आनंद और दुख


सुबह एक पत्र मिला है। किसी ने उसमें पूछा है कि जीवन दुख में घिरा है, फिर भी आप आनंद की बात कैसे करते हैं? जो है, उसे देखें तो आनंद की बात कल्पना प्रतीत होती है।
निश्चय ही जीवन दुख में घिरा है, चारों ओर दुख है; पर जो घिरा है, वह दुख नहीं है। जब तक जो घेरे है, उसे देखते रहेंगे, दुख ही मालूम होगा; पर जिस क्षण उसे देखने लगेंगे, जो घिरा है, तो उसी क्षण दुख असत्य हो जाता है।
कुल-दृष्टिं परिवर्तन की बात है। जो दृष्टिं दृष्टा को प्रकट कर देती है, वही दृष्टिं है। शेष सब अंधापन है। दृष्टा के प्रकट होते ही सब आनंद हो जाता है, क्योंकि आनंद उसका स्वरूप है। जगत फिर भी रहता है, पर दूसरा हो जाता है। आत्म-अज्ञान के कारण उसमें जो कांटे मालूम हुए थे, वे अब कांटे नहीं मालूम होते हैं।
दुख की सत्ता वास्तविक नहीं है, क्योंकि परावर्ती अनुभव से वह खंडित हो जाती है। जागने पर जैसे स्वप्न अवास्तविक हो जाता है, वैसे ही स्व-बोध पर दुख खो जाता है।
आनंद सत्य है, क्योंकि वह स्व है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ज्ञान और शील

जीवन साधना में बीज क्या है और फल क्या है, यह जानना अत्यंत अनिवार्य है। प्रारंभ और परिणाम को पहचानना अनिवार्य है। कार्य और कारण को न जाने हुए जो चलता है, वह भूल करता है। केवल चलना ही पर्याप्त नहीं है। अकेले चलने से ही कोई नहीं पहुंचता है। दिशा और साधना-विधि का सम्यक होना जरूरी है।
साधना में केंद्रीय भी कुछ है, परिधिगत भी है। केंद्र पर प्रयास हो तो परिधि अपने से संभल जाती है। उसे पृथक संभालने का कारण नहीं है। वह केंद्र की ही अभिव्यक्ति है, वह फैल हुआ केंद्र है। इससे परिधि पर प्रयास व्यर्थ होते हैं। एक कहावत है- झाड़ी के आसपास पीटना! परिधि पर उलझना ऐसा ही है।
क्या है केंद्र, क्या है परिधि?
ज्ञान केंद्र है, शील परिधि है। ज्ञान प्रारंभ है, शील परिणाम है। ज्ञान बीज है, शील फल है। पर साधारणत: लोग का चलना विपरीत है। शील से चलकर वे ज्ञान पर पहुंचना चाहते हैं। शील को वे ज्ञान में परिणित करना चाहते हैं।
पर शील अज्ञान से पैदा नहीं किया जा सकता। शील पैदा ही नहीं किया जा सकता। पैदा किया हुआ शील, शील नहीं है। वह मिथ्या आवरण है, जिसके तले कुशील दब जाता है। चेष्टिंत शील वंचना है।
अंधेरे को दबाना-छिपाना नहीं है। उसे मिटाना है। कुशील पर शील के कागजी फूल नहीं चिपकाने हैं। उसे मिटाना है। जब वह नहीं है, तब जो आता है, वह शील है।
अज्ञान से जबरदस्ती लाया गया शील घातक है, क्योंकि उसमें जो नहीं है, वह ज्ञात होता है कि है। इस भांति जिसे लाना है, उसका आंख से ओझल हो जाना हो जाता है।
अज्ञान में सीधे शील लाने का कोई उपाय भी नहीं है, क्योंकि अज्ञान की अभिव्यक्ति ही कुशील है। कुशीलता अज्ञान ही है। बुद्ध ने कहा है, 'अण्णाणी किं काही?' जो अज्ञान में है, वह क्या कर सकता है?
शील नहीं, ज्ञान लाना है। ज्ञान ही शील बन जाता है।
ज्ञान सर्व को प्रकाशित करता है। उसके उदय से ही अज्ञान और मोह का नाश होता है। उससे ही राग और द्वेष का क्षय होता है। उससे ही मुक्ति दशा उपलब्ध होती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जीवन एक बांसुरी

रात्रि के इस सन्नाटे में कोई बांसुरी बजा रहा है। चांदनी जम गयी-सी लगती है। सर्द एकांत रात्रि और दूर से आते बांसुरी के स्वर। स्वप्न सा मधुर! विश्वास न हो, इतना सुंदर है, यह सब।
एक बांस की पोंगरी कितना अमृत बरसा सकती है!
जीवन भी बांसुरी की भांति है। अपने में खाली और शून्य, पर साथ ही संगीत की अपरिसीम साम‌र्थ्य भी उसमें है।
पर सब कुछ बजाने वाले पर निर्भर है। जीवन वैसा ही हो जाता है, जैसा व्यक्ति उसे बनाता है। वह अपना ही निर्माण है। यह तो एक अवसर मात्र है- कैसा गीत कोई गाना चाहता है, यह पूरी तरह उसके हाथों में है। मनुष्य की महिमा यही है कि वह स्वर्ग और नर्क दोनों के गीत गाने को स्वतंत्र है।
प्रत्येक व्यक्ति दिव्य स्वर अपनी बांसुरी से उठा सकता है। बस थोड़ी सी उंगलियां भर साधने की बात है। थोड़ी सी साधना और विराट उपलब्धि है। न-कुछ करने से ही अनंत आनंद का साम्राज्य मिल जाता है।
मैं चाहता हूं कि एक-एक हृदय में कह दूं कि अपनी बांसुरी को उठा लो। समय भागा जा रहा है, देखना कहीं गीत गाने का अवसर बीत न जाए! इसके पहले कि परदा गिरे, तुम्हें अपना जीवन-गीत गा लेना चाहिए।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मन और शांति


''मनुष्य का मन अद्भुत है। वही है, रहस्य संसार का और मोक्ष का। पाप और पुण्य, बंधन और मुक्ति, स्वर्ग और नर्क सब उसमें ही समाया हुए हैं। अंधेरा और प्रकाश सब उसी का है। उसमें ही जन्म है, उसमें ही मृत्यु है। वही है द्वार बाह्य जगत का, वही है सीढ़ी अंतस की। उसका ही न हो जाना दोनों के पार हो जाना हो जाता है।
मन सब कुछ है। सब उसकी लीला और कल्पना है। वह खो जाए, तो सब लीला विलीन हो जाती है।''
कल यही कहा था। कोई पूछने आया, 'मन तो बड़ा चंचल है, वह खोये कैसे? मन तो बड़ा गंदा है, वह निर्मल कैसे हो?'
मैंने फिर एक कहानी कही : बुद्ध जब वृद्ध हो गये थे, तब एक दोपहर एक वन में एक वृक्ष तले विश्राम को रुके थे। उन्हें प्यास लगी तो आनंद पास की पहाड़ी झरने पर पानी लेने गया था। पर झरने से अभी-अभी गाड़ियां निकली थी और उसका सब पानी गंदा हो गया था। कीचड़ ही कीचड़ और सड़े पत्ते उसमें उभर कर आ गये थे। आनंद उसका पानी बिना लिए लौट आया। उसने बुद्ध से कहा, 'झरने का पानी निर्मल नहीं है, मैं पीछे लौट कर नदी से पानी ले आता हूं।' नदी बहुत दूर थी। बुद्ध ने उसे झरने का पानी ही लाने को वापस लौटा दिया। आनंद थोड़ी देर में फिर खाली लौट आया। पानी उसे लाने जैसा नहीं लगा। पर बुद्ध ने उसे इस बार भी वापस लौटा दिया। तीसरी बार आनंद जब झरने पर पहुंचा, तो देखकर चकित हो गया। झरना अब बिलकुल निर्मल और शांत हो गया था, कीचड़ बैठ गयी थी और जल बिलकुल निर्मल हो गया था।
यह कहानी मुझे बड़ी प्रीतिकर है। यही स्थिति मन की भी है। जीवन की गाड़ियां उसे विक्षुब्ध कर जाती हैं। पर कोई यदि शांति और धीरज से उसे बैठा देखता है रहे, तो कीचड़ अपने से नीचे बैठ जाती है और सहज निर्मलता का आगमन हो जाता है। केवल धीरज की बात है और शांति प्रतीक्षा की और 'बिना कुछ किये' मन की कीचड़ बैठ सकती है।
केवल साक्षी होना है और मन निर्मल हो जाता है। मन को निर्मल करना नहीं होता है। करने से ही कठिनाई बन जाती है। उसे तो केवल किनारे पर बैठ कर देखें और फिर देखें कि क्या होता है!
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रेम और प्रतीक्षा


मैं माली को बीज बोते देखता हूं। फिर, वह खाद देता है। पानी देता है और फूलों के आने की प्रतीक्षा करता है। फूल खींचकर जबरदस्ती पौधों में नहीं निकाले जाते हैं। उनकी तो धीरज से प्रतीक्षा करनी होती है।
प्रेम और प्रतीक्षा।
ऐसे ही प्रभु के बीज भी बोने होते हैं। ऐसे ही दिव्य जीवन के फूलों को खिलने की भी राह देखनी होती है।
प्रार्थना और प्रतीक्षा।
जो इसके विपरीत चलता है और अधैर्य प्रकट करता है, वह कहीं भी नहीं पहुंच पाता है। अधैर्य उस विकास के लिए अच्छी खाद नहीं है।
शांति से, धैर्य से और प्रीति से प्रतीक्षा करने पर किसी सुबह अनायास ही फूल खिल जाते हैं, और उनकी गंध जीवन के आंगन को सुवासित कर देती है।
अनंत के फूलों के लिए अनंत प्रतीक्षा अपेक्षित है। पर यह स्मरण रहे कि जो उतनी प्रतीक्षा के लिए तत्पर होता है, उसकी प्राप्ति का समय तत्क्षण आ जाता है। अनंत धैर्य ही अनंत पाने की एक मात्र शर्त है। उस शर्त के पूरा होते ही वह उपलब्ध हो जाता है। उसे कहीं बाहर से थोड़ा ही आना है। वह तो भीतर का ही विकास है। वह तो मौजूद ही है। पर अधैर्य और अशांति के कारण हम उसे नहीं देख पाते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

समाधि

समाधि क्या है?
किसी ने कहा है : बूंद का सागर में मिल जाना।
किसी ने कहा : सागर का बूंद में उतर जाना।
मैं कहता हूं : बूंद और सागर का मिट जाना। जहां न बूंद है, न सागर है, वहां समाधि है। जहां न एक है, न अनेक है, वहां समाधि है। जहां न सीमा है, न असीम है, वहां समाधि है।
समाधि सत्ता के साथ ऐक्य है।
समाधि सत्य है। समाधि चैतन्य है। समाधि शांति है।
'मैं' समाधि में नहीं होता हूं, वरन जब 'मैं' नहीं होता हूं, तब जो है, वह समाधि है।
शायद, यह 'मैं' जो कि मैं नहीं है, वास्तविक 'मैं' है।
'मैं' की दो सत्ताएं हैं : अहं और ब्रह्मं। अहं वह है, जो मैं नहीं हूं, पर जो 'मैं' जैसा भासता है। ब्रह्मं वह है, जो मैं हूं, लेकिन जो 'मैं' जैसा प्रतीत नहीं होता है।
चेतना, शुद्ध चैतन्य ब्रह्मं है।
मैं शुद्ध शाक्षि चैतन्य हूं; पर विचार-प्रवाह से तादात्म्य के कारण वह दिखाई नहीं पड़ता है। विचार स्वयं चेतना नहीं है। विचार को जो जानता है, वह चैतन्य है। विचार विषय है, चेतना विषयी है। विषय से विषयी का तादात्म्य मूच्र्छा है। यही समाधि है। यही प्रसुप्त अवस्था है।
विचार विषय के अभाव में जो शेष है, वही चेतना है। इस शेष में ही होना समाधि है।
विचार-शून्यता में जागरण सतता के द्वार खोल देता है। सत्ता अर्थात वही 'जो है'।
उसमें जागो- यही समस्त जाग्रत पुरुषों की वाणी का सागर है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ज्ञान


ज्ञान और 'ज्ञान' में भेद है। एक ज्ञान है- केवल जानना, जानकारी, बौद्धिक समझ। दूसरा ज्ञान है- अनुभूति, प्रज्ञा, जीवंत प्रतीति। एक मृत तथ्यों का संग्रह है, एक जीवित सत्य का बोध है। दोनों में बहुत अंतर है- भूमि और आकाश का, अंधकार और प्रकाश का। वस्तुत: बौद्धिक ज्ञान कोई ज्ञान नहीं है। वह ज्ञान का भ्रम है। क्या नेत्रहीन व्यक्ति को प्रकाश का कोई ज्ञान हो सकता है? बौद्धिक ज्ञान वैसा ही ज्ञान है।
ऐसे ज्ञान का भ्रम अज्ञान को ढक लेता है। वह आवरण मात्र है। उसके शब्दजाल और विचारों के धुएं में अज्ञान विस्मृत हो जाता है। यह अज्ञान से भी घातक है; क्योंकि अज्ञान दिखता हो, तो उससे ऊपर उठने की आकांक्षा पैदा होती है। पर वह न दिखे तो उससे ऊपर मुक्त होना संभव ही नहीं रह जाता है।
तथाकथित ज्ञानी अज्ञान में ही नष्ट हो जाते हैं।
सत्य-ज्ञान बाहर से नहीं आता है और जो बाहर से आये, जानना कि वह ज्ञान नहीं है, मात्र जानकारी ही है। ऐसे ज्ञान के भ्रम में गिरने से सावधानी रखनी आवश्यक है।
जो भी बाहर से आता है, वह स्वयं पर और परदा बन जाता है।
ज्ञान भीतर से जागता है। वह आता नहीं, जागता है और उसके लिए परदे बनाने नहीं तोड़ने होते हैं।
ज्ञान को सीखना नहीं होता है, उसे उघाड़ना होता है। सीखा हुआ ज्ञान जानकारी है, उघड़ा हुआ ज्ञान अनुभूति है।
जिस ज्ञान को सीखा जाता है, उसके आगमन से ही आचरण सहज उसके अनुकूल हो जाता है। सत्य-ज्ञान के विपरीत जीवन का होना एक असंभावना है। वैसा आज तक धरा पर कभी नहीं हुआ है।
एक कथा स्मरण आती है। एक घने वन के बीहड़ पथ पर दो मुनि थे। शरीर की दृष्टिं से वे पिता पुत्र थे। पुत्र आगे था, पिता पीछे। मार्ग था एकदम निर्जन और भयानक। अचानक सिंह का गर्जन हुआ। पिता ने पुत्र से कहा, 'तुम पीछे आ जाओ, खतरा है।' पुत्र हंसने लगा; आगे चलता था- आगे चलता रहा। पिता ने दोबारा कहा। सिंह सामने आ गया था। मृत्यु द्वार पर खड़ी थी। पुत्र बोला, 'मैं शरीर नहीं हूं, तो खतरा कहां है? आप भी तो यही कहते हैं, न?' पिता ने भागते हुए चिल्ला कर कहा, 'पागल सिंह की राह छोड़ दे।' पर पुत्र हंसता ही रहा और बढ़ता ही रहा। सिंह का हमला भी हो गया। वह गिर पड़ा था, पर उसे दिख रहा था कि जो गिरा है, वह 'मैं' नहीं हूं। शरीर वह नहीं था, इसलिए उसकी कोई मृत्यु भी नहीं थी। जो पिता कहता था, वह उसे दिख भी रहा था। वह अंतर महान है। पिता दुखी था और दूर खड़े उसकी आंखों में आंसू थे और पुत्र स्वयं मात्र दृष्टा ही रह गया था। वह जीवन दृष्टा था, तो मृत्यु में भी दृष्टा था। उसे न दुख था, न पीड़ा। वह अविचल और निर्विकार था, क्योंकि जो भी हो रहा था, वह उसके बाहर हो रहा था। वह स्वयं कहीं भी उसमें सम्मिलित नहीं था। इसलिए कहता हूं ज्ञान और ज्ञान में भेद है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)