स्वप्न की उपेक्षा नहीं!


एक गांव गया था। किसी ने पूछा कि आप क्या सिखाते हैं? मैंने कहा, ''मैं स्वप्न सिखाता हूं।'' जो मनुष्य सागर के दूसरे तट के स्वप्न नहीं देखता है, वह कभी इस तट से अपनी नौका को छोड़ने में समर्थ नहीं होगा। स्वप्न ही अनंत सागर में जाने का साहस देते हैं।
कुछ युवक आये थे। मैंने उनसे कहा, ''आजीविका ही नहीं, जीवन के लिए भी सोचो। सामयिक ही नहीं, शाश्वत भी कुछ है। उसे जो नहीं देखता है, वह असार में ही जीवन को खो देता है।'' वे कहने लगे, ''ऐसी बातों के लिए पास में समय कहां है? फिर, ये सब- सत्य और शाश्वत की बातें स्वप्न ही तो मालूम होती हैं?'' मैंने सुना और कहा, ''मित्रों, आज के स्वप्न ही कल के सत्य बन जाते हैं। स्वप्नों से डरो मत और स्वप्न कहकर कभी उनकी उपेक्षा मत करना। क्योंकि ऐसा कोई भी सत्य नहीं है, जिसका जन्म कभी न कभी स्वप्न की भांति न हुआ हो। स्वप्न के रूप में ही सत्य पैदा होता है। और वे लोग धन्य हैं, जो कि घाटियों में रहकर पर्वत शिखरों के स्वप्न देख पाते हैं, क्योंकि वे स्वप्न ही उन्हें आकांक्षा देंगे और वे स्वप्न। ही उन्हें ऊंचाइयां छूने के संकल्प और शक्ति से भरेंगे। इस बात पर मनन करना है। किसी एकांत क्षण में रुक कर इस पर विमर्श करना। और यह भी देखना कि आज ही केवल हमारे हाथों में है- अभी के क्षण पर केवल हमारा अधिकार है। और समझना कि जीवन का प्रत्येक क्षण बहुत संभावनाओं से गर्भित है और यह कभी पुन: वापस नहीं लौटता है। यह कहना कि स्वप्नों के लिए हमारे पास कोई समय नहीं है, बहुत आत्मघातक है। क्योंकि इसके कारण तुम व्यर्थ ही अपने पैरों को अपने हाथों ही बांध लोगे। इस भाव से तुम्हारा चित्त एक सीमा में बंध जावेगा और तुम उस अद्भुत स्वतंत्रता को खो दोगे, जो कि स्वप्न देखने में अंतर्निहित होती है। और, यह भी तो सोचो कि तुम्हारे समय का कितना अधिक हिस्सा ऐसे प्रयासों में व्यय हो रहा है, जो कि बिलकुल ही व्यर्थ हैं और जिनसे कोई भी परिणाम आने को नहीं है? क्षुद्रतम बातों पर लड़ने, अहंकार से उत्पन्न वाद-विवादों को करने, निंदाओं और आलोचनाओं में - कितना समय तुम नहीं खो रहे हो? और, शक्ति और समय अपव्यय के ऐसे बहुत से मार्ग हैं। यह बहुमूल्य समय ही जीवन-शिक्षण-चिंतन, मनन और निदिध्यासन में परिणत किया जा सकता है। इससे ही वे फूल उगाये जा सकते हैं, जिनकी सुगंध अलौकिक होती है और उस संगीत को सुना जा सकता है, जो कि इस जगत का नहीं है।''
अपने स्वप्नों का निरीक्षण करो और उनका विश्लेषण करो। क्योंकि, कल तुम जो बनोगे और होओगे, उस सबकी भविष्यवाणी अवश्य ही उनमें छिपी होगी।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ईश्वर बाह्य सत्य नहीं!


सत्य की खोज में स्वयं को बदलना होगा। वह खोज कम, आत्म-परिवर्तन ही ज्यादा है। जो उसके लिए पूर्णरूपेण तैयार हो जाता है, सत्य स्वयं उन्हें खोजता आ जाता है।
मैंने सुना है कि फकीर इब्राहिम उनके जीवन में घटी एक घटना कहा करते थे। साधु होने के पूर्व वे बल्ख के राजा थे। एक बार जब वे आधी रात को अपने पलंग पर सोये हुए थे, तो उन्होंने सुना कि महल के छप्पर पर कोई चल रहा है। वे हैरान हुए और उन्होंने जोर से पूछा कि ऊपर कौन है? उत्तर आया कि कोई शत्रु नहीं। दुबारा उन्होंने पूछा कि वहां क्या कर रहे हो? उत्तर आया कि ऊंट खो गया है, उसे खोजता हूं। इब्राहिम को बहुत आश्चर्य हुआ और अज्ञात व्यक्ति की मूर्खता पर हंसी भी आई। वे बोले, ''अट्टालिका के छप्पर पर ऊंट खो जाने और खोजने की बात तो बड़ी ही विचित्र है। मित्र, तुम्हारा मस्तिष्क तो ठीक है?'' उत्तर में वह अज्ञात व्यक्ति भी बहुत हंसने लगा और बोला, ''हे निर्बोध, तू जिस चित्त दशा में ईश्वर को खोज रहा है, क्या वह अट्टालिका के छप्पर पर ऊंट खोजने से भी ज्यादा विचित्र नहीं है?''
रोज ऐसे लोगों को जानने का मुझे अवसर मिलता है, जो स्वयं को बदले बिना ईश्वर को पाना चाहते हैं। ऐसा होना बिलकुल ही असंभव है। ईश्वर कोई बाह्य सत्य नहीं है। वह तो स्वयं के ही परिष्कार की अंतिम चेतना-अवस्था है। उसे पाने का अर्थ स्वयं वही हो जाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

मन को जानों!


मनुष्य का मन ही सब कुछ है। यह मन सब कुछ जानना चाहता है। लेकिन, ज्ञान केवल उन्हें ही उपलब्ध होता है, जो कि इस मन को ही जान लेते हैं।
कोई पूछता था, ''सत्य को पाने के लिए मैं क्या करूं?'' मैंने कहा, ''स्वयं की सत्त में प्रवेश करो। और, यह होगा चित्त की जड़ पकड़ने से। उसके शाख-पल्लवों की चिंता व्यर्थ है। चित्त की जड़ को पकड़ने के लिए आंखों को बंद करो और शांति से विचारों के निरीक्षण में उतरो। किसी एक विचार को लो और उसके जन्म से मृत्यु तक का निरीक्षण करो।'' लुक्वान यू ने कहा है, ''विचारों को ऐसे पकड़ो, जैसे कि कोई बिल्ली चूहे की प्रतीक्षा करती और झपटती है।'' यह बिलकुल ठीक कहा। बिल्ली की भांति ही तीव्रता, उत्कटता और सजगता से प्रतीक्षा करो। एक पलक भी बेहोशी में न झपे और फिर जैसे ही कोई विचार उठे, झपटकर पकड़ लो। फिर उसका सम्यक निरीक्षण करो। वह कहां से पैदा हुआ और कहां अंत होता है- यह देखो। और, यह देखते-देखते ही तुम पाओगे कि वह तो पानी के बुलबुले की भांति विलीन हो गया है या कि स्वप्न की भांति तिरोहित। ऐसे ही क्रमश: जो विचार आवें, उनके साथ भी तुम्हारा यही व्यवहार हो। इस व्यवहार से विचार का आगमन क्षीण होता है और निरंतर इस भांति उन पर आक्रमण करने से वे आते ही नहीं हैं। विचार न हों, तो मन बिलकुल शांत हो जाता है। और, जहां मन शांत है, वहीं मन की जड़ है। इस जड़ को जो पकड़ लेता है, उसका स्वयं में प्रवेश होता है। स्वयं में प्रवेश पा लेना ही सत्य को पा लेना है।
सत्य जानने वाले में ही छिपा है। शेष कुछ भी जानने से वह नहीं उघड़ता। ज्ञाता को ही जो जान लेते हैं, ज्ञान उन्हें ही मिलता है। ज्ञेय के पीछे मत भागो। ज्ञान चाहिए, तो ज्ञाता के भी पीछे चलना आवश्यक है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जीवन और आदर्श

आदर्श-विहीन जीवन कैसा है? उस नाव की भांति जिसमें मल्लाह न हो या कि हो तो सोया हो। और यह स्मरण रहे कि जीवन के सागर पर तूफान सदा ही बने रहते हैं। आदर्श न हो तो जीवन की नौका को डूबने के सिवाय और कोई विकल्प ही नहीं रह जाता है।
श्वाइत्जर ने कहा है, ''आदर्शो की ताकत मापी नहीं जा सकती। पानी की बूंद में हमें कुछ भी ताकत दिखाई नहीं देती। लेकिन उसे किसी चट्टान की दरार में जम कर बर्फ बन जाने दीजिए, तो वह चट्टान को फोड़ देगी। इस जरा से परिवर्तन से बूंद को कुछ हो जाता है और उसमें प्रसुप्त शक्ति सक्रिय और परिणामकारी हो उठती है। ठीक यही बात आदर्शो की है। जब तक वे विचार रूप बने रहते हैं, उनकी शक्ति परिणामकारी नहीं होती। लेकिन जब वे किसी के व्यक्तित्व और आचरण में ठोस रूप लेते हैं, तब उनसे विराट शक्ति और महत परिणाम उत्पन्न होते हैं।''
आदर्श-अंधकार से सूर्य की ओर उठने की आकांक्षा है। जो उस आकांक्षा से पीडि़त नहीं होता है, वह अंधकार में पड़ा रह जाता है। लेकिन आदर्श आकांक्षा मात्र ही नहीं हैं। वह संकल्प भी है। क्योंकि, जिन आकांक्षाओं के पीछे संकल्प का बल नहीं, उनका होना या न होना बराबर ही है। और, आदर्श संकल्प मात्र भी नहीं है, वरन उसके लिए सतत श्रम भी है। क्योंकि , सतत श्रम के अभाव में कोई बीज कभी वृक्ष नहीं बनता है।
मैंने सुना है, ''जिस आदर्श में व्यवहार का प्रयत्न न हो, वह फिजूल है और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो वह भयंकर है।''
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

सकारात्मक दृष्टिंकोण!


रात्रि में एक वृद्ध व्यक्ति मिलने आए थे। उनका हृदय जीवन के प्रति शिकायतों ही शिकायतों से भर पड़ा था। मैंने उनसे कहा, ''जीवन-पथ पर कांटे हैं- यह सच है। लेकिन, वे केवल उन्हें ही दिखाई पड़ते हैं, जो कि फूलों को नहीं देख पाते। फूलों को देखना जिसे आता है, उसके लिए कांटे भी फूल बन जाते हैं।''
फरीदुद्दीन अत्तार अकसर लोगों से कहा करता था, ''ऐ खुदा के बंदों, जीवन की राह में अगर कभी कोई कड़वी बात हो जावे, तो उस प्यारे गुलाम को याद करना।'' लोग पूछते, कौन सा गुलाम? तो वह कहानी कहता, ''किसी राजा ने अपने एक गुलाम को एक अत्यंत दुर्लभ और सुंदर फल दिया था। गुलाम ने उसे चखा और कहा कि फल तो बहुत मीठा है। ऐसा फल न तो उसने कभी देखा ही था, न चखा ही। राजा का मन भी ललचाया उसने गुलाम से कहा कि टुकड़ा काट कर मुझे भी दो। लेकिन, गुलाम फल का एक टुकड़ा देने में भी संकोच कर रहा है, यह देख राजा का लालच और भी बढ़ा। अंतत: गुलाम को फल का टुकड़ा देना ही पड़ा। पर जब टुकड़ा राजा ने मुंह में रखा तो पाया कि फल तो बेहद कड़ुवा है। उसने विस्मय से गुलाम की ओर देखा! गुलाम ने उत्तर दिया- मेरे मालिक, आपसे मुझे कितने कीमती तोहफे मिलते रहे हैं। उनकी मिठास इस छोटे से फल की कड़ुवाहट को मिटा देने के लिए क्या काफी नहीं है? क्या इस छोटी सी बात के लिए मैं शिकायत करूं और दुखी होऊं? आपके मुझ पर इतने असंख्य उपकार किए हैं कि इस छोटी-सी कड़ुवाहट का विचार भी करना कृतघ्नता है।''
जीवन का स्वाद बहुत कुछ उसे हमारे देखने के ढंग पर निर्भर करता है। कोई चाहे तो दो अंधकार पूर्ण रातों के बीच एक छोटे-से दिन को देख सकता है। और, चाहे तो दो प्रकाशोज्ज्वल दिनों के बीच एक छोटी-सी रात्रि को। पहली दृष्टिं में वह छोटा-सा दिन भी अंधकार पूर्ण हो जाता है और दूसरी दृष्टिं में रात्रि भी रात्रि नहीं रह जाती है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

कभी, अचानक ऐसे हो जाएं जैसे नहीं हैं!


किसी वृक्ष के नीचे बैठे हुए, अतीत और भविष्य के बारे में न सोचते हुए, सिर्फ अभी और यहीं होते हुए, आप कहां हैं? 'मैं' कहां हूं? आप इस 'मैं' को अनुभव नहीं कर सकते, वह इस क्षण में नहीं है। अहंकार कभी वर्तमान में नहीं पाया जाता। अतीत अब नहीं है, भविष्य अभी आने को है; दोनों नहीं हैं। अतीत जा चुका है, भविष्य अभी आया नहीं- केवल वर्तमान ही है। और, वर्तमान में कभी भी अहंकार जैसी कोई चीज नहीं मिलती।
तिब्बत के कुछ मठों में बहुत ही प्राचीन ध्यान-विधियों में से एक विधि अभी भी प्रयोग की जाती है। यह ध्यान-विधि इसी सत्य पर आधारित है, जो मैं आपसे कह रहा हूं। वे सीखते हैं कि कभी-कभी आप अचानक गायब हो सकते हैं। बगीचे में बैठे हुए बस भाव करें कि आप गायब हो रहे हैं। बस देखें कि जब आप दुनिया से विदा हो जाते हैं, जब आप यहां मौजूद नहीं रहते, जब आप एकदम मिट जाते हैं, तो दुनिया कैसी लगती है। बस एक सेकेंड के लिए न होने का प्रयोग करके देखें।
अपने ही घर में ऐसे हो जाएं जैसे कि नहीं हैं। यह बहुत ही सुंदर ध्यान है। चौबीस घंटे में आप इसे कई बार कर सकते हैं- सिर्फ आधा सेकेंड भी काफी है। आधा सेकेंड के लिए एकदम खो जाएं- आप नहीं हैं और दुनिया चल रही है। जैसे-जैसे हम इस तथ्य के प्रति और-और सजग होते हैं, तो हम अपने अस्तित्व के एक और आयाम के प्रति सजग होते हैं, जो लंबे समय से, जन्मों-जन्मों से उपेक्षित रहा है। और वह आयाम है स्वीकार भाव का। हम चीजों को सहज होने देते हैं, एक द्वार बन जाते हैं। चीजें हमारे बिना भी होती हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)





अनंत को लक्ष्य बनाओ!


जीवन के तथाकथित सुखों की क्षणभंगुरता को देखो। उसका दर्शन ही, उनसे मुक्ति बन जाता है।
किसी ने कोई लोक कथा सुनाई थी- एक चिडि़या आकाश में मंडरा रही थी। उसके ऊपर ही दूर पर चमकता हुआ एक शुभ्र बादल था। उसने अपने आप से कहा,' मैं उड़ूं और शुभ्र बादल को छूऊं।' ऐसा विचार कर उस बादल को लक्ष्य बना कर, वह चिडि़या अपनी पूरी शक्ति से उस दिशा में उड़ी। लेकिन वह बादल कभी पूर्व में कभी पश्चिम में चला जाता। कभी वह अचानक रुक जाता और कभी चक्कर पर चक्कर खाने लगता। फिर वह अपने आपको फैलाने लगा। वह चिडि़या उस तक पहुंच भी नहीं पायी कि अचानक वह छंट गया और नजरों से बिलकुल ओझल हो गया। उस चिडि़या ने अथक प्रयत्न से वहां पहुंच कर पाया कि वहां तो कुछ भी नहीं है। यह देखकर उस चिडि़या ने स्वयं से कहा, 'मैं भूल में पड़ गयी। क्षणभंगुर बादलों को नहीं, लक्ष्य तो पर्वत की उन गर्वीली चोटियों को ही बनाना चाहिए जो कि अनादि और अनंत हैं।'
कितनी सत्य कथा है? और हममें से कितने हैं, जो कि क्षणभंगुर बादलों को जीवन का लक्ष्य बनाने के भ्रम में नहीं पड़ते हैं? लेकिन, देखो निकट ही अनादि और अनंत वे पर्वत भी हैं, जिन्हें जीवन का लक्ष्य बनाने से ही कृतार्थता और धन्यता उपलब्ध होती है।
रवीन्द्रनाथ ने कहीं कहा है, ''वर्षा बिंदु ने चमेली के कान में कहा, 'प्रिय, मुझे सदा अपने हृदय में रखना।' और चमेली कुछ कह भी नहीं पाई कि भूमि पर जा पड़ी।''
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)