'मैं' अपरिवर्तनीय है!

सुबह थी, फिर दोपहर आयी, अब सूरज डूबने को है। एक सुंदर सूर्यास्त पश्चिम पर फैल रहा है।
मैं रोज दिन को उगते देखता हूं, दिन को छाते देखता हूं, दिन को डूबते देखता हूं और फिर यह देखता हूं कि न तो मैं उगा, न मैंने दोपहर पायी और न ही मैं अस्त पाता हूं।
कल यात्रा से लौटा तो देख रहा था। सब यात्राओं में ऐसा ही अनुभव होता है। राह बदलती है, पर राही नहीं बदलता है।। यात्रा तो परिवर्तन है, पर यात्री अपरिवर्तित मालूम होता है।
कल कहां था, आज कहां हूं, कभी क्या था, अब क्या है- पर जो मैं कल था, वही आज भी हूं, जो मैं कभी था, वही अब भी हूं।
शरीर वही नहीं है, मन वही नहीं है, पर मैं वही हूं।
दिक् और काल में परिवर्तन है, पर 'मैं' में परिवर्तन नहीं है। सब प्रवाह है, पर 'मैं' प्रवाह का अंग नहीं है। यह उनमें होकर भी उनसे बाहर और उनके अतीत है।
यह नित्य-यात्री, यह चिर नूतन, चिर-परिचित यात्री ही आत्मा है। परिवर्तन के जगत में इस अपरिवर्तित के प्रति जाग जाना ही मुक्ति है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

साधना का साध्य

मैं साधकों को देखता हूं, तो पाता हूं कि वे सब मन को साधने में लगे हैं। मन को साधने से सत्य नहीं मिलता है; विपरीत, वही तो सत्य के अनुभव में अवरोध है। मन को साधना नहीं विसर्जित करना है। मन को छोड़ो तब द्वार मिलता है। धर्म मन में या मन से उपलब्ध नहीं होता है। वह अ-मन की स्थिति में उपलब्ध होता है।
मात्सु साधना में था। वह अपने गुरु-आश्रम के एक एकांत झोपड़े में रहता और अहर्निश मन को साधने का अभ्यास करता। जो उससे मिलने भी जाते, उनकी ओर भी वह कभी कोई ध्यान नहीं देता था।
उसका गुरु एक दिन उसके झोपड़े पर गया। मात्सु ने उसकी ओर भी कोई ध्यान नहीं दिया। पर उसका गुरु दिन भर वहीं बैठा रहा और एक ईट पत्थर पर घिसता रहा। मात्सु से अंतत: नहीं रहा गया और उसने पूछा, आप क्या कर रहे हैं? गुरु ने कहा, 'इस ईट का दर्पण बनाना है।' मात्सु ने कहा- ईट का दर्पण! पागल हुए हैं- जीवन भर घिसने पर भी नहीं बनेगी। यह सुन गुरु हंसने लगा और उसने मात्सु से पूछा, 'तब तुम क्या कर रहे हो? ईट दर्पण नहीं बनेगी, तो क्या मन दर्पण बन सकता है? ईट भी दर्पण नहीं बनेगी, मन भी दर्पण नहीं बनेगा। मन ही तो धूल है, जिसने दर्पण को ढंका है। उसे छोड़ो और अलग करो, तब सत्य उपलब्ध होता है।'
विचार संग्रह मन है और विचार बाहर से आये धूलिकण हैं। उन्हें अलग करना है। उनके हटने पर जो शेष रह जाता है, वह निर्दोष चैतन्य सदा से ही निर्दोष है। निर्विचार में, इस अ-मन की स्थिति में, उस सनातन सत्य के दर्शन होते हैं, जो कि विचारों के धुएं में छिप गया होता है।
विचारों का धुआं न हो तो फिर चेतना की निर्धूम ज्योति-शिखा ही शेष रह जाती है। वही पाना है, वही होना है। साधना का साध्य वही है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शून्यता में ही सागर उतर कर पूर्ण करता है!

मैं मनुष्य को इतना भरा हुआ देखता हूं कि उन पर मुझे बहुत दया आती है। उनमें किंचित भी अवकाश नहीं है, थोड़ा सा भी आकाश नहीं है। जिसमें आकाश नहीं है, वह मुक्त कैसे हो सकता है? मुक्ति के लिए बाहर नहीं, भीतर आकाश चाहिए। जिसमें भीतर आकाश होता है, वह बाहर के आकाश से एक हो जाता है और अंतस आकाश जब विश्व के आकाश से एक होता है- वह सम्मिलन, वह संगम, वह संपरिवर्तन ही मुक्ति है। वही ईश्वरानुभव है।
इसलिए मैं ईश्वर से किसी को भरने को नहीं कहता हूं- वरन सबसे कहता हूं कि अपने को खाली कर लो और तुम पाओगे कि ईश्वर ने तुम्हें भर दिया है।
वर्षा में जब बदलियां पानी गिराती हैं, तो टीले जल से वंचित ही रह जाते हैं और गड्ढे परिपूरित हो जाते हैं। गड्ढों की तरह बनो, टीलों की तरह नहीं। अपने के भरो मत, खाली करो ओर प्रभु की वर्षा तो प्रतिक्षण हो रही है- जो उस जल को अपने में लेने को खाली है, वह भर दिया जाता है।
गागर का मूल्य यही है कि वह खाली है; वह जितनी खाली होती है, सागर उसे उतना ही भर देता है।
मनुष्य का मूल्य भी उतना ही है, जितना कि वह शून्य है, उस शून्यता में ही सागर उतरता है और उसे पूर्ण करता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

द्वंद्व में नहीं, द्वंद्व को देखने वाले 'ज्ञान' में स्थिर हों!

एक यात्रा से लौटा हूं। जहां गया था, वहां बहुत से साधु-साध्वियों से मिलना हुआ। साधना तो बिलकुल नहीं है और साधु बहुत हैं। सब तरफ कागज ही कागज के फूल दिखाई देते हैं।
साधना के अभाव में धर्म असंभव है। फिर, धर्म के नाम से जो चलता है, उससे अधर्म का ही पोषण होते है। धर्म ऊपर और अधर्म भीतर होता है। यह स्वाभाविक ही है। जिन पौधों में जड़े नहीं हैं, वे ऊपर से खोंसे हुए ही होंगे। किसी उत्सव में उनसे शोभा बन सकती है, पर उन पौधों में फूल और फल तो नहीं लग सकते हैं।
धर्म की जड़े साधना में हैं, योग में हैं। योग के अभाव में साधु का जीवन या तो मात्र अभिनय हो सकता है या फिर दमन हो सकता है। दोनो ही बातें शुभ नहीं हैं। सदाचरण का मिथ्या अभिनय पाखण्ड है और दमन भी घातक है। उसमें संघर्ष तो है, पर उपलब्धि कोई नहीं। जिसे दबाया है, वह मरता नहीं, वरन और गहरी परतों पर सरक जाता है।
एक और वासना की पीड़ाएं हैं, उनकी ज्वालाओं में उत्तप्त और ज्वरग्रस्त जीवन है, तृष्णा की दुष्पूर दौड़ दुख है। दूसरी ओर दमन और आत्म-उत्पीड़न की अग्निशिखाएं हैं। एक ओर कुएं से जो बचता है, वह दूसरी ओर की खाई में गिर जाता है।
योग न भोग है, न दमन है। वह तो दोनों से जागरण है। अतियों के द्वंद्व में से किसी को भी नहीं पकड़ना है। द्वंद्व का कोई भी पक्ष द्वंद्व से बाहर नहीं ले जा सकता है। उनके बाहर जाना, उनमें से किसी को भी चुनकर नही हो सकता है। जो उनमें से किसी को भी चुनता और पकड़ता है, वह उनके द्वारा ही चुना और पकड़ लिया जाता है।
योग किसी को पकड़ना नहीं है, वरन समस्त पकड़ को छोड़ना है। किसी के पक्ष में किसी को नहीं छोड़ना है। बस बिना किसी पक्ष के, निष्पक्ष ही सब पकड़ छोड़ देनी है। पकड़ ही भूल है। वही कुएं में या खाई में गिरा देती है। वही अतियों में और द्वंद्वों में और संघर्षो में ले जाती है। जबकि मार्ग वहां है, जहां कोई अति नहीं है, जहां कोई दुई नहीं है, जहां कोई संघर्ष नहीं है। चुनाव न करें, वरन चुनाव करने वाली चेतना में प्रतिष्ठित हों। द्वंद्व में न पड़ें, वरन द्वंद्व को देखने वाले 'ज्ञान' में स्थिर हों। उसमें प्रतिष्ठा ही प्रज्ञा है और वह प्रज्ञा ही प्रकाश में जाने का द्वार है। वह द्वार निकट है।
जो अपनी चेतना की लौ को द्वंद्वों की आंधियों से मुक्त कर लेता हैं, वे उस कुंजी को पा लेते हैं, जिससे सत्य का वह द्वार खुलता है।
( सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जीवन की मृत्यु नहीं और मृत का जीवन नहीं

एक बार ऐसा हुआ कि किसी साधु का शिष्य मर गया था। वह साधु उस शिष्य के घर गया। उसके शिष्य की लाश रखी थी और लोग रोते थे। उस साधु ने जाकर जोर से पूछा, 'यह मनुष्य मृत है या जीवित?' इस प्रश्न से लोग बहुत चौंके और हैरान हुए। यह कैसा प्रश्न था! लाश सामने थी और इसमें पूछने की बात ही क्या थी?थोड़ी देर सन्नाटा रहा और फिर किसी ने साधु से प्रश्न किया, 'आप ही बतावें?' जानते हैं कि साधु ने क्या कहा? साधु ने कहा, 'जो मृत था, वह मृत है; जो जीवित था, वह अभी भी जीवित है। केवल दोनों का संबंध टूटा है।'जीवन की कोई मृत्यु नहीं होती है और मृत का कोई जीवन नहीं होता है।जीवन को जो नहीं जानते हैं, वे मृत्यु को जीवन का अंत कहते हैं। जन्म जीवन का प्रारंभ नहीं है और मृत्यु उसका अंत नहीं है। जीवन, जन्म और मृत्यु के भीतर भी है और बाहर भी है। वह जन्म के पूर्व भी है और मृत्यु के पश्चात भी है। उसमें ही जन्म है, उसमें ही मृत्यु है; पर न उसका कोई जन्म है, न उसकी कोई मृत्यु है।एक शवयात्रा से लौटा हूं। वहां चिता से लपटें उठीं, तो लोग बोले, 'सब समाप्त हो गया।' मैंने कहा, 'आंखें नहीं हैं, ऐसा इसलिए लगता है।'
( सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रेम-मृत्यु ही जीवन है!


सुबह घूमकर लौटा था। नदी तट पर एक छोटे से झरने से मिलना हुआ। राह के सूखे पत्तों को हटाकर वह झरना नदी की ओर भाग रहा था। उसकी दौड़ देखी और फिर नदी में उसका आनंदपूर्ण मिलन भी देखा। फिर देखा कि नदी भी भाग रही है।
और फिर देखा कि सब कुछ भाग रहा है। सागर से मिलने के लिए, असीम में खोने के लिए। पूर्ण को पाने के लिए समस्त जीवन ही- राह के सूखे-मृत पत्तों को हटाता हुआ-भागा जा रहा है।
बूंद सागर होना चाहती है। यही सूत्र समस्त जीवन का ध्येय-सूत्र है। उसके आधार पर ही सारी गति है और उसकी पूर्णता में ही आनंद है। सीमा दुख है, अपूर्णता दुख है। जीवन सीमा के, अपूर्णता के समस्त अवरोधों के पार उठना चाहता है। उनके कारण उसे मृत्यु झेलनी पड़ती है। उसके अभाव में वह अमृत है। उनके कारण वह खण्ड है, उनके अभाव में वह अखण्ड हो जाता है।
पर मनुष्य अहं की बूंद पर रुक जाता है और वहीं वह जीवन के अनंत प्रवाह में खण्डित हो जाता है। इस भांति वह अपने ही हाथों सूरज को खोकर एक क्षीणकाय दीये की लौ में तृप्ति को खोजने का निरर्थक प्रयास करता है। उसे तृप्ति नहीं मिल सकती है, क्योंकि बूंद, बूंद बनी रहकर कैसे तृप्त हो सकती है? सागर हुए बिना कोई राह नहीं है। सागर ही गंतव्य है। सागर होना ही होगा। बूंद को खोना जरूरी है। अहं को मिटाना जरूरी है। अहं ब्रह्मं बने, तभी संतृप्ति संभव है।
सागर होने की संतृप्ति ही सत्य में प्रतिष्ठित करती है और वह संतृप्ति ही मुक्त करती है। क्योंकि जो संतृप्त नहीं है, वह मुक्त कैसे हो सकती है!
जीसस क्राइस्ट ने कहा है, 'जो जीवन को बचाता है, वह उसे खो देता है और जो उसे खो देता है, वह उसे पा जाता है।'
यही मुझे भी कहने दें। यही प्रेम है। अपने को खो देना ही प्रेम है। प्रेम का मृत्यु को अंगीकार करना ही, प्रभु के जीवन को पाने का उपाय है।
तभी तो मैं कहता हूं, 'बूंदो! सागर की ओर चलो। सागर ही गंतव्य है। प्रेम की मृत्यु को वरण करो, क्योंकि वही जीवन है। जो सागर के पहले ठहर जाता है, वह मर जाता है और जो सागर में पहुंच जाता है, वह मृत्यु के पार पहुंच जाता है।'
( सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शून्य होना ही एकमात्र पुरुषार्थ है!

संध्या बीती है, कुछ लोग आये हैं। वे कहते हैं,'आप शून्य सिखाते हैं। पर शून्य के तो विचार से ही भय लगता है। क्या कोई और सहारा व आधार नहीं हो सकता है?'
मैं उनसे कहता हूं कि शून्य में कूदने में अवश्य साहस की जरूरत है। पर जो कूद जाते हैं, वे शून्य को नहीं, पूर्ण को पाते हैं और जो कोई कल्पित सहारा और आधार पकड़ते रहते हैं, वे शून्य में ही अटके रहते हैं। कल्पनाओं के सहारे और आधार भी क्या कोई सहारे और आधार होते हैं!
सत्य का सहारा और आधार केवल शून्य से ही मिलता है। शून्य होने का अर्थ- कल्पनाओं के सहारों और आधारों से ही शून्य होना है।
एक कहानी उनसे कहता हूं - एक अमावस की अंधेरी रात्रि में, पर्वतीय निर्जन से गुजरते अजनबी यात्री ने पाया कि वह किसी खड्ड में गिर गया है। उसके पैर चट्टान से फिसल गये हैं और एक झाड़ी को पकड़ कर लटक गया है। चारों और अंधकार है। नीचे भी भयंकर अंधकार और खड्ड है। घंटों वह उस झाड़ी को पकड़ लटका रहा और इस समय में संभाव्य मृत्यु की बहुत पीड़ा सही। सर्दी की रात्रि थी। फिर क्रमश: उसके हाथ ठंडे और जड़ हो गये। अंतत: उसके हाथों ने जवाब दे दिया। उसे उस भयंकर खड्ड में गिरना ही पड़ा। उसकी कोई चेष्टा सफल नहीं हो सकी और अपनी आंखों से स्वयं को मृत्यु के मुंह में जाते देखा। वह गिरा, पर गिरा नहीं। वहां खड्ड था ही नहीं। गिरते ही उसने पाया कि वह जमीन पर खड़ा है।
ऐसे ही मैंने भी पाया है। शून्य में गिरकर पाया कि शून्य ही भूमि है। चित्त के सब आधार जो छोड़ देता है, वह प्रभु का आधार पा जाता है। शून्य होने का पुरुषार्थ ही एकमात्र पुरुषार्थ है और जो शून्य होने की शक्ति नहीं जुटा पाता है, वे 'शून्य' ही बने रह जाते हैं।
( सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)