मुक्ति के लिए स्वयं को खोना होगा

कल रात्रि नगर से दूर एक अमराई में बैठा था। थोड़ी सी बदलियां थीं और उनके बीच चांद निकलता-छिपता जा रहा था। प्रकाश और छाया की इस लीला में कुछ लोग देर तक मौन मेरे पास थे।
कभी- कभी बोलना कितना कठिन हो जाता है। वातावरण में जब एक संगीत घेरे होता है, तब डर लगता है कि कहीं बोलने से वह टूट न जाए। ऐसा ही कल रात हुआ। बहुत रात गये घर लौटे। राह में कोई कह रहा था कि जीवन में मौन का अनुभव पहली बार हुआ है। यह सुना था कि मौन अद्भुत आनंद है, पर जाना इसे आज है। पर आज तो यह अनायास हुआ है, फिर दुबारा यह कैसे होगा?
मैंने कहा, 'जो अनायास हुआ है, वह अनायास ही होता है। प्रयास से वह नहीं आता है।' प्रयास स्वयं अशांति है। प्रयास का अर्थ है कि जो है, उससे कुछ भिन्न चाहा जा रहा है। यह स्थिति तनाव की है। तनाव में तनाव ही पैदा होता है। अशांति में किया गया कुछ भी, अशांति ही लाता है। अशांति शांति में नहीं बदलती है। शांति चेतना की एक भिन्न स्थिति है। जब अशांति नहीं होती है, तब उसका होना होता है।
कुछ न करें, कोई प्रयास न करें, सब करना छोड़ दें और केवल देखते रह जायें। और फिर पाया जाता है कि एक नयी चेतना, एक नया प्रकाश आहिस्ता-आहिस्ता उतरता चला आ रहा है। इस नये लोक में जो पाया जाता है, वही वस्तुत: है। जो है, उसका उद्घाटन आनंद है, उसका उद्घाटन मुक्ति है। यह विराट हमारे क्षुद्र प्रयासों से नहीं, हमारे 'मैं' से नहीं, वरन् जब प्रयास नहीं होते, जब 'मैं' नहीं होता, तब आता है।
संसार में जो भी पाया जाता है, वह क्रिया से, कर्म से पाया जाता है। प्रयास वहां साधन है। 'मैं' वहां केंद्र है। प्रत्येक प्राप्ति इसलिए 'मैं' को मजबूत कर जाती है। वस्तुत: पाने में 'मैं' को मजबूत करने और फैलाने का ही सुख है। पर यह 'मैं' कभी पूरा नहीं भरता है। यह स्वभाव से दुष्पूर है। इसलिए सुख प्रतीत ही होता है, कभी उसे पाया नहीं जाता है। इससे जिन्होंने जाना, उन्होंने कहा कि संसार में दुख है। संसार में हम जो करते हैं, वही हम मुक्ति के लिये भी करते हैं। उसे भी पाने में लग जाते हैं और यहीं भूल हो जाती है। उसे पाना नहीं, वरन् अपने को खोना है। अपने को खोते ही, उसे पा लिया जाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ईश्वर की खोज

कल रात्रि नदि के तट पर था। नदी की धार चांदी के फीते की भांति दूर तक चमकती चली गयी थी। एक मछुआ डोंगी को खेता हुआ आया था और देर से बोलते हुए जल-पक्षी उसकी आवाज से चुप हो गये थे।एक मित्र साथ थे। उन्होंने एक भजन गाया था और फिर बात ईश्वर पर चली गयी थी। गीत में भी ईश्वर की खोज की बात थी। जिन्होंने इसे गया था, उनके जीवन के अनेक वर्ष ईश्वर की तलाश में ही बीते हैं। मेरा परिचय उन से कल ही हुआ था। विज्ञान के स्नातक हैं और फिर किसी दिन ईश्वर की धुन ने उन्हें पकड़ लिया था। तब से अनेक वर्ष इसी धुन में गये हैं, पर कुछ उपलब्ध नहीं हुआ है।मैं भजन सुनकर चुप था। उनकी आवाज मधुर थी और मन को छूती थी। फिर भजन के पीछे हृदय था और उस कारण गीत जीवित हो उठा था। मेरे मन में उसकी प्रतिध्वनि गूंज रही थी, पर उन्होंने इस मौन को तोड़कर अनायास पूछा था, 'यह ईश्वर की तलाश कहीं भ्रम तो नहीं है? पहले में आशा से भरा था, पर फिर धीरे-धीरे निराश होता गया हूं।' मैं फिर थोड़ी देर चुप रहा और बाद में कहा, 'ईश्वर की तलाश भ्रम ही है, क्योंकि ईश्वर खोजने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह सदा ही उपस्थित है। पर हमारे पास, उसे देख सके, ऐसी आंखें नहीं हैं, इसलिए असली खोज सम्यक-दृष्टिं को पाने की है।'एक अंधा आदमी था। वह सूरज को खोजना चाहता था। वह खोज गलत थी। सूरज तो है ही, आंखें खोजनी है। आंखें पाते ही सूरज मिल जाता है। साधरणत: ईश्वर का तलाशी, सीधे ईश्वर को खोजने में लग जाता है। वह अपनी आंखों का विचार ही नहीं करता है। यह आधारभूत भूल परिणाम में निराशा लाती है। मेरा देखना विपरीत है।मैं देखता हूं कि असली प्रश्न मेरा है और मेरे परिवर्तन का है। मैं जैसा हूं, मेरी आंखें जैसी हैं, वही मेरे ज्ञान की और दर्शन की सीमा है। मैं बदलूं, मेरी आंखें बदलें, मेरी चेतना बदले, तो जो भी अदृश्य है, वह दृश्य हो जाता है। और फिर जो अभी हम देख रहे हैं, उसकी ही गहराई में ईश्वर उपलब्ध हो जाता है। संसार में ही प्रभु उपलब्ध हो जाता है। इसलिए मैं कहता हूं : धर्म ईश्वर को पाने का नहीं, वरन् नई दृष्टिं, नई चेतना पाने का विज्ञान है। प्रभु तो है ही, हम उसमें ही खड़े हैं, उसमें ही जी रहे हैं। पर आंखें नहीं हैं, इसलिए सूरज दिखाई नहीं देता है। सूरज को नहीं, आंखों को खोजना है। (सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

नास्तिक होना, अधार्मिक होना नहीं!


एक युवक ने आकर कहा है, 'मैं नास्तिक हो गया हूं।'
मैं उसे देखता हूं। उसे पहले से जानता हूं। जीवन-सत्य को जानने की उसकी प्यास तीव्र है। वह किसी भी मूल्य पर सत्य को अनुभव करना चाहता है। उसमें तीव्र प्रतिभा है और सतही आस्थाएं उसे तृप्त नहीं करती हैं। संस्कार, परंपरा और रूढि़यां उसे कुछ भी नहीं दे पा रही हैं। वह संदेहों और शंकाओं से घिर गया है। सारे मानसिक सहारे और धारणाएं खंडित हो गयी हैं और वह उसके एक घने नकार में डूब गया है।
मैं चुप हूं। वह दुबारा बोला है, 'ईश्वर पर से मेरी श्रद्धा हट गयी है। कोई ईश्वर नहीं है। मैं अधार्मिक हो गया हूं।'
मैं उससे कहता हूं कि यह मत कहो। नास्तिक होना, अधार्मिक होना नहीं है। वास्तविक आस्तिकता पाने के लिए नकार से गुजरना ही होता है। वह अधार्मिक होने का नहीं, वस्तुत: धार्मिक होने का प्रारंभ है। संस्कारों से, शिक्षण से, विचारों से मिली आस्तिकता कोई आस्तिकता नहीं है। जो उससे तृप्त है, वह भ्रांति में है। वह विपरीत विचारों में पलता, तो उसका मन विपरीत निर्मित हो सकता था। और फिर वह उससे ही तृप्त हो जाता।
मन पर पड़े संस्कार परिधि की, सतह की घटना है। वह मृत पर्त है। वह उधार और बासी स्थिति है। कोई भी सचमुच आत्मिक जीवन के लिये प्यासा व्यक्ति, उस काल्पनिक जल से अपनी प्यास नहीं बुझा सकता है। ओर इस अर्थ में वह व्यक्ति धन्य-भागी है। क्योंकि वास्तविक जल को पाने की खोज इसी बेबुझी प्यास से प्रारंभ होती है। ईश्वर को धन्यवाद दो कि तुम ईश्वर की धारणा से सहमत नहीं हो। क्योंकि यह असहमति ईश्वर के सत्य तक तुम्हें ले जा सकती है।
मैं उस युवक के चेहरे पर एक प्रकाश फैलता देखता हूं। एक शांति और एक आश्वासन उसकी आंखों में आ गया है। जाते समय में उससे कह रहा हूं, 'इतना स्मरण रखना कि नास्तकिता धार्मिक जीवन की शुरुआत है। वह अंत नहीं है। वह पृष्ठभूमि है, पर उस पर ही रुक नहीं जाना है। वह रात्रि है, उसमें ही डूब नहीं जाना है। उसके बाद ही, उससे ही, सुबह का जन्म होता है।'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

दृष्टिं को भीतर ले चलना है


धूप में मंदिर कलश चमक रहे हैं। आकाश खुला है और राह पर लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है। मैं राह चलते लोगों को देखता हूं, पर न मालूम क्यों ऐसा नहीं लगता कि वे जीवित हैं। जीवन का, अस्तित्व का बोध न हो, तो किसी को जीवित कैसे कहा जा सकता है! जीवन आता है और कब व्यय हो जाता है, यह जैसे ज्ञात नहीं हो पाता है। साधरणत: जब मृत्यु की घडि़यां आती हैं, तब जीवन का बोध होता है।
एक कहानी पढ़ी थी।
एक व्यक्ति था-बिलकुल भुलक्कड़। वह भूल ही गया था कि वह जीवित है। फिर एक दिन वह सुबह उठा और उसने पाया कि वह मर गया है, तब उसे ज्ञात हुआ कि वह जीवित भी था! इस कहानी में बहुत सत्य है।
मैं इस कहानी का स्मरण कर रहा हूं। बहुत हँसी आती है कि मरकर भी किसी ने पाया है कि वह जीवित था; पर हँसी धीरी-धीरे उदासी में बदल जाती है। यह कैसी दयनीय स्थिति है!
मैं यह सोच ही रहा हूं कि कुछ लोग आ गये हैं। उन्हें देखता हूं, उनकी बातें सुनता हूं, उनकी आंखों में झांकता हूं। जीवन उनमें कहीं भी नहीं है। वे तो जैसे छाया की तरह हैं। सारा जगत छायाओं से भर गया है। अपने ही हाथों अधिक लोग प्रेत-लोक में रह रहे हैं। और इन छायाओं के भीतर जीवित आग है-जीवन है, लेकिन उन्हें इसका पता नहीं है। इस छाया-जीवन के भीतर वास्तविक जीवन है और इस प्रेत-जीवन के पार सत्य-जीवन भी है, जिसे अभी और यहीं पाया जा सकता है।
और, इसे पाने की शर्त कितनी छोटी है!
और, इसे पाने का उपाय कितना सरल है!
कल मैंने कहा है, 'दृष्टिं को भीतर ले चलना है।'
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

केवल आनंद ही नित्य है

रात्रि पानी बरसा और भीतर आ गया था। खिड़कियां बंद थी और बड़ी घुटन मालूम होने लगी थी। फिर खिड़कियां खोलीं और हवा के नये झोंकों से ताजगी बही और फिर मैं कब सो गया, कुछ पता नहीं।
सुबह एक सज्जन आये थे। उन्हें देखकर रात की घुटन याद आ गयी थी। लगा जैसे उनके मन की सारी खिड़कियां, सारे द्वार बंद हैं। एक भी झरोखा उन्होंने अपने भीतर खुला नहीं छोड़ा है, जिससे बाहर की ताजी हवाएं, ताजी रोशनी भीतर पहुंच सके। और मुझे सब बंद दिखने लगा। मैं उनसे बातें कर रहा था और मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कि मैं दीवारों से बातें कर रहा हूं। फिर मैंने सोचा, अधिक लोग ऐसे ही बंद हैं और जीवन की ताजगी और सौंदर्य तथा नयेपन से वंचित हैं।
मनुष्य अपने ही हाथों अपने को एक कारागार बना लेता है। इस कैद में घुटन और कुंठा मालूम होती है, पर उसे मूल कारण का- ऊब और घबराहट के मूल स्रोत का पता नहीं चलता
है। समस्त जीवन ऐसे ही बीत जाता है।
जो मुक्त गगन में उड़ने का आह्लाद ले सकता था, वह एक तोते के पिंजरे में बंद सांसें तोड़ देता है।
चित्त की दीवारें तोड़ देने पर खुला आकाश उपलब्ध हो जाता है और खुला आकाश ही जीवन है। यह मुक्ति प्रत्येक पा सकता है और यह मुक्ति प्रत्येक को पा लेनी है।
यह मैं रोज कह रहा हूं, पर शायद मेरी बात सब तक पहुंचती नहीं है। उनकी दीवारें मजबूत हैं। पर दीवार कितनी भी मजबूत क्यों न हों, वे मूलत: कमजोर और दुखद हैं। उनके विरोध में यही आशा कि किरण है कि दुखद हैं। और जो दुखद है, वह ज्यादा देर टिक नहीं सकता है। केवल आनंद ही नित्य हो सकता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

'पर' में 'स्व' के दर्शन


एक साल हुए कुछ बीज बोये थे। अब उनमें फूल आ गये हैं। कितना चाहा कि फूल सीधे आ जाएं, पर फूल सीधे नहीं आते हैं। फूल लाना हो तो बीज बोने पड़ते हैं, पौधा सम्हालना पड़ता है और तब अंत में प्रतीक्षित का दर्शन होता है।
यह प्रक्रिया फूलों के संबंध में ही नहीं, जीवन के संबंध में भी सत्य है।
अहिंसा, अपरिग्रह, अचौर्य, सत्य, ब्रह्मंचर्य- ये सब जीवन-साधन के फूल हैं। कोई इन्हें सीधे नहीं ला सकता। इन्हें लाने के लिए आत्म- ज्ञान के बीज बोने पड़ते हैं। उसके आते ही ये सब अपने आप चले आते हैं।
आत्म-ज्ञान मूल है, शेष सब उसके परिणाम हैं।
जीवन के बाह्य आचार का कुरूप होना, आंतरिक सड़न का प्रतीक होता है और उसका सौंदर्य आंतरिक जीवन और संगीत की प्रतिध्वनि होती है।
इससे लक्षणों को बदलने और परिवर्तन करने से कुछ भी नहीं हो सकता है। मूलत: जहां विकार की जड़े हैं, वहीं बदलाहट करनी है।
आत्म-अज्ञान विकार की जड़ है। 'मैं कौन हूं?'- यह जानना है। यह जानते ही अभय और अद्वैत की उपलब्धि होती है। अद्वैत बोध- यह बोध कि जो मैं हूं, वही दूसरा भी है- समस्त हिंसा को जड़ से नष्ट कर देता है और परिणाम में आती है, अहिंसा। 'पर' को 'पर' जानना हिंसा है। 'पर' में 'स्व' के दर्शन अहिंसा है और अहिंसा है, धर्म की आत्मा।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

आंख बंद कर तो देखो


आंखें बंद किये बैठा था। आंखों से देखते-देखते मनुष्य आंखें बंद करके देखना ही भूलता जा रहा है। जो आंखों से दिखता है, वह उसके समकक्ष कुछ भी नहीं है, जो आंखें बंद करके दिख आता है। आंख का छोटा-सा परदा दो दुनियाओं को अलग करता और जोड़ता है।
मैं आंख बंद किये बैठा था कि एक व्यक्ति आये और पूछने लगे कि मैं क्या कर रहा था! और जब मैंने कहा कि कुछ देख रहा था, तो वे हैरान-से हो गये। शायद उन्होंने सोचा होगा कि आंखें बंद करके देखना भी क्या देखना कहा जा सकता है!
आंख खोलता हूं, तो सीमा में आ जाता हूं। आंख बंद करता हूं, तो असीम के द्वार खुल जाते हैं। इस ओर दृश्य दिखते हैं, उस ओर द्रष्टा दिखाई देता है।
एक फकीर स्त्री थी- राबिया। एक सुंदर प्रभात में किसी ने उससे कहा था, 'राबिया, भीतर झोपड़े में क्या कर रही हो? यहां आओ, बाहर देखो, प्रभु ने कैसा मनोरम प्रभात को जन्म दिया है।' राबिया ने भीतर से कहा था, 'तुम बाहर जिस प्रभात को देख रहे हो, मैं भीतर उसके ही बनाने वाले को देख रही हूं। मित्र, तुम ही भीतर आ जाओ और जो यहां है, उस सौंदर्य के आगे बाहर के किसी सौंदर्य का कोई अर्थ नहीं है।'
पर कितने हैं, जो आंख बंद करके भी बाहर ही नहीं बने रहेंगे? अकेले आंख बंद करने से ही आंख बंद नहीं होती है। आंख बंद है, पर चित्र बाहर के ही बन जाते हैं। पलक बंद हैं, पर दृश्य बाहर के ही उतरे जा रहे हैं। यह आंख का बंद होना नहीं है। आंख के बंद होने का अर्थ है : शून्यता, स्वप्नों से, विचारों से मुक्ति। विचार और दृश्य के विलीन होने से आंख बंद होती हैं। और फिर जो प्रकट होता है, वह शाश्वत चैतन्य है। वही है सत्, वही है चित्त, वही है आनंद। इन आंखों का सब खेल है। आंख बदली और सब बदल जाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)