकिन मैं न लूं, इतना हक तो मुझे है। कि मुझे मजबूरी है कि मुझे लेनी पड़ेगी? बुद्ध ने कहा, पहले मैं भी ले लेता था लोग जो भी देते थे, अब तो मैं चुन-चुन कर लेता हूं जो लेना होता है, जो नहीं लेता वह नहीं लेता। पिछले गांव में कुछ लोग मिठाइयां लेकर आए थे और कहने लगे कि ले लो। मैंने कहा: पेट मेरा भरा है, और बोझ ढोना ठीक नहीं, दूसरे गांव में फिर कोई दे ही देगा। वे बेचारे वापस ले गए। मिठाइयां वापस ले गए। अब तुम क्या करोगे? तुम गालियां लेकर आए हो। तुम्हें वापस ले जाना पड़ेगा। तुम गड़बड़ आदमी के पास आए गए। मैं लेता नहीं हूं। और उन्होंने तो अपने बच्चों को बांट दी होंगी मिठाइयां, तुम अपनी गालियां का क्या करोगे? बड़ी मुसीबत में पड़ गए। और तुम पर मुझे बहुत दया आती है। अब मैं क्या करूं, तुम्हें किस भांति सहारा दूं? मैं किस भांति तुम्हें बोझ से हलका करूं? मैं बिलकुल मुश्किल में हूं, मैंने गालियां लेना बंद कर दीं। और गालियां लेनी मैंने इसलिए बंद नहीं कीं कि तुम पर मुझे कोई दया करनी है बल्कि इसलिए कि मुझे अपने पर दया आनी शुरू हो गई। जैसे-जैसे मैंने भीतर देखा मुझे अपने पर दया आने लगी और अपने से प्रेम हो गया। अब मैं अपने को इतना प्रेम करता हूं कि मैं गाली नहीं लेता। अब मैं अपने को इतना प्रेम करता हूं कि मैं क्रोधित नहीं होता। अब मैं अपने को इतना प्रेम करता हूं कि चोरी असंभव है। बुद्ध ने यह कहा: जब भी कोई व्यक्ति अपने चित्त में धर्म को पाएगा, तो वह पाएगा कि क्रोध असंभव हो गया। गाली लेना असंभव हो गया। अपमान लेना असंभव हो गया। करना भी असंभव हो गया। जीवन एक बिलकुल ही नई दिशा में गति करना शुरू करता है। नैतिक व्यक्ति की दिशा का कोई भेद नहीं है वह अनैतिक के साथ ही खड़ा है। जिस तरफ अनैतिक आंख किए खड़ा है नैतिक व्यक्ति उस तरफ पीठ किए खड़ा है, लेकिन खड़ा वहीं है, उसके खड़े होने में कोई डायमेंशन का फर्क नहीं है, कोई दिशा का फर्क नहीं है, कोई आयाम का फर्क नहीं है। वह वहीं खड़ा है। उसकी पीठ फेर लेने में कोई दिक्कत नहीं है, जरा ही हाथ का धक्का दो उसकी पीठ फेरी जा सकती है। जरा ही उसको जोर से एक सुई चुभा दो, तो उसकी स्किनडीप जो मॉरेलिटी है, खतम हो जाएगी, वह अपने असली रूप में वापस लौट आएगा। यह तो रोज होता है। एक आदमी को हम देखते हैं रोज मस्जिद जाता है, नमाज पड़ता है; एक आदमी को हम रोज देखते हैं गीता खोलता, पाठ करता है, तिलक लगाता है, चंदन लगाता है, सब करता है, और एक दिन हम अचानक पाते हैं कि हिंदू-मुसलमान लड़ गए। और वह नमाज पढ़ने वाला और गीता पढ़ने वाला छुरा लिए दौड़ा जा रहा है। बड़ा मुश्किल है। यह क्या हो गया इनको? ये तो बड़े नैतिक और भले आदमी थे, रोज नमाज पड़ते थे, गीता पड़ते थे, रामायण पड़ते थे, यह हो क्या गया? एक मंदिर तोड़ रहा है, दूसरा मस्जिद में आग लगा रहा है। यह हो क्या गया? इनकी नैतिकता गई कहां? इनका धर्म कहां गया? चमड़े से भी पतली नैतिकता थी वह, जरा उसको खरोंच दो खतम हो जाती है, उसमें कोई देर नहीं लगती। ऐसी नैतिकता का कोई मूल्य नहीं है। और ऐसी नैतिकता के भ्रम में मनुष्य आज तक रहा है। मैं नीति को धर्म नहीं मानता, लेकिन धर्म को जरूर नीति मानता हूं। समाप्त (सौजन्य से : ओशो न्यूज लेटर) |
नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे
नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे
कनफ्यूशियस कुछ दिनों के लिए एक दफा मजिस्ट्रेट हो गया था। ज्यादा दिन नहीं रह सका। क्योंकि अच्छा आदमी मजिस्ट्रेट ज्यादा दिन नहीं रह सकता। मजिस्ट्रेट ज्यादा दिन वही रह सकता है जिसके पास कोई आत्मा न हो। कनफ्यूशियस मजिस्ट्रेट हो गया था, उसके पास आत्मा थी इसलिए पहले मुकदमे में ही सब गड़बड़ हो गई बात। दूसरा मुकदमा उसके सामने नहीं लाया जा सका, क्योंकि वह निकाल बाहर कर दिया गया।
मुकदमा आ गया था, एक साहूकार, जो उसके गांव का सबसे बड़ा साहूकार था, उसकी चोरी हो गई थी। कनफ्यूशियस के सामने मुकदमा आया। चोर पकड़ लिया गया था। चोरी में गई चीजें पकड़ ली गई थीं। मामला साफ था। सजा देनी चाहिए थी। कनफ्यूशियस ने सजा दी। लेकिन दोनों को सजा दे दी, साहूकार को भी और चोर को भी। छह-छह महीने की सजा दे दी।
साहूकार चिल्लाया कि मजाक करते हैं, किस कानून में लिखा है यह? और यह क्या पागलपन है, मुझे सजा देते हैं? कनफ्यूशियस ने कहा: तुम न होते तो यह चोर भी नहीं हो सकता था। तुम हो इसलिए यह चोर है। चोर बाई-प्रोडक्ट है। चोर तुम्हारी पैदाइश है। यह तुम्हारा पुत्र है चोर। तुम बाप हो, यह बेटा है। तुमने सारे गांव की संपत्ति इकट्ठी कर ली, चोरी नहीं होगी तो क्या होगा? सारे गांव की संपत्ति इकट्ठी हो गई एक तरफ, सारा गांव कंगाल हो गया, चोरी नहीं होगी तो क्या होगा? इस चोर का कसूर ज्यादा नहीं है, पूरा गांव चोर हो जाएगा धीरे-धीरे।
और यह हुआ है। सारी दुनिया चोर हो गई चिल्लाते-चिल्लाते कि चोरी मत करो। यह होगा। क्योंकि चोरी की बुनियाद तोड़ने के लिए धर्मग्रंथ कुछ भी नहीं कहते, शोषण को तोड़ने के लिए कुछ भी नहीं कहते। इसलिए चोरी तो बढ़ती जाएगी, एक दिन सारी दुनिया चोर होगी। यह होना मजबूरी है। कनफ्यूशियस को निकाल कर बाहर कर दिया गया कि यह मजिस्ट्रेट होने के काबिल नहीं, यह आदमी तो पागल है।
ढाई हजार साल हो गए कनफ्यूशियस को मरे हुए। अब तक भी हम उस स्थिति में नहीं आ पाए हैं कि कनफ्यूशियस को फिर से मजिस्ट्रेट बना दें। अब भी हम उस हालत में नहीं आ पाए। उस दिन की प्रतीक्षा करनी है अभी और जिस दिन कनफ्यूशियस को हम वापस मजिस्ट्रेट बना सकें कि अब फिर तुम मजिस्ट्रेट हो जाओ। लेकिन अभी भी आदमी उतनी समझ पर नहीं आ पाया।
समाज की व्यवस्था को जमाए रखने के लिए सारी नीति है। और समाज ने व्यवस्था कर रखी है। पुलिस, मजिस्ट्रेट, इनसे काम थोड़ा-बहुत चलता है, लेकिन कुछ चोर बहुत होशियार होते हैं, वे पुलिसवाले से भी बच जाते हैं, मजिस्ट्रेट से भी बच जाते हैं। क्योंकि आखिर मजिस्ट्रेट भी आदमी है, पुलिसवाला भी आदमी है। और आदमी की कमजोरियां हैं। वे बच जाते हैं। सबकी कमजोरियां हैं। तो जो बच जाते हैं उनके लिए क्या किया जाए? तो उनके लिए कांसियंस पैदा की है। कांस्टेबल बाहर, कांसियंस भीतर। पुलिसवाला बाहर और भीतर नैतिक बुद्धि। बचपन से पिला रहे हैं उनको चोरी मत करना, यह मत करना, वह मत करना, ताकि भीतर से भी एक घबड़ाहट पैदा हो जाए। बाहर के पुलिसवाले से बच जाएं तो भीतर के पुलिसवाले से न बच सकें। और ऊपर एक परमात्मा बिठाया हुआ है सुप्रीम कांस्टेबल, सबसे बड़ा पुलिसवाला, हेड कांस्टेबल। उसका डर है कि वह नरक में डाल देगा, सड़ा देगा। यह कर देगा, वह कर देगा।
समाज अपनी व्यवस्था को जमाए रखने के लिए सारी नैतिकता का जाल खड़ा किया है। इसका मतलब यह नहीं है कि मैं आपसे कह रहा हूं अनैतिक हो जाएं, मैं आपसे यह कह रहा हूं कि इस भांति आप नैतिक भी हो जाएं तो भी नैतिक नहीं होते, यह सब अनैतिकता है। अगर सच में ही नैतिक होना है तो धार्मिक होना पड़ेगा। धार्मिक हुए बिना कोई नैतिक नहीं होता। एक सामाजिक जाल का हिस्सा होता है, और समाज नैतिक व्यक्ति को आदर देता है, उसके अहंकार को तृप्ति देता है, उसी के बल पर उससे कुछ त्याग करवाता है। उसके अहंकार को फुसलाता है। उसको आदर देता है कि ये बहुत नैतिक पुरुष हैं, राष्टऱ्पतियों से जाकर उनको पद्मश्री और भारतरत्न की उपाधियां दिलवाता है कि ये बहुत अच्छे नैतिक पुरुष हैं, उसके अहंकार को, उसके अहंकार को पुष्टि दिलवाता है। ताकि उस अहंकार के प्रभाव में वह बेचारा थोड़ा त्याग करे, चोरी न करे, बेईमानी न करे। लेकिन यह व्यवस्था असफल हो गई है, क्योंकि वे सारे नैतिक पुरुष इस बात को अच्छी तरह समझ लेते हैं कि नैतिकता दिखलाओ इतना ही काफी है, होने की कोई खास जरूरत नहीं। और तब एक ढकोसला और एक झूठ पूरे समाज के जीवन को पकड़ लिया है।
(सौजन्य से : ओशो न्यूज लेटर)
नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे
इन्हीं नैतिक व्यक्तियों ने नरक की कल्पना की है कि चोरों को वहां जलवाएंगे कड़ाहियों में, बेईमानों को वहां आग में डालेंगे, कीड़े-मकोड़े सताएंगे, और नरक में अनंतकालीन कष्ट देंगे। ऐसे-ऐसे धर्म हैं जो कहते हैं कि अनंतकाल के लिए नरक में डाल दिए जाएंगे, अनंतकाल के लिए। कितने पाप किया होगा आखिर? एक आदमी जिंदगी में कितना पाप कर सकता है। दो-चार-दस साल की सजा भी ठीक हो सकती थी, अनंतकाल के लिए नरक में डाल देने वाले लोग कौन रहे होंगे? ये वे ही नैतिक लोग, जिन्होंने थोड़ी-बहुत ईमानदारी साध ली है तो बेईमानों से बदला लेना चाहते हैं उसका नरक में डाल कर। ये वे ही नैतिक लोग रस लेते हैं नरक में और खुद के लिए व्यवस्था कर ली उन्होंने स्वर्ग की। जहां ऐसी स्त्रियां हैं जो हमेशा जवान रहती है और कभी बूढ़ी नहीं होतीं। और जहां नदियों में शराब बहती है पानी नहीं बहता। यहां उन्होंने चुल्लू भर शराब छोड़ दी है तो वहां शराब के झरनों में नहाना चाहते हैं और पीते रहना चाहते हैं।
अपने लोगों ने व्यवस्था कर ली है नैतिक लोगों ने स्वर्ग की और अनैतिक लोगों के लिए नरक की। यह क्या धार्मिक लोगों ने किया होगा? क्या कोई धार्मिक चित्त का व्यक्ति यह कल्पना कर सकता है कि जिसने कभी भूल की है उसे नरक में डाल कर आग में सड़ाएंगे। और अगर ऐसा आदमी भी धार्मिक आदमी भी यह कल्पना कर सकता है तो फिर अधार्मिक आदमी और धार्मिक आदमी में भेद क्या है?
तो मुझे दिखाई पड़ता है ये सारे स्वर्ग-नरक नैतिक व्यक्ति से पैदा हुए हैं, धार्मिक व्यक्ति से नहीं। यह भय और प्रलोभन नैतिक व्यक्ति ने पैदा किया धार्मिक व्यक्ति ने नहीं।
धर्म का संबंध नीति से कोई भी नहीं है इस भांति का जैसा हम सोचते हैं कि नैतिक व्यक्ति धार्मिक हो जाएगा। नहीं, लेकिन एक दूसरी तरह का संबंध जरूर है। धार्मिक व्यक्ति अनिवार्यतः नैतिक हो जाता है, लेकिन उसे नैतिक होने का बोध नहीं होता। यह सहज होता है। यह कोई कल्टिवेटिड, यह कोई आरोपित बात नहीं होती उसका नैतिक होना। वह नैतिक होने को मजबूर होता है। वह नैतिक होने को विवश होता है। वह नैतिक ही हो सकता है, अनैतिक होने का सवाल ही नहीं उठता। यह मुझे नहीं लगता कि कोई नैतिकता जीवन का पथ है। कभी भी नहीं है। नैतिकता तो कोई और प्रयोजन से व्यवस्था की गई है, उसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। समाज की व्यवस्था है नैतिकता। समाज चाहता है चोरी न हो। समाज चाहता है जिनका धन है उनके पास सुरक्षित रहे। और जिनके पास धन है वे तो बहुत ही चिंतित हैं इस बात के लिए कि चोरी बिलकुल न हो। इसलिए धनियों ने जितने भी ग्रंथ लिखवाए हैं सबमें लिखवा दिया है चोरी करना पाप है। लेकिन धनिकों के द्वारा लिखवाए गए ग्रंथों में कहीं भी नहीं लिखा है कि शोषण करना पाप है, एक्सप्लाइटेशन पाप है, यह कहीं भी नहीं लिखा है। आज तक एक भी धर्मग्रंथ ने यह नहीं लिखा कि एक्सप्लाइटेशन पाप है। चोरी पाप है यह तो समझ में आ गया, लेकिन इतना धन इकट्ठा कैसे हो जाता है एक आदमी के पास? यह पाप नहीं है? नहीं तो वे धर्मग्रंथ कहते हैं यह पिछले जन्मों के पुण्य से इकट्ठा हो गया।
गरीबी पिछले जन्म के पाप के कारण है, धन पिछले जन्म के पुण्य के कारण है। और चोरी, चोरी करना मत, क्योंकि चोरी हमेशा धनिक के विरोध में है, इसलिए चोरी पाप है। शोषण पाप नहीं है। और बड़ा मजा यह है कि अगर शोषण न हो तो चोरी कैसे हो सकती है? जब तक दुनिया में शोषण है चोरी होगी। चोरी कैसे रुक सकती है। बड़े चोर धनपति हैं, छोटे चोर जेलों में बंद हैं। बिना चोरी के धन इकट्ठा होता ही नहीं। धन का संग्रह मात्र चोरी है, लेकिन धन के संग्रह को पाप नहीं कहते हैं धर्मग्रंथ। और नैतिक गुरु उसको पाप नहीं बताते हैं। क्योंकि सब नैतिक गुरु और सब धर्मशास्त्री जिन-जिन के धन पर जीते हैं, उनके धन की निंदा नहीं कर सकते, उसमें असमर्थ हैं। इसलिए एक षड्यंत्र चल रहा है दुनिया में हजारों साल से धनियों के बीच और धर्मगुरुओं के बीच एक साजिश चल रही है। और धर्मगुरु धनी की सुरक्षा कर रहा है हजारों साल से। और व्यवस्था दे रहा है उसको कि तेरे पुण्य का फल है यह। और चोरी के विरोध में है वह।
जारी----
नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे
नैतिक व्यक्ति तो द्वंद्वग्रस्त व्यक्ति है। नैतिक व्यक्ति धार्मिक व्यक्ति नहीं है। तो क्या मैं यह कह रहा हूं कि आप अनैतिक हो जाएं? नहीं, मैं आपसे यह कह रहा हूं कि नैतिक होने से आप इस भूल में मत पड़ जाना कि आप धार्मिक हो गए हैं। धार्मिक होना आयाम ही दूसरा है, दिशा ही दूसरी है। वह बात ही और है। वह सुगंध और है। वह प्रकाश और है। नैतिक मनुष्य को न तो कोई प्रकाश मिलता है, न कोई सुगंध और न कुछ। बल्कि नैतिक मनुष्य का सारा रस अहंकार का रस होता है। जैसे हम अच्छे-अच्छे वस्त्र पहन कर शानदार दिखाई पड़ने लगते हैं, हममें जो बहुत चालाक हैं वे अच्छा आचरण करके बहुत शानदार हो जाते हैं। उनका अहंकार तृप्त होता है इस बात से कि मैं झूठ नहीं बोलता, मैं चोर नहीं हूं, मैं बेईमान नहीं हूं। मैं बेईमान हो सकता हूं? तुम होओगे बेईमान, सारी दुनिया होगी बेईमान, लेकिन मैं? मैं सात्विक पुरुष और नैतिक पुरुष, मैं बेईमान हो सकता हूं, चोर हो सकता हूं। तो यह नैतिक पुरुष तो ईगोइस्ट होता है। और नैतिक पुरुष से ज्यादा अहंकारी आदमी खोजना मुश्किल है। और इसीलिए नैतिक पुरुष दूसरे की अनीति में हमेशा झांकता रहता है। देखता रहता है कि कौन-कौन चोरी कर रहा है। क्योंकि इसी में उसे रस होता है कि मैं चोरी नहीं करता हूं। कौन-कौन चोरी करता है। नैतिक पुरुष दूसरों की दीवाल में छेद करके झांकता रहता है कि दूसरे लोग अपने घरों में क्या कर रहे हैं। नैतिक व्यक्ति निंदक होता है हमेशा दूसरों का। क्योंकि उसका सारा रस ही इस बात में है कि वह नैतिक है और दूसरे लोग नैतिक नहीं हैं।
इसलिए जो कौम नीति के चक्कर में पड़ जाती है वह निंदक हो जाती है। हम अपने ही मुल्क में इस बात को भलीभांति जानते हैं। हमारे मुल्क जैसे निंदक लोग कहां खोजने से मिलेंगे। और हमारे जैसे मुल्क के लोग नीति के प्रेमी भी और कहां मिलेंगे। दिन-रात सुबह से शाम तक नीति की चर्चा करते हैं। और दिन-रात सुबह से शाम तक दूसरों की निंदा करते हैं और दूसरों के वस्त्र उघाड़ कर देखते हैं और दूसरों की दीवालों में झांकते हैं। क्यों? यह अनिवार्य है। क्योंकि नैतिक पुरुष का एक ही मजा है कि मैं भला आदमी हूं। और यह भलापन उतना ही बड़ा हो जाता है जितने दूसरे लोग बुरे सिद्ध हो जाते हैं। इसलिए हर नैतिक आदमी दूसरे को बुरा सिद्ध करने में लगा रहता है।
लेकिन धार्मिक व्यक्ति बहुत दूसरे तरह का व्यक्ति होता है। उसकी नैतिकता उसके धार्मिक स्वभाव से बहती है वैसे ही जैसे दीये से प्रकाश बहता है, फूल से सुगंध बहती है। उसे पता भी नहीं चलता कि मैं नैतिक हूं। और इसलिए धार्मिक व्यक्ति कभी किसी दूसरे की अनीति में झांक कर देखने की कोशिश भी नहीं करता। बल्कि अगर आप उसे दिखाना भी चाहें तो उसे दिखना मुश्किल हो जाएगा।
जापान में एक रात एक फकीर के घर में एक चोर घुसा। दरवाजा धकाया, सोचता था बंद होगा, लेकिन फकीर का दरवाजा था, बंद किसके लिए किया जाता, वह खुला था, अटका हुआ था। चोर को अंदाज न था कि फकीर जगता होगा, कोई बारह बजे थे रात के। भीतर गया तो घबड़ा गया, फकीर बैठा था, कुछ चिट्ठी-पत्री लिखता था। उस फकीर ने कहा: आओ, आओ, इतनी रात को तो कोई कभी आता नहीं, कैसे आए मित्र? उस फकीर को खयाल भी नहीं आया कि यह आदमी चोर हो सकता है या हत्यारा हो सकता है। आधी रात में दूसरे के घर में एकदम से घुस आया और हाथ में उसके छुरा था नंगा। लेकिन उस फकीर ने कहा: आओ, आओ मित्र, इतनी रात गए तो कोई भी नहीं आता, आओ, बैठो। उस फकीर की प्रेम भरी बात सुन कर उस चोर को लौट कर भागना भी आसान न हुआ। मजबूरी में उसे बैठ जाना पड़ा कुर्सी पर। उस फकीर ने पूछा: क्या इरादे हैं? कैसे आए? क्या चाहते हो? उस सीधे-सरल आदमी के सामने झूठ बोलना भी शायद आसान नहीं हुआ। उस चोर ने कहा कि मैं चोरी करने आया हूं। उस फकीर ने कहा: बड़े बेवक्त आए। एक-दो दिन पहले तो खबर करनी थी, तो मैं कुछ व्यवस्था करता कि तुम चोरी करके ले जाते। फकीर का झोपड़ा है। बड़ी दुविधा में तुमने मुझे डाल दिया। तो क्या तुम्हें दूं? हां, अच्छा ही हुआ, सुबह एक आदमी आया था और दस रुपये भेंट कर गया था, वे रखे हैं। लेकिन इतने से पैसे में...तुम इतनी दूर आए अंधेरी रात में और फकीर के झोपड़े पर आए, इसी से पता चलता है कि कितनी मुसीबत में और कितनी जरूरत में होओगे, दस रुपये से काम चल सकेगा? वह चोर तो बहुत घबड़ा गया। उसकी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करे। फकीर उठा उसने अपने आले से दस रुपये निकाले और उस चोर को दिए। और कहा कि अगर तुम्हारी मर्जी हो तो एक रुपया छोड़ जाओ, सुबह-सुबह कभी मुझे जरूरत पड़ जाती है। उस चोर ने एक रुपया छोड़ दिया और वह भागा निकल कर। फकीर चिल्लाया और उसने कहा कि रुको मित्र, दरवाजा तो कम से कम अटका दो और कम से कम मुझे धन्यवाद तो दे जाओ, क्योंकि दस रुपये जो तुमने लिए हैं वे तो कल चुक जाएंगे, लेकिन दिया हुआ धन्यवाद कभी पीछे भी काम पड़ सकता है, तो धन्यवाद देते चले जाओ।
वह चोर किसी तरह धन्यवाद देकर वहां से भागा। पीछे वह पकड़ा गया और मुकदमा चला। और भी बहुत सी चोरियां उसके ऊपर थीं। इस फकीर की चोरी का मामला भी था। इस फकीर को अदालत में बुलाया गया। वह चोर बहुत डरा हुआ था, कि अगर उस फकीर ने पहचान लिया तो उसका पहचानना ही काफी होगा, फिर किसी और प्रमाण की जरूरत न रह जाएगी। वह इतना प्रसिद्ध आदमी था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा उस फकीर को कि आप पहचानते हैं इसे?
उसने कहा: भलीभांति पहचानता हूं, ये मेरे मित्र हैं। और कई बार तो ऐसा हुआ है कि आधी रात भी आ गए हैं। मित्र के घर ही कोई आधी रात को आता है, ऐसे किसके घर कौन जाता है। वह फकीर ने यह कहा, वह चोर तो घबड़ाया हुआ था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा: इसने कभी तुम्हारे यहां चोरी की?
उसने कहा कि नहीं, कभी नहीं। एक बार ये आए थे तो नौ रुपये मैंने इन्हें दिए थे, लेकिन उसके लिए इन्होंने धन्यवाद दे दिया था। बात खतम हो गई, उसका कोई लेना-देना बाकी नहीं रहा। और ये आदमी बहुत भले हैं मैं आपसे कह दूं, क्योंकि मैंने इनसे कहा था एक रुपया छोड़ जाओ, तो ये छोड़ गए थे। और मैंने इनसे कहा, दरवाजा अटका दो, तो इन्होंने दरवाजा अटका दिया था। और मैंने इनसे कहा कि धन्यवाद दे दें, तो यह इतना सीधा आदमी कि इसने मुझे धन्यवाद भी दिया था। कौन कहता है यह चोर है?
यह एक धार्मिक व्यक्ति का अनुभव होता है जीवन के प्रति। उसे चोर दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का चोर मर जाता है। उसे बेईमान दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का बेईमान मर जाता है। उसे हत्यारा दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का हत्यारा मर जाता है। नैतिक व्यक्ति के भीतर खूब घनीभूत हो जाता है हत्यारा, चोर और बेईमान, तो उसे हर एक के भीतर चोर, बेईमान दिखाई पड़ने लगता है।
(सौजन्य से : ओशो न्यूज लेटर)
इसलिए जो कौम नीति के चक्कर में पड़ जाती है वह निंदक हो जाती है। हम अपने ही मुल्क में इस बात को भलीभांति जानते हैं। हमारे मुल्क जैसे निंदक लोग कहां खोजने से मिलेंगे। और हमारे जैसे मुल्क के लोग नीति के प्रेमी भी और कहां मिलेंगे। दिन-रात सुबह से शाम तक नीति की चर्चा करते हैं। और दिन-रात सुबह से शाम तक दूसरों की निंदा करते हैं और दूसरों के वस्त्र उघाड़ कर देखते हैं और दूसरों की दीवालों में झांकते हैं। क्यों? यह अनिवार्य है। क्योंकि नैतिक पुरुष का एक ही मजा है कि मैं भला आदमी हूं। और यह भलापन उतना ही बड़ा हो जाता है जितने दूसरे लोग बुरे सिद्ध हो जाते हैं। इसलिए हर नैतिक आदमी दूसरे को बुरा सिद्ध करने में लगा रहता है।
लेकिन धार्मिक व्यक्ति बहुत दूसरे तरह का व्यक्ति होता है। उसकी नैतिकता उसके धार्मिक स्वभाव से बहती है वैसे ही जैसे दीये से प्रकाश बहता है, फूल से सुगंध बहती है। उसे पता भी नहीं चलता कि मैं नैतिक हूं। और इसलिए धार्मिक व्यक्ति कभी किसी दूसरे की अनीति में झांक कर देखने की कोशिश भी नहीं करता। बल्कि अगर आप उसे दिखाना भी चाहें तो उसे दिखना मुश्किल हो जाएगा।
जापान में एक रात एक फकीर के घर में एक चोर घुसा। दरवाजा धकाया, सोचता था बंद होगा, लेकिन फकीर का दरवाजा था, बंद किसके लिए किया जाता, वह खुला था, अटका हुआ था। चोर को अंदाज न था कि फकीर जगता होगा, कोई बारह बजे थे रात के। भीतर गया तो घबड़ा गया, फकीर बैठा था, कुछ चिट्ठी-पत्री लिखता था। उस फकीर ने कहा: आओ, आओ, इतनी रात को तो कोई कभी आता नहीं, कैसे आए मित्र? उस फकीर को खयाल भी नहीं आया कि यह आदमी चोर हो सकता है या हत्यारा हो सकता है। आधी रात में दूसरे के घर में एकदम से घुस आया और हाथ में उसके छुरा था नंगा। लेकिन उस फकीर ने कहा: आओ, आओ मित्र, इतनी रात गए तो कोई भी नहीं आता, आओ, बैठो। उस फकीर की प्रेम भरी बात सुन कर उस चोर को लौट कर भागना भी आसान न हुआ। मजबूरी में उसे बैठ जाना पड़ा कुर्सी पर। उस फकीर ने पूछा: क्या इरादे हैं? कैसे आए? क्या चाहते हो? उस सीधे-सरल आदमी के सामने झूठ बोलना भी शायद आसान नहीं हुआ। उस चोर ने कहा कि मैं चोरी करने आया हूं। उस फकीर ने कहा: बड़े बेवक्त आए। एक-दो दिन पहले तो खबर करनी थी, तो मैं कुछ व्यवस्था करता कि तुम चोरी करके ले जाते। फकीर का झोपड़ा है। बड़ी दुविधा में तुमने मुझे डाल दिया। तो क्या तुम्हें दूं? हां, अच्छा ही हुआ, सुबह एक आदमी आया था और दस रुपये भेंट कर गया था, वे रखे हैं। लेकिन इतने से पैसे में...तुम इतनी दूर आए अंधेरी रात में और फकीर के झोपड़े पर आए, इसी से पता चलता है कि कितनी मुसीबत में और कितनी जरूरत में होओगे, दस रुपये से काम चल सकेगा? वह चोर तो बहुत घबड़ा गया। उसकी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करे। फकीर उठा उसने अपने आले से दस रुपये निकाले और उस चोर को दिए। और कहा कि अगर तुम्हारी मर्जी हो तो एक रुपया छोड़ जाओ, सुबह-सुबह कभी मुझे जरूरत पड़ जाती है। उस चोर ने एक रुपया छोड़ दिया और वह भागा निकल कर। फकीर चिल्लाया और उसने कहा कि रुको मित्र, दरवाजा तो कम से कम अटका दो और कम से कम मुझे धन्यवाद तो दे जाओ, क्योंकि दस रुपये जो तुमने लिए हैं वे तो कल चुक जाएंगे, लेकिन दिया हुआ धन्यवाद कभी पीछे भी काम पड़ सकता है, तो धन्यवाद देते चले जाओ।
वह चोर किसी तरह धन्यवाद देकर वहां से भागा। पीछे वह पकड़ा गया और मुकदमा चला। और भी बहुत सी चोरियां उसके ऊपर थीं। इस फकीर की चोरी का मामला भी था। इस फकीर को अदालत में बुलाया गया। वह चोर बहुत डरा हुआ था, कि अगर उस फकीर ने पहचान लिया तो उसका पहचानना ही काफी होगा, फिर किसी और प्रमाण की जरूरत न रह जाएगी। वह इतना प्रसिद्ध आदमी था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा उस फकीर को कि आप पहचानते हैं इसे?
उसने कहा: भलीभांति पहचानता हूं, ये मेरे मित्र हैं। और कई बार तो ऐसा हुआ है कि आधी रात भी आ गए हैं। मित्र के घर ही कोई आधी रात को आता है, ऐसे किसके घर कौन जाता है। वह फकीर ने यह कहा, वह चोर तो घबड़ाया हुआ था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा: इसने कभी तुम्हारे यहां चोरी की?
उसने कहा कि नहीं, कभी नहीं। एक बार ये आए थे तो नौ रुपये मैंने इन्हें दिए थे, लेकिन उसके लिए इन्होंने धन्यवाद दे दिया था। बात खतम हो गई, उसका कोई लेना-देना बाकी नहीं रहा। और ये आदमी बहुत भले हैं मैं आपसे कह दूं, क्योंकि मैंने इनसे कहा था एक रुपया छोड़ जाओ, तो ये छोड़ गए थे। और मैंने इनसे कहा, दरवाजा अटका दो, तो इन्होंने दरवाजा अटका दिया था। और मैंने इनसे कहा कि धन्यवाद दे दें, तो यह इतना सीधा आदमी कि इसने मुझे धन्यवाद भी दिया था। कौन कहता है यह चोर है?
यह एक धार्मिक व्यक्ति का अनुभव होता है जीवन के प्रति। उसे चोर दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का चोर मर जाता है। उसे बेईमान दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का बेईमान मर जाता है। उसे हत्यारा दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का हत्यारा मर जाता है। नैतिक व्यक्ति के भीतर खूब घनीभूत हो जाता है हत्यारा, चोर और बेईमान, तो उसे हर एक के भीतर चोर, बेईमान दिखाई पड़ने लगता है।
(सौजन्य से : ओशो न्यूज लेटर)
नीति मार्ग नहीं है --गतांक से आगे
दो व्यक्ति पति और पत्नी जंगल से लौटते थे। वे दोनों बहुत साधु-चरित्र थे, बहुत नैतिक थे। न तो चोरी करते थे, न बेईमानी, न असत्य बोलते थे, न संपत्ति का संग्रह करते थे। लकड़ियां काट लाते थे जंगल से, बेच देते थे, जो मिलता था उसे खा लेते थे। सांझ जो चावल, गेहूं के दाने बच जाते थे उनको बांट देते थे, रात उनके पास कुछ भी नहीं होता था। दूसरे दिन सुबह फिर जंगल जाते और लकड़ी काट लाते। लेकिन एक बार सात दिन तक पानी गिरता रहा, और वे जंगल नहीं जा सके और सात दिन उपवास करना पड़ा। लेकिन उन्होंने किया। उन्होंने पड़ोसियों से मांगा नहीं। पड़ोसियों ने देना भी चाहा, तो वे लेने को राजी न हुए।
सात दिन बाद पानी खुला और वे जंगल गए। वे लकड़ियां काट कर लौटते थे। पति आगे था पत्नी पीछे थी। कमजोर हो गए थे, सात दिन के भूखे थे, परेशान थे। और फिर लकड़ियों को काटने का श्रम और बोझ। पति थोड़ा आगे पत्नी थोड़ी पीछे। पति ने देखा कि राह के किनारे किसी राहगीर की सोने की अशर्फियों से भरी हुई थैली गिर गई है, कुछ अशर्फियां बाहर पड़ी हैं, कुछ थैली के भीतर हैं। उसके मन में हुआ, मैंने तो स्वर्ण को जीत लिया है, मेरे मन में तो स्वर्ण के प्रति कोई कामना और वासना नहीं उठती। लेकिन स्त्री का क्या भरोसा। पुरुषों को आज तक स्त्रियों का भरोसा कभी भी नहीं रहा है। उसको भी नहीं था। इसलिए पुरुषों ने जो धर्म बनाएं हैं उनमें स्त्रियों को मोक्ष जाने की व्यवस्था नहीं की है। उनका कोई भरोसा नहीं है। स्त्रियां शास्त्र बनातीं तो शायद पुरुष का भरोसा उसमें नहीं होता, और पुरुष को स्वर्ग जाने की कोई व्यवस्था नहीं होती। लेकिन चूंकि सभी शास्त्र पुरुषों ने बनाएं हैं इसलिए स्त्रियों को कोई हक स्वर्ग वगैरह, मोक्ष वगैरह जाने का नहीं है।
उसने भी सोचा कि नहीं, यह स्त्री का क्या भरोसा। इसकी नैतिकता का कोई पक्का विश्वास नहीं है। स्त्री ही ठहरी, मन डांवाडोल हो सकता है। तो उसने उस थैली को सरका दिया गड्ढे में और मिट्टी डाल दी। पीछे से तब तक उसकी स्त्री भी आ गई, वह मिट्टी डाल ही रहा था। उसकी स्त्री ने पूछा कि क्या करते हैं? सत्य बोलने का नियम था। नैतिक आदमी था, झूठ बोल सकता नहीं था। तो बड़ी मुश्किल में पड़ गया। बताना पड़ा उसे कि ऐसा-ऐसा हुआ, यहां थैली पड़ी थी अशर्फियों से भरी, मेरे मन में हुआ कि मैंने तो स्वर्ण को जीत लिया लेकिन मेरी स्त्री का मन न डोल जाए। इसलिए मैंने उस स्वर्ण की थैली को गड्ढे में डाल कर मिट्टी से ढंक दिया है।
उसकी स्त्री बोली: मैं बहुत हैरान हूं, तुम्हें अभी स्वर्ण दिखाई पड़ता है? और अभी तुम्हें मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए शर्म नहीं आती? तुम्हें अभी स्वर्ण दिखाई पड़ता है? और मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए शर्म नहीं आती?
यह स्त्री धार्मिक है और वह पुरुष नैतिक है। उसने अपने आचरण को तो ठोंक-पीट कर बदल लिया है, लेकिन उसकी आत्मा में वही सब वासनाएं मौजूद हैं स्वर्ण के प्रति। स्त्री पर तो वह प्रोजेक्ट कर रहा है। उसके भीतर वह मौजूद है। स्त्री का तो बहाना ले रहा है, उस पर ढाल रहा है। लेकिन स्त्री धार्मिक है। वह यह कह रही है कि तुम्हें मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए शर्म नहीं आती। जब आत्मा से कोई परिवर्तन होता है तो सोना छोड़ना नहीं पड़ता, सोना मिट्टी हो जाता है। और जब नैतिक परिवर्तन होता है तो सोना छोड़ना पड़ता है, सोना मिट्टी नहीं होता।
तो चाहे सोने को पकड़ो और चाहे छोड़ो, ये दोनों हालत में कोई बहुत बुनियादी फर्क नहीं है। लेकिन जिस दिन सोना मिट्टी ही हो जाए, उसी दिन कोई फर्क है। और सोना उसी दिन मिट्टी होगा जिस दिन आत्मा का दर्शन हो जाए उसके पहले नहीं। जिसको अपना शरीर ही दिखाई पड़ रहा है उसे सोना मिट्टी कभी नहीं हो सकता। वह चाहे छोड़े और चाहे इकट्ठा करे। जिसने अभी अपने शरीर के पार नहीं देखा है उसे सोना मिट्टी नहीं हो सकता। जो अपने शरीर के पार देखने में समर्थ हो जाता है उसे शरीर मिट्टी हो जाता है। और शरीर मिट्टी हो जाता है इसलिए शरीर की दुनिया का सब कुछ मिट्टी हो जाता है। उसमें सोना भी मिट्टी हो जाता है। तब छोड़ना नहीं पड़ता।
धार्मिक चित्त चीजों को छोड़ता नहीं है। नैतिक चित्त छोड़ता है। और यह बड़े मजे की बात है जिस चीज को आप छोड़ते हैं उससे आप हमेशा कि लिए बंध जाते हैं, उससे कभी मुक्त नहीं होते। छोड़ कर देख लें कोई चीज, उससे आप बंध जाएंगे। क्योंकि छोड़ने का मतलब यह है कि भीतर रस था, जबरदस्ती धक्का दिया और छोड़ दिया, रस मौजूद है। धार्मिक चित्त से चीजें छूटती हैं, छोड़ी नहीं जातीं। जैसे पके पत्ते गिर जाते हैं वृक्ष से, वैसे धार्मिक चित्त से कुछ चीजें गिर जाती हैं, झड़ जाती हैं। उन्हें कोई छोड़ता नहीं है। धार्मिक व्यक्ति असत्य बोलना छोड़ता नहीं है असमर्थ हो जाता है असत्य बोलने में। नैतिक व्यक्ति समर्थ होता है असत्य बोलने में, लेकिन असत्य बोलना छोड़ता है। इससे एक द्वंद्व उसके भीतर पैदा होता है।
---जारी
नीति मार्ग नहीं है।
नीति मार्ग है इस तरह की बातें हजारों साल से प्रचलित हैं। और लोगों को यह भी खयाल है कि नैतिक हुए बिना कोई धार्मिक नहीं हो सकता, नैतिक होगा तब धार्मिक होगा।
मैं आपसे कहना चाहूंगा, नैतिक होने से कोई कभी धार्मिक नहीं होता है। हां, कोई धार्मिक हो जाए तो जरूर नैतिक हो जाता है। इन दो बातों को ठीक से समझ लेना जरूरी होगा।
नीति से धर्म पैदा नहीं होता, धर्म से नीति पैदा होती है। नैतिकता से तो एक तरह का पाखंड पैदा होता है धर्म पैदा नहीं होता। क्योंकि नैतिकता आचरण का परिवर्तन है, आत्मा का परिवर्तन नहीं है। और हमारी आत्मा तो होती है कुछ और आचरण हम बदल लेते हैं कुछ। प्राण तो कहते हैं चोरी करो और बुद्धि कहती है चोरी मत करो। भीतर से तो कोई कहता है कि यह करो, सुनी हुई नैतिकता कहती है यह मत करो। मनुष्य एक द्वंद्व में टूट जाता है। भीतर उठता है कि असत्य बोलो, नैतिकता को ध्यान में रख कर सत्य बोलने की कोशिश करता है।
आप कहेंगे कि क्या यह जरूरी है कि ऐसा होता हो? हां, ऐसा ही होता है। और बिलकुल जरूरी है। नहीं तो सत्य बोलने की कोशिश ही न करनी पड़े। अगर असत्य न उठता हो तो सत्य बोलने की कोशिश का सवाल ही क्या है। अगर भीतर बेईमानी न उठती हो तो ईमानदार होने का सवाल ही क्या है। भीतर चोरी उठती है इसलिए बाहर से हम चोरी से अपने को रोकते हैं। और इस रोकने में क्या होता है, मनुष्य दो हिस्सों में टूट जाता है। भीतर चोर रह जाता है आचरण में अचोर हो जाता है। मनुष्य दो हिस्सों में टूट जाता है। आत्मा तो कमसिद बनी रहती है और आचरण शुद्ध खादी के वस्त्रों जैसा हो जाता है सफेद, धुला हुआ। यह आचरण बड़ा धोखा पैदा करता है। यह दूसरों को तो धोखा देता ही है इससे खुद को भी धोखा पैदा होता है। और यह धोखा पैदा होगा, क्योंकि जीवन का जो वास्तविक परिवर्तन है, आचरण तो परिधि है, केंद्र तो आत्मा है। अगर आत्मा परिवर्तित हो तो आचरण अपने आप बदल जाता है। लेकिन आचरण बदले लें तो आत्मा अपने आप नहीं बदलती। जीवन भर चोरी न करें, तो भी भीतर से चोरी समाप्त नहीं होती। और जीवन भर विनम्र बने रहें तो भी भीतर से अहंकार नहीं जाता है, वह मौजूद होता है भीतर। क्योंकि जीवन के परिवर्तन की जो ठीक विधि है वह यह नहीं है। जीवन के परिवर्तन की ठीक विधि यह है कि पहले आत्मा, केंद्र बदल जाए, तो फिर परिधि अपने आप बदल जाती है। नहीं तो हम किसी न किसी रूप में चीजों से चिपके रहते हैं वहीं के वहीं।
जारी----
(सौजन्य से- आोशो न्यूज लेटर )
मैं आपसे कहना चाहूंगा, नैतिक होने से कोई कभी धार्मिक नहीं होता है। हां, कोई धार्मिक हो जाए तो जरूर नैतिक हो जाता है। इन दो बातों को ठीक से समझ लेना जरूरी होगा।
नीति से धर्म पैदा नहीं होता, धर्म से नीति पैदा होती है। नैतिकता से तो एक तरह का पाखंड पैदा होता है धर्म पैदा नहीं होता। क्योंकि नैतिकता आचरण का परिवर्तन है, आत्मा का परिवर्तन नहीं है। और हमारी आत्मा तो होती है कुछ और आचरण हम बदल लेते हैं कुछ। प्राण तो कहते हैं चोरी करो और बुद्धि कहती है चोरी मत करो। भीतर से तो कोई कहता है कि यह करो, सुनी हुई नैतिकता कहती है यह मत करो। मनुष्य एक द्वंद्व में टूट जाता है। भीतर उठता है कि असत्य बोलो, नैतिकता को ध्यान में रख कर सत्य बोलने की कोशिश करता है।
आप कहेंगे कि क्या यह जरूरी है कि ऐसा होता हो? हां, ऐसा ही होता है। और बिलकुल जरूरी है। नहीं तो सत्य बोलने की कोशिश ही न करनी पड़े। अगर असत्य न उठता हो तो सत्य बोलने की कोशिश का सवाल ही क्या है। अगर भीतर बेईमानी न उठती हो तो ईमानदार होने का सवाल ही क्या है। भीतर चोरी उठती है इसलिए बाहर से हम चोरी से अपने को रोकते हैं। और इस रोकने में क्या होता है, मनुष्य दो हिस्सों में टूट जाता है। भीतर चोर रह जाता है आचरण में अचोर हो जाता है। मनुष्य दो हिस्सों में टूट जाता है। आत्मा तो कमसिद बनी रहती है और आचरण शुद्ध खादी के वस्त्रों जैसा हो जाता है सफेद, धुला हुआ। यह आचरण बड़ा धोखा पैदा करता है। यह दूसरों को तो धोखा देता ही है इससे खुद को भी धोखा पैदा होता है। और यह धोखा पैदा होगा, क्योंकि जीवन का जो वास्तविक परिवर्तन है, आचरण तो परिधि है, केंद्र तो आत्मा है। अगर आत्मा परिवर्तित हो तो आचरण अपने आप बदल जाता है। लेकिन आचरण बदले लें तो आत्मा अपने आप नहीं बदलती। जीवन भर चोरी न करें, तो भी भीतर से चोरी समाप्त नहीं होती। और जीवन भर विनम्र बने रहें तो भी भीतर से अहंकार नहीं जाता है, वह मौजूद होता है भीतर। क्योंकि जीवन के परिवर्तन की जो ठीक विधि है वह यह नहीं है। जीवन के परिवर्तन की ठीक विधि यह है कि पहले आत्मा, केंद्र बदल जाए, तो फिर परिधि अपने आप बदल जाती है। नहीं तो हम किसी न किसी रूप में चीजों से चिपके रहते हैं वहीं के वहीं।
जारी----
(सौजन्य से- आोशो न्यूज लेटर )
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