नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे
इन्हीं नैतिक व्यक्तियों ने नरक की कल्पना की है कि चोरों को वहां जलवाएंगे कड़ाहियों में, बेईमानों को वहां आग में डालेंगे, कीड़े-मकोड़े सताएंगे, और नरक में अनंतकालीन कष्ट देंगे। ऐसे-ऐसे धर्म हैं जो कहते हैं कि अनंतकाल के लिए नरक में डाल दिए जाएंगे, अनंतकाल के लिए। कितने पाप किया होगा आखिर? एक आदमी जिंदगी में कितना पाप कर सकता है। दो-चार-दस साल की सजा भी ठीक हो सकती थी, अनंतकाल के लिए नरक में डाल देने वाले लोग कौन रहे होंगे? ये वे ही नैतिक लोग, जिन्होंने थोड़ी-बहुत ईमानदारी साध ली है तो बेईमानों से बदला लेना चाहते हैं उसका नरक में डाल कर। ये वे ही नैतिक लोग रस लेते हैं नरक में और खुद के लिए व्यवस्था कर ली उन्होंने स्वर्ग की। जहां ऐसी स्त्रियां हैं जो हमेशा जवान रहती है और कभी बूढ़ी नहीं होतीं। और जहां नदियों में शराब बहती है पानी नहीं बहता। यहां उन्होंने चुल्लू भर शराब छोड़ दी है तो वहां शराब के झरनों में नहाना चाहते हैं और पीते रहना चाहते हैं।
अपने लोगों ने व्यवस्था कर ली है नैतिक लोगों ने स्वर्ग की और अनैतिक लोगों के लिए नरक की। यह क्या धार्मिक लोगों ने किया होगा? क्या कोई धार्मिक चित्त का व्यक्ति यह कल्पना कर सकता है कि जिसने कभी भूल की है उसे नरक में डाल कर आग में सड़ाएंगे। और अगर ऐसा आदमी भी धार्मिक आदमी भी यह कल्पना कर सकता है तो फिर अधार्मिक आदमी और धार्मिक आदमी में भेद क्या है?
तो मुझे दिखाई पड़ता है ये सारे स्वर्ग-नरक नैतिक व्यक्ति से पैदा हुए हैं, धार्मिक व्यक्ति से नहीं। यह भय और प्रलोभन नैतिक व्यक्ति ने पैदा किया धार्मिक व्यक्ति ने नहीं।
धर्म का संबंध नीति से कोई भी नहीं है इस भांति का जैसा हम सोचते हैं कि नैतिक व्यक्ति धार्मिक हो जाएगा। नहीं, लेकिन एक दूसरी तरह का संबंध जरूर है। धार्मिक व्यक्ति अनिवार्यतः नैतिक हो जाता है, लेकिन उसे नैतिक होने का बोध नहीं होता। यह सहज होता है। यह कोई कल्टिवेटिड, यह कोई आरोपित बात नहीं होती उसका नैतिक होना। वह नैतिक होने को मजबूर होता है। वह नैतिक होने को विवश होता है। वह नैतिक ही हो सकता है, अनैतिक होने का सवाल ही नहीं उठता। यह मुझे नहीं लगता कि कोई नैतिकता जीवन का पथ है। कभी भी नहीं है। नैतिकता तो कोई और प्रयोजन से व्यवस्था की गई है, उसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। समाज की व्यवस्था है नैतिकता। समाज चाहता है चोरी न हो। समाज चाहता है जिनका धन है उनके पास सुरक्षित रहे। और जिनके पास धन है वे तो बहुत ही चिंतित हैं इस बात के लिए कि चोरी बिलकुल न हो। इसलिए धनियों ने जितने भी ग्रंथ लिखवाए हैं सबमें लिखवा दिया है चोरी करना पाप है। लेकिन धनिकों के द्वारा लिखवाए गए ग्रंथों में कहीं भी नहीं लिखा है कि शोषण करना पाप है, एक्सप्लाइटेशन पाप है, यह कहीं भी नहीं लिखा है। आज तक एक भी धर्मग्रंथ ने यह नहीं लिखा कि एक्सप्लाइटेशन पाप है। चोरी पाप है यह तो समझ में आ गया, लेकिन इतना धन इकट्ठा कैसे हो जाता है एक आदमी के पास? यह पाप नहीं है? नहीं तो वे धर्मग्रंथ कहते हैं यह पिछले जन्मों के पुण्य से इकट्ठा हो गया।
गरीबी पिछले जन्म के पाप के कारण है, धन पिछले जन्म के पुण्य के कारण है। और चोरी, चोरी करना मत, क्योंकि चोरी हमेशा धनिक के विरोध में है, इसलिए चोरी पाप है। शोषण पाप नहीं है। और बड़ा मजा यह है कि अगर शोषण न हो तो चोरी कैसे हो सकती है? जब तक दुनिया में शोषण है चोरी होगी। चोरी कैसे रुक सकती है। बड़े चोर धनपति हैं, छोटे चोर जेलों में बंद हैं। बिना चोरी के धन इकट्ठा होता ही नहीं। धन का संग्रह मात्र चोरी है, लेकिन धन के संग्रह को पाप नहीं कहते हैं धर्मग्रंथ। और नैतिक गुरु उसको पाप नहीं बताते हैं। क्योंकि सब नैतिक गुरु और सब धर्मशास्त्री जिन-जिन के धन पर जीते हैं, उनके धन की निंदा नहीं कर सकते, उसमें असमर्थ हैं। इसलिए एक षड्यंत्र चल रहा है दुनिया में हजारों साल से धनियों के बीच और धर्मगुरुओं के बीच एक साजिश चल रही है। और धर्मगुरु धनी की सुरक्षा कर रहा है हजारों साल से। और व्यवस्था दे रहा है उसको कि तेरे पुण्य का फल है यह। और चोरी के विरोध में है वह।
जारी----
नीति मार्ग नहीं है- गतांक से आगे
नैतिक व्यक्ति तो द्वंद्वग्रस्त व्यक्ति है। नैतिक व्यक्ति धार्मिक व्यक्ति नहीं है। तो क्या मैं यह कह रहा हूं कि आप अनैतिक हो जाएं? नहीं, मैं आपसे यह कह रहा हूं कि नैतिक होने से आप इस भूल में मत पड़ जाना कि आप धार्मिक हो गए हैं। धार्मिक होना आयाम ही दूसरा है, दिशा ही दूसरी है। वह बात ही और है। वह सुगंध और है। वह प्रकाश और है। नैतिक मनुष्य को न तो कोई प्रकाश मिलता है, न कोई सुगंध और न कुछ। बल्कि नैतिक मनुष्य का सारा रस अहंकार का रस होता है। जैसे हम अच्छे-अच्छे वस्त्र पहन कर शानदार दिखाई पड़ने लगते हैं, हममें जो बहुत चालाक हैं वे अच्छा आचरण करके बहुत शानदार हो जाते हैं। उनका अहंकार तृप्त होता है इस बात से कि मैं झूठ नहीं बोलता, मैं चोर नहीं हूं, मैं बेईमान नहीं हूं। मैं बेईमान हो सकता हूं? तुम होओगे बेईमान, सारी दुनिया होगी बेईमान, लेकिन मैं? मैं सात्विक पुरुष और नैतिक पुरुष, मैं बेईमान हो सकता हूं, चोर हो सकता हूं। तो यह नैतिक पुरुष तो ईगोइस्ट होता है। और नैतिक पुरुष से ज्यादा अहंकारी आदमी खोजना मुश्किल है। और इसीलिए नैतिक पुरुष दूसरे की अनीति में हमेशा झांकता रहता है। देखता रहता है कि कौन-कौन चोरी कर रहा है। क्योंकि इसी में उसे रस होता है कि मैं चोरी नहीं करता हूं। कौन-कौन चोरी करता है। नैतिक पुरुष दूसरों की दीवाल में छेद करके झांकता रहता है कि दूसरे लोग अपने घरों में क्या कर रहे हैं। नैतिक व्यक्ति निंदक होता है हमेशा दूसरों का। क्योंकि उसका सारा रस ही इस बात में है कि वह नैतिक है और दूसरे लोग नैतिक नहीं हैं।
इसलिए जो कौम नीति के चक्कर में पड़ जाती है वह निंदक हो जाती है। हम अपने ही मुल्क में इस बात को भलीभांति जानते हैं। हमारे मुल्क जैसे निंदक लोग कहां खोजने से मिलेंगे। और हमारे जैसे मुल्क के लोग नीति के प्रेमी भी और कहां मिलेंगे। दिन-रात सुबह से शाम तक नीति की चर्चा करते हैं। और दिन-रात सुबह से शाम तक दूसरों की निंदा करते हैं और दूसरों के वस्त्र उघाड़ कर देखते हैं और दूसरों की दीवालों में झांकते हैं। क्यों? यह अनिवार्य है। क्योंकि नैतिक पुरुष का एक ही मजा है कि मैं भला आदमी हूं। और यह भलापन उतना ही बड़ा हो जाता है जितने दूसरे लोग बुरे सिद्ध हो जाते हैं। इसलिए हर नैतिक आदमी दूसरे को बुरा सिद्ध करने में लगा रहता है।
लेकिन धार्मिक व्यक्ति बहुत दूसरे तरह का व्यक्ति होता है। उसकी नैतिकता उसके धार्मिक स्वभाव से बहती है वैसे ही जैसे दीये से प्रकाश बहता है, फूल से सुगंध बहती है। उसे पता भी नहीं चलता कि मैं नैतिक हूं। और इसलिए धार्मिक व्यक्ति कभी किसी दूसरे की अनीति में झांक कर देखने की कोशिश भी नहीं करता। बल्कि अगर आप उसे दिखाना भी चाहें तो उसे दिखना मुश्किल हो जाएगा।
जापान में एक रात एक फकीर के घर में एक चोर घुसा। दरवाजा धकाया, सोचता था बंद होगा, लेकिन फकीर का दरवाजा था, बंद किसके लिए किया जाता, वह खुला था, अटका हुआ था। चोर को अंदाज न था कि फकीर जगता होगा, कोई बारह बजे थे रात के। भीतर गया तो घबड़ा गया, फकीर बैठा था, कुछ चिट्ठी-पत्री लिखता था। उस फकीर ने कहा: आओ, आओ, इतनी रात को तो कोई कभी आता नहीं, कैसे आए मित्र? उस फकीर को खयाल भी नहीं आया कि यह आदमी चोर हो सकता है या हत्यारा हो सकता है। आधी रात में दूसरे के घर में एकदम से घुस आया और हाथ में उसके छुरा था नंगा। लेकिन उस फकीर ने कहा: आओ, आओ मित्र, इतनी रात गए तो कोई भी नहीं आता, आओ, बैठो। उस फकीर की प्रेम भरी बात सुन कर उस चोर को लौट कर भागना भी आसान न हुआ। मजबूरी में उसे बैठ जाना पड़ा कुर्सी पर। उस फकीर ने पूछा: क्या इरादे हैं? कैसे आए? क्या चाहते हो? उस सीधे-सरल आदमी के सामने झूठ बोलना भी शायद आसान नहीं हुआ। उस चोर ने कहा कि मैं चोरी करने आया हूं। उस फकीर ने कहा: बड़े बेवक्त आए। एक-दो दिन पहले तो खबर करनी थी, तो मैं कुछ व्यवस्था करता कि तुम चोरी करके ले जाते। फकीर का झोपड़ा है। बड़ी दुविधा में तुमने मुझे डाल दिया। तो क्या तुम्हें दूं? हां, अच्छा ही हुआ, सुबह एक आदमी आया था और दस रुपये भेंट कर गया था, वे रखे हैं। लेकिन इतने से पैसे में...तुम इतनी दूर आए अंधेरी रात में और फकीर के झोपड़े पर आए, इसी से पता चलता है कि कितनी मुसीबत में और कितनी जरूरत में होओगे, दस रुपये से काम चल सकेगा? वह चोर तो बहुत घबड़ा गया। उसकी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करे। फकीर उठा उसने अपने आले से दस रुपये निकाले और उस चोर को दिए। और कहा कि अगर तुम्हारी मर्जी हो तो एक रुपया छोड़ जाओ, सुबह-सुबह कभी मुझे जरूरत पड़ जाती है। उस चोर ने एक रुपया छोड़ दिया और वह भागा निकल कर। फकीर चिल्लाया और उसने कहा कि रुको मित्र, दरवाजा तो कम से कम अटका दो और कम से कम मुझे धन्यवाद तो दे जाओ, क्योंकि दस रुपये जो तुमने लिए हैं वे तो कल चुक जाएंगे, लेकिन दिया हुआ धन्यवाद कभी पीछे भी काम पड़ सकता है, तो धन्यवाद देते चले जाओ।
वह चोर किसी तरह धन्यवाद देकर वहां से भागा। पीछे वह पकड़ा गया और मुकदमा चला। और भी बहुत सी चोरियां उसके ऊपर थीं। इस फकीर की चोरी का मामला भी था। इस फकीर को अदालत में बुलाया गया। वह चोर बहुत डरा हुआ था, कि अगर उस फकीर ने पहचान लिया तो उसका पहचानना ही काफी होगा, फिर किसी और प्रमाण की जरूरत न रह जाएगी। वह इतना प्रसिद्ध आदमी था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा उस फकीर को कि आप पहचानते हैं इसे?
उसने कहा: भलीभांति पहचानता हूं, ये मेरे मित्र हैं। और कई बार तो ऐसा हुआ है कि आधी रात भी आ गए हैं। मित्र के घर ही कोई आधी रात को आता है, ऐसे किसके घर कौन जाता है। वह फकीर ने यह कहा, वह चोर तो घबड़ाया हुआ था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा: इसने कभी तुम्हारे यहां चोरी की?
उसने कहा कि नहीं, कभी नहीं। एक बार ये आए थे तो नौ रुपये मैंने इन्हें दिए थे, लेकिन उसके लिए इन्होंने धन्यवाद दे दिया था। बात खतम हो गई, उसका कोई लेना-देना बाकी नहीं रहा। और ये आदमी बहुत भले हैं मैं आपसे कह दूं, क्योंकि मैंने इनसे कहा था एक रुपया छोड़ जाओ, तो ये छोड़ गए थे। और मैंने इनसे कहा, दरवाजा अटका दो, तो इन्होंने दरवाजा अटका दिया था। और मैंने इनसे कहा कि धन्यवाद दे दें, तो यह इतना सीधा आदमी कि इसने मुझे धन्यवाद भी दिया था। कौन कहता है यह चोर है?
यह एक धार्मिक व्यक्ति का अनुभव होता है जीवन के प्रति। उसे चोर दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का चोर मर जाता है। उसे बेईमान दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का बेईमान मर जाता है। उसे हत्यारा दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का हत्यारा मर जाता है। नैतिक व्यक्ति के भीतर खूब घनीभूत हो जाता है हत्यारा, चोर और बेईमान, तो उसे हर एक के भीतर चोर, बेईमान दिखाई पड़ने लगता है।
(सौजन्य से : ओशो न्यूज लेटर)
इसलिए जो कौम नीति के चक्कर में पड़ जाती है वह निंदक हो जाती है। हम अपने ही मुल्क में इस बात को भलीभांति जानते हैं। हमारे मुल्क जैसे निंदक लोग कहां खोजने से मिलेंगे। और हमारे जैसे मुल्क के लोग नीति के प्रेमी भी और कहां मिलेंगे। दिन-रात सुबह से शाम तक नीति की चर्चा करते हैं। और दिन-रात सुबह से शाम तक दूसरों की निंदा करते हैं और दूसरों के वस्त्र उघाड़ कर देखते हैं और दूसरों की दीवालों में झांकते हैं। क्यों? यह अनिवार्य है। क्योंकि नैतिक पुरुष का एक ही मजा है कि मैं भला आदमी हूं। और यह भलापन उतना ही बड़ा हो जाता है जितने दूसरे लोग बुरे सिद्ध हो जाते हैं। इसलिए हर नैतिक आदमी दूसरे को बुरा सिद्ध करने में लगा रहता है।
लेकिन धार्मिक व्यक्ति बहुत दूसरे तरह का व्यक्ति होता है। उसकी नैतिकता उसके धार्मिक स्वभाव से बहती है वैसे ही जैसे दीये से प्रकाश बहता है, फूल से सुगंध बहती है। उसे पता भी नहीं चलता कि मैं नैतिक हूं। और इसलिए धार्मिक व्यक्ति कभी किसी दूसरे की अनीति में झांक कर देखने की कोशिश भी नहीं करता। बल्कि अगर आप उसे दिखाना भी चाहें तो उसे दिखना मुश्किल हो जाएगा।
जापान में एक रात एक फकीर के घर में एक चोर घुसा। दरवाजा धकाया, सोचता था बंद होगा, लेकिन फकीर का दरवाजा था, बंद किसके लिए किया जाता, वह खुला था, अटका हुआ था। चोर को अंदाज न था कि फकीर जगता होगा, कोई बारह बजे थे रात के। भीतर गया तो घबड़ा गया, फकीर बैठा था, कुछ चिट्ठी-पत्री लिखता था। उस फकीर ने कहा: आओ, आओ, इतनी रात को तो कोई कभी आता नहीं, कैसे आए मित्र? उस फकीर को खयाल भी नहीं आया कि यह आदमी चोर हो सकता है या हत्यारा हो सकता है। आधी रात में दूसरे के घर में एकदम से घुस आया और हाथ में उसके छुरा था नंगा। लेकिन उस फकीर ने कहा: आओ, आओ मित्र, इतनी रात गए तो कोई भी नहीं आता, आओ, बैठो। उस फकीर की प्रेम भरी बात सुन कर उस चोर को लौट कर भागना भी आसान न हुआ। मजबूरी में उसे बैठ जाना पड़ा कुर्सी पर। उस फकीर ने पूछा: क्या इरादे हैं? कैसे आए? क्या चाहते हो? उस सीधे-सरल आदमी के सामने झूठ बोलना भी शायद आसान नहीं हुआ। उस चोर ने कहा कि मैं चोरी करने आया हूं। उस फकीर ने कहा: बड़े बेवक्त आए। एक-दो दिन पहले तो खबर करनी थी, तो मैं कुछ व्यवस्था करता कि तुम चोरी करके ले जाते। फकीर का झोपड़ा है। बड़ी दुविधा में तुमने मुझे डाल दिया। तो क्या तुम्हें दूं? हां, अच्छा ही हुआ, सुबह एक आदमी आया था और दस रुपये भेंट कर गया था, वे रखे हैं। लेकिन इतने से पैसे में...तुम इतनी दूर आए अंधेरी रात में और फकीर के झोपड़े पर आए, इसी से पता चलता है कि कितनी मुसीबत में और कितनी जरूरत में होओगे, दस रुपये से काम चल सकेगा? वह चोर तो बहुत घबड़ा गया। उसकी कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करे। फकीर उठा उसने अपने आले से दस रुपये निकाले और उस चोर को दिए। और कहा कि अगर तुम्हारी मर्जी हो तो एक रुपया छोड़ जाओ, सुबह-सुबह कभी मुझे जरूरत पड़ जाती है। उस चोर ने एक रुपया छोड़ दिया और वह भागा निकल कर। फकीर चिल्लाया और उसने कहा कि रुको मित्र, दरवाजा तो कम से कम अटका दो और कम से कम मुझे धन्यवाद तो दे जाओ, क्योंकि दस रुपये जो तुमने लिए हैं वे तो कल चुक जाएंगे, लेकिन दिया हुआ धन्यवाद कभी पीछे भी काम पड़ सकता है, तो धन्यवाद देते चले जाओ।
वह चोर किसी तरह धन्यवाद देकर वहां से भागा। पीछे वह पकड़ा गया और मुकदमा चला। और भी बहुत सी चोरियां उसके ऊपर थीं। इस फकीर की चोरी का मामला भी था। इस फकीर को अदालत में बुलाया गया। वह चोर बहुत डरा हुआ था, कि अगर उस फकीर ने पहचान लिया तो उसका पहचानना ही काफी होगा, फिर किसी और प्रमाण की जरूरत न रह जाएगी। वह इतना प्रसिद्ध आदमी था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा उस फकीर को कि आप पहचानते हैं इसे?
उसने कहा: भलीभांति पहचानता हूं, ये मेरे मित्र हैं। और कई बार तो ऐसा हुआ है कि आधी रात भी आ गए हैं। मित्र के घर ही कोई आधी रात को आता है, ऐसे किसके घर कौन जाता है। वह फकीर ने यह कहा, वह चोर तो घबड़ाया हुआ था।
मजिस्ट्रेट ने पूछा: इसने कभी तुम्हारे यहां चोरी की?
उसने कहा कि नहीं, कभी नहीं। एक बार ये आए थे तो नौ रुपये मैंने इन्हें दिए थे, लेकिन उसके लिए इन्होंने धन्यवाद दे दिया था। बात खतम हो गई, उसका कोई लेना-देना बाकी नहीं रहा। और ये आदमी बहुत भले हैं मैं आपसे कह दूं, क्योंकि मैंने इनसे कहा था एक रुपया छोड़ जाओ, तो ये छोड़ गए थे। और मैंने इनसे कहा, दरवाजा अटका दो, तो इन्होंने दरवाजा अटका दिया था। और मैंने इनसे कहा कि धन्यवाद दे दें, तो यह इतना सीधा आदमी कि इसने मुझे धन्यवाद भी दिया था। कौन कहता है यह चोर है?
यह एक धार्मिक व्यक्ति का अनुभव होता है जीवन के प्रति। उसे चोर दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का चोर मर जाता है। उसे बेईमान दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का बेईमान मर जाता है। उसे हत्यारा दिखना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसके भीतर का हत्यारा मर जाता है। नैतिक व्यक्ति के भीतर खूब घनीभूत हो जाता है हत्यारा, चोर और बेईमान, तो उसे हर एक के भीतर चोर, बेईमान दिखाई पड़ने लगता है।
(सौजन्य से : ओशो न्यूज लेटर)
नीति मार्ग नहीं है --गतांक से आगे
दो व्यक्ति पति और पत्नी जंगल से लौटते थे। वे दोनों बहुत साधु-चरित्र थे, बहुत नैतिक थे। न तो चोरी करते थे, न बेईमानी, न असत्य बोलते थे, न संपत्ति का संग्रह करते थे। लकड़ियां काट लाते थे जंगल से, बेच देते थे, जो मिलता था उसे खा लेते थे। सांझ जो चावल, गेहूं के दाने बच जाते थे उनको बांट देते थे, रात उनके पास कुछ भी नहीं होता था। दूसरे दिन सुबह फिर जंगल जाते और लकड़ी काट लाते। लेकिन एक बार सात दिन तक पानी गिरता रहा, और वे जंगल नहीं जा सके और सात दिन उपवास करना पड़ा। लेकिन उन्होंने किया। उन्होंने पड़ोसियों से मांगा नहीं। पड़ोसियों ने देना भी चाहा, तो वे लेने को राजी न हुए।
सात दिन बाद पानी खुला और वे जंगल गए। वे लकड़ियां काट कर लौटते थे। पति आगे था पत्नी पीछे थी। कमजोर हो गए थे, सात दिन के भूखे थे, परेशान थे। और फिर लकड़ियों को काटने का श्रम और बोझ। पति थोड़ा आगे पत्नी थोड़ी पीछे। पति ने देखा कि राह के किनारे किसी राहगीर की सोने की अशर्फियों से भरी हुई थैली गिर गई है, कुछ अशर्फियां बाहर पड़ी हैं, कुछ थैली के भीतर हैं। उसके मन में हुआ, मैंने तो स्वर्ण को जीत लिया है, मेरे मन में तो स्वर्ण के प्रति कोई कामना और वासना नहीं उठती। लेकिन स्त्री का क्या भरोसा। पुरुषों को आज तक स्त्रियों का भरोसा कभी भी नहीं रहा है। उसको भी नहीं था। इसलिए पुरुषों ने जो धर्म बनाएं हैं उनमें स्त्रियों को मोक्ष जाने की व्यवस्था नहीं की है। उनका कोई भरोसा नहीं है। स्त्रियां शास्त्र बनातीं तो शायद पुरुष का भरोसा उसमें नहीं होता, और पुरुष को स्वर्ग जाने की कोई व्यवस्था नहीं होती। लेकिन चूंकि सभी शास्त्र पुरुषों ने बनाएं हैं इसलिए स्त्रियों को कोई हक स्वर्ग वगैरह, मोक्ष वगैरह जाने का नहीं है।
उसने भी सोचा कि नहीं, यह स्त्री का क्या भरोसा। इसकी नैतिकता का कोई पक्का विश्वास नहीं है। स्त्री ही ठहरी, मन डांवाडोल हो सकता है। तो उसने उस थैली को सरका दिया गड्ढे में और मिट्टी डाल दी। पीछे से तब तक उसकी स्त्री भी आ गई, वह मिट्टी डाल ही रहा था। उसकी स्त्री ने पूछा कि क्या करते हैं? सत्य बोलने का नियम था। नैतिक आदमी था, झूठ बोल सकता नहीं था। तो बड़ी मुश्किल में पड़ गया। बताना पड़ा उसे कि ऐसा-ऐसा हुआ, यहां थैली पड़ी थी अशर्फियों से भरी, मेरे मन में हुआ कि मैंने तो स्वर्ण को जीत लिया लेकिन मेरी स्त्री का मन न डोल जाए। इसलिए मैंने उस स्वर्ण की थैली को गड्ढे में डाल कर मिट्टी से ढंक दिया है।
उसकी स्त्री बोली: मैं बहुत हैरान हूं, तुम्हें अभी स्वर्ण दिखाई पड़ता है? और अभी तुम्हें मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए शर्म नहीं आती? तुम्हें अभी स्वर्ण दिखाई पड़ता है? और मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए शर्म नहीं आती?
यह स्त्री धार्मिक है और वह पुरुष नैतिक है। उसने अपने आचरण को तो ठोंक-पीट कर बदल लिया है, लेकिन उसकी आत्मा में वही सब वासनाएं मौजूद हैं स्वर्ण के प्रति। स्त्री पर तो वह प्रोजेक्ट कर रहा है। उसके भीतर वह मौजूद है। स्त्री का तो बहाना ले रहा है, उस पर ढाल रहा है। लेकिन स्त्री धार्मिक है। वह यह कह रही है कि तुम्हें मिट्टी पर मिट्टी डालते हुए शर्म नहीं आती। जब आत्मा से कोई परिवर्तन होता है तो सोना छोड़ना नहीं पड़ता, सोना मिट्टी हो जाता है। और जब नैतिक परिवर्तन होता है तो सोना छोड़ना पड़ता है, सोना मिट्टी नहीं होता।
तो चाहे सोने को पकड़ो और चाहे छोड़ो, ये दोनों हालत में कोई बहुत बुनियादी फर्क नहीं है। लेकिन जिस दिन सोना मिट्टी ही हो जाए, उसी दिन कोई फर्क है। और सोना उसी दिन मिट्टी होगा जिस दिन आत्मा का दर्शन हो जाए उसके पहले नहीं। जिसको अपना शरीर ही दिखाई पड़ रहा है उसे सोना मिट्टी कभी नहीं हो सकता। वह चाहे छोड़े और चाहे इकट्ठा करे। जिसने अभी अपने शरीर के पार नहीं देखा है उसे सोना मिट्टी नहीं हो सकता। जो अपने शरीर के पार देखने में समर्थ हो जाता है उसे शरीर मिट्टी हो जाता है। और शरीर मिट्टी हो जाता है इसलिए शरीर की दुनिया का सब कुछ मिट्टी हो जाता है। उसमें सोना भी मिट्टी हो जाता है। तब छोड़ना नहीं पड़ता।
धार्मिक चित्त चीजों को छोड़ता नहीं है। नैतिक चित्त छोड़ता है। और यह बड़े मजे की बात है जिस चीज को आप छोड़ते हैं उससे आप हमेशा कि लिए बंध जाते हैं, उससे कभी मुक्त नहीं होते। छोड़ कर देख लें कोई चीज, उससे आप बंध जाएंगे। क्योंकि छोड़ने का मतलब यह है कि भीतर रस था, जबरदस्ती धक्का दिया और छोड़ दिया, रस मौजूद है। धार्मिक चित्त से चीजें छूटती हैं, छोड़ी नहीं जातीं। जैसे पके पत्ते गिर जाते हैं वृक्ष से, वैसे धार्मिक चित्त से कुछ चीजें गिर जाती हैं, झड़ जाती हैं। उन्हें कोई छोड़ता नहीं है। धार्मिक व्यक्ति असत्य बोलना छोड़ता नहीं है असमर्थ हो जाता है असत्य बोलने में। नैतिक व्यक्ति समर्थ होता है असत्य बोलने में, लेकिन असत्य बोलना छोड़ता है। इससे एक द्वंद्व उसके भीतर पैदा होता है।
---जारी
नीति मार्ग नहीं है।
नीति मार्ग है इस तरह की बातें हजारों साल से प्रचलित हैं। और लोगों को यह भी खयाल है कि नैतिक हुए बिना कोई धार्मिक नहीं हो सकता, नैतिक होगा तब धार्मिक होगा।
मैं आपसे कहना चाहूंगा, नैतिक होने से कोई कभी धार्मिक नहीं होता है। हां, कोई धार्मिक हो जाए तो जरूर नैतिक हो जाता है। इन दो बातों को ठीक से समझ लेना जरूरी होगा।
नीति से धर्म पैदा नहीं होता, धर्म से नीति पैदा होती है। नैतिकता से तो एक तरह का पाखंड पैदा होता है धर्म पैदा नहीं होता। क्योंकि नैतिकता आचरण का परिवर्तन है, आत्मा का परिवर्तन नहीं है। और हमारी आत्मा तो होती है कुछ और आचरण हम बदल लेते हैं कुछ। प्राण तो कहते हैं चोरी करो और बुद्धि कहती है चोरी मत करो। भीतर से तो कोई कहता है कि यह करो, सुनी हुई नैतिकता कहती है यह मत करो। मनुष्य एक द्वंद्व में टूट जाता है। भीतर उठता है कि असत्य बोलो, नैतिकता को ध्यान में रख कर सत्य बोलने की कोशिश करता है।
आप कहेंगे कि क्या यह जरूरी है कि ऐसा होता हो? हां, ऐसा ही होता है। और बिलकुल जरूरी है। नहीं तो सत्य बोलने की कोशिश ही न करनी पड़े। अगर असत्य न उठता हो तो सत्य बोलने की कोशिश का सवाल ही क्या है। अगर भीतर बेईमानी न उठती हो तो ईमानदार होने का सवाल ही क्या है। भीतर चोरी उठती है इसलिए बाहर से हम चोरी से अपने को रोकते हैं। और इस रोकने में क्या होता है, मनुष्य दो हिस्सों में टूट जाता है। भीतर चोर रह जाता है आचरण में अचोर हो जाता है। मनुष्य दो हिस्सों में टूट जाता है। आत्मा तो कमसिद बनी रहती है और आचरण शुद्ध खादी के वस्त्रों जैसा हो जाता है सफेद, धुला हुआ। यह आचरण बड़ा धोखा पैदा करता है। यह दूसरों को तो धोखा देता ही है इससे खुद को भी धोखा पैदा होता है। और यह धोखा पैदा होगा, क्योंकि जीवन का जो वास्तविक परिवर्तन है, आचरण तो परिधि है, केंद्र तो आत्मा है। अगर आत्मा परिवर्तित हो तो आचरण अपने आप बदल जाता है। लेकिन आचरण बदले लें तो आत्मा अपने आप नहीं बदलती। जीवन भर चोरी न करें, तो भी भीतर से चोरी समाप्त नहीं होती। और जीवन भर विनम्र बने रहें तो भी भीतर से अहंकार नहीं जाता है, वह मौजूद होता है भीतर। क्योंकि जीवन के परिवर्तन की जो ठीक विधि है वह यह नहीं है। जीवन के परिवर्तन की ठीक विधि यह है कि पहले आत्मा, केंद्र बदल जाए, तो फिर परिधि अपने आप बदल जाती है। नहीं तो हम किसी न किसी रूप में चीजों से चिपके रहते हैं वहीं के वहीं।
जारी----
(सौजन्य से- आोशो न्यूज लेटर )
मैं आपसे कहना चाहूंगा, नैतिक होने से कोई कभी धार्मिक नहीं होता है। हां, कोई धार्मिक हो जाए तो जरूर नैतिक हो जाता है। इन दो बातों को ठीक से समझ लेना जरूरी होगा।
नीति से धर्म पैदा नहीं होता, धर्म से नीति पैदा होती है। नैतिकता से तो एक तरह का पाखंड पैदा होता है धर्म पैदा नहीं होता। क्योंकि नैतिकता आचरण का परिवर्तन है, आत्मा का परिवर्तन नहीं है। और हमारी आत्मा तो होती है कुछ और आचरण हम बदल लेते हैं कुछ। प्राण तो कहते हैं चोरी करो और बुद्धि कहती है चोरी मत करो। भीतर से तो कोई कहता है कि यह करो, सुनी हुई नैतिकता कहती है यह मत करो। मनुष्य एक द्वंद्व में टूट जाता है। भीतर उठता है कि असत्य बोलो, नैतिकता को ध्यान में रख कर सत्य बोलने की कोशिश करता है।
आप कहेंगे कि क्या यह जरूरी है कि ऐसा होता हो? हां, ऐसा ही होता है। और बिलकुल जरूरी है। नहीं तो सत्य बोलने की कोशिश ही न करनी पड़े। अगर असत्य न उठता हो तो सत्य बोलने की कोशिश का सवाल ही क्या है। अगर भीतर बेईमानी न उठती हो तो ईमानदार होने का सवाल ही क्या है। भीतर चोरी उठती है इसलिए बाहर से हम चोरी से अपने को रोकते हैं। और इस रोकने में क्या होता है, मनुष्य दो हिस्सों में टूट जाता है। भीतर चोर रह जाता है आचरण में अचोर हो जाता है। मनुष्य दो हिस्सों में टूट जाता है। आत्मा तो कमसिद बनी रहती है और आचरण शुद्ध खादी के वस्त्रों जैसा हो जाता है सफेद, धुला हुआ। यह आचरण बड़ा धोखा पैदा करता है। यह दूसरों को तो धोखा देता ही है इससे खुद को भी धोखा पैदा होता है। और यह धोखा पैदा होगा, क्योंकि जीवन का जो वास्तविक परिवर्तन है, आचरण तो परिधि है, केंद्र तो आत्मा है। अगर आत्मा परिवर्तित हो तो आचरण अपने आप बदल जाता है। लेकिन आचरण बदले लें तो आत्मा अपने आप नहीं बदलती। जीवन भर चोरी न करें, तो भी भीतर से चोरी समाप्त नहीं होती। और जीवन भर विनम्र बने रहें तो भी भीतर से अहंकार नहीं जाता है, वह मौजूद होता है भीतर। क्योंकि जीवन के परिवर्तन की जो ठीक विधि है वह यह नहीं है। जीवन के परिवर्तन की ठीक विधि यह है कि पहले आत्मा, केंद्र बदल जाए, तो फिर परिधि अपने आप बदल जाती है। नहीं तो हम किसी न किसी रूप में चीजों से चिपके रहते हैं वहीं के वहीं।
जारी----
(सौजन्य से- आोशो न्यूज लेटर )
प्रीति रूपांतरकारी रसायन
एक तत्व हमारे भीतर है, जिसको प्रीति कहें। यह जो तत्व हमारे भीतर है-प्रीति, इसी के आधार पर हम जीते हैं। चाहे हम गलत ही जीएं, तो भी हमारा आधार प्रीति ही होता है।
कोई आदमी धन कमाने में लगा है; धन तो ऊपर की बात है, भीतर तो प्रीति से ही जी रहा है--धन से उसकी प्रीति है। कोई आदमी पद के पीछे पागल है; पद तो गौण है, प्रतिष्ठा की प्रीति है। जहां भी खोजोगे, तो तुम प्रीति को ही पाओगे। कोई वेश्यालय चला गया है, और किसी ने किसी की हत्या कर दी है--पापी में और पुण्यात्मा में, तुम एक ही तत्व को एक साथ पाओगे, वह तत्व प्रीति है। फिर प्रीति किससे लग गई, उससे भेद पड़ता है। धन से लग गई तो तुम धन ही होकर रह जाते हो। ठीकरे हो जाते हो। कागज के सड़े-गले नोट होकर मरते हो।
जिससे प्रीति लगी, वही हो जाओगे।
यह बड़ा बुनियादी सत्य है; इसे हृदय में सम्हाल कर रखना। प्रीति महंगा सौदा है, हर किसी से मत लगा लेना। जिससे लगाई वैसे ही हो जाओगे। वैसा होना हो तो ही लगाना। प्रीति का अर्थ ही यही होता है कि मैं यह होना चाहता हूं। राजनेता गांव में आया और तुम भीड़ करके पहुंच गए, फूलमालाएं सजा कर-किस बात की खबर है? तुम गहरे में चाहते हो कि मेरे पास भी पद हो, प्रतिष्ठा हो; इसलिए पद और प्रतिष्ठा की पूजा है। कोई फकीर गांव में आया और तुम पहुंच गए; उससे भी तुम्हारी प्रीति की खबर मिलती है कि तड़फ रहे हो फकीर होने को-कि कब होगा वह मुक्ति का क्षण, जब सब छोड़-छाड़...जब किसी चीज पर मेरी कोई पकड़ न रह जाएगी। कोई संगीत सुनता है तो धीरे-धीरे उसकी चेतना में संगीत की छाया पड़ने लगती है। तुम जिससे प्रीति करोगे वैसे हो जाओगे; जिनसे प्रीति करोगे वैसे हो जाओगे। तो प्रीति का तत्व रूपांतरकारी है। प्रीति का तत्व भीतरी रसायन है। और बिना प्रीति के कोई भी नहीं रह सकता। प्रीति ऐसी अनिवार्य है जैसे श्वास। जैसे शरीर श्वास से जीता, आत्मा प्रीति से जीती। इसलिए अगर तुम्हारे जीवन में कोई प्रीति न हो, तो तुम आत्महत्या करने को उतारू हो जाओगे। या कभी तुम्हारी प्रीति का सेतु टूट जाए, तो आत्महत्या करने को उतारू हो जाओगे। घर में आग लग गई और सारा धन जल गया, और तुमने आत्महत्या कर ली; क्या तुम कह रहे हो? तुम यह कहते हो: यह घर ही मैं था, यह मेरी प्रीति थी। अब यही न रहा तो मेरे रहने का क्या अर्थ! तुम्हारी पत्नी मर गई और तुमने आत्महत्या कर ली; तुम क्या कह रहे हो? तुम यह कह रहे हो: यह मेरी प्रीति का आधार था। जब मेरी प्रीति उजड़ गई, मेरा संसार उजड़ गया। अब मेरे रहने में कोई सार नहीं।
हम प्रीति के साथ अपना तादात्म्य कर लेते हैं। बिना प्रीति के कोई भी नहीं जी सकता। जैसे बिना श्वास लिए शरीर नहीं रहेगा, वैसे ही बिना प्रीति के आत्मा नहीं टिकेगी। प्रीति है तो आत्मा टिकी रहती है। फिर प्रीति गलत से भी हो तो भी आत्मा टिकी रहती है। मगर चाहिए, प्रीति तो चाहिए-गलत हो कि सही।
फिर प्रीति के बहुत ढंग हैं, वे समझ लेने चाहिए। एक प्रीति है जो तुम्हारी पत्नी में होती है, मित्रों में होती है, पति में होती है, भाई-बहन में होती है। उस प्रीति को हम प्रेम कहते हैं। प्रेम का अर्थ होता है: उसके साथ जो समतल है। तुमसे ऊपर भी नहीं, तुमसे नीचे भी नहीं; तुम्हारे जैसा है; जिससे आलिंगन हो सकता है; उसको प्रेम कहते हैं। समतुल व्यक्तियों में प्रीति होती है तो प्रेम कहते हैं।
फिर एक प्रीति होती है माता, पिता या गुरु में; उसे श्रद्धा कहते हैं। कोई तुमसे ऊपर है; प्रीति को पहाड़ चढ़ना पड़ता है। इसलिए श्रद्धा कठिन होती है। श्रद्धा में दांव लगाना पड़ता है। श्रद्धा में चढ़ाई है। इसलिए बहुत कम लोगों में वैसी प्रीति मिलेगी जिसको श्रद्धा कहें। माता-पिता से कौन प्रीति करता है! कर्तव्य निभाते हैं लोग। दिखाते हैं। उपचार। दिखाना पड़ता है। प्रीति कहां! अपने से ऊपर प्रीति करने में पहाड़ चढ़ने की हिम्मत होनी चाहिए। और ध्यान रखना, तुम अपने से ऊपर, जितने ऊपर प्रीति करोगे, उतने ही तुम ऊपर जाने लगोगे, तुम्हारी चेतना ऊर्ध्वगामी होगी। इसलिए तो हमने श्रद्धा को बड़ा मूल्य दिया है सदियों से, क्योंकि श्रद्धा आदमी को बदलती है, अपने से पार ले जाती है। तुम्हारे हाथ तुमसे ऊपर की तरफ उठने लगते हैं और तुम्हारे पैर किसी ऊर्ध्वगमन पर गतिमान होते हैं। तुम्हारी आंखें ऊंचे शिखरों से टकराती और चुनौती लेती हैं।
कोई आदमी धन कमाने में लगा है; धन तो ऊपर की बात है, भीतर तो प्रीति से ही जी रहा है--धन से उसकी प्रीति है। कोई आदमी पद के पीछे पागल है; पद तो गौण है, प्रतिष्ठा की प्रीति है। जहां भी खोजोगे, तो तुम प्रीति को ही पाओगे। कोई वेश्यालय चला गया है, और किसी ने किसी की हत्या कर दी है--पापी में और पुण्यात्मा में, तुम एक ही तत्व को एक साथ पाओगे, वह तत्व प्रीति है। फिर प्रीति किससे लग गई, उससे भेद पड़ता है। धन से लग गई तो तुम धन ही होकर रह जाते हो। ठीकरे हो जाते हो। कागज के सड़े-गले नोट होकर मरते हो।
जिससे प्रीति लगी, वही हो जाओगे।
यह बड़ा बुनियादी सत्य है; इसे हृदय में सम्हाल कर रखना। प्रीति महंगा सौदा है, हर किसी से मत लगा लेना। जिससे लगाई वैसे ही हो जाओगे। वैसा होना हो तो ही लगाना। प्रीति का अर्थ ही यही होता है कि मैं यह होना चाहता हूं। राजनेता गांव में आया और तुम भीड़ करके पहुंच गए, फूलमालाएं सजा कर-किस बात की खबर है? तुम गहरे में चाहते हो कि मेरे पास भी पद हो, प्रतिष्ठा हो; इसलिए पद और प्रतिष्ठा की पूजा है। कोई फकीर गांव में आया और तुम पहुंच गए; उससे भी तुम्हारी प्रीति की खबर मिलती है कि तड़फ रहे हो फकीर होने को-कि कब होगा वह मुक्ति का क्षण, जब सब छोड़-छाड़...जब किसी चीज पर मेरी कोई पकड़ न रह जाएगी। कोई संगीत सुनता है तो धीरे-धीरे उसकी चेतना में संगीत की छाया पड़ने लगती है। तुम जिससे प्रीति करोगे वैसे हो जाओगे; जिनसे प्रीति करोगे वैसे हो जाओगे। तो प्रीति का तत्व रूपांतरकारी है। प्रीति का तत्व भीतरी रसायन है। और बिना प्रीति के कोई भी नहीं रह सकता। प्रीति ऐसी अनिवार्य है जैसे श्वास। जैसे शरीर श्वास से जीता, आत्मा प्रीति से जीती। इसलिए अगर तुम्हारे जीवन में कोई प्रीति न हो, तो तुम आत्महत्या करने को उतारू हो जाओगे। या कभी तुम्हारी प्रीति का सेतु टूट जाए, तो आत्महत्या करने को उतारू हो जाओगे। घर में आग लग गई और सारा धन जल गया, और तुमने आत्महत्या कर ली; क्या तुम कह रहे हो? तुम यह कहते हो: यह घर ही मैं था, यह मेरी प्रीति थी। अब यही न रहा तो मेरे रहने का क्या अर्थ! तुम्हारी पत्नी मर गई और तुमने आत्महत्या कर ली; तुम क्या कह रहे हो? तुम यह कह रहे हो: यह मेरी प्रीति का आधार था। जब मेरी प्रीति उजड़ गई, मेरा संसार उजड़ गया। अब मेरे रहने में कोई सार नहीं।
हम प्रीति के साथ अपना तादात्म्य कर लेते हैं। बिना प्रीति के कोई भी नहीं जी सकता। जैसे बिना श्वास लिए शरीर नहीं रहेगा, वैसे ही बिना प्रीति के आत्मा नहीं टिकेगी। प्रीति है तो आत्मा टिकी रहती है। फिर प्रीति गलत से भी हो तो भी आत्मा टिकी रहती है। मगर चाहिए, प्रीति तो चाहिए-गलत हो कि सही।
फिर प्रीति के बहुत ढंग हैं, वे समझ लेने चाहिए। एक प्रीति है जो तुम्हारी पत्नी में होती है, मित्रों में होती है, पति में होती है, भाई-बहन में होती है। उस प्रीति को हम प्रेम कहते हैं। प्रेम का अर्थ होता है: उसके साथ जो समतल है। तुमसे ऊपर भी नहीं, तुमसे नीचे भी नहीं; तुम्हारे जैसा है; जिससे आलिंगन हो सकता है; उसको प्रेम कहते हैं। समतुल व्यक्तियों में प्रीति होती है तो प्रेम कहते हैं।
फिर एक प्रीति होती है माता, पिता या गुरु में; उसे श्रद्धा कहते हैं। कोई तुमसे ऊपर है; प्रीति को पहाड़ चढ़ना पड़ता है। इसलिए श्रद्धा कठिन होती है। श्रद्धा में दांव लगाना पड़ता है। श्रद्धा में चढ़ाई है। इसलिए बहुत कम लोगों में वैसी प्रीति मिलेगी जिसको श्रद्धा कहें। माता-पिता से कौन प्रीति करता है! कर्तव्य निभाते हैं लोग। दिखाते हैं। उपचार। दिखाना पड़ता है। प्रीति कहां! अपने से ऊपर प्रीति करने में पहाड़ चढ़ने की हिम्मत होनी चाहिए। और ध्यान रखना, तुम अपने से ऊपर, जितने ऊपर प्रीति करोगे, उतने ही तुम ऊपर जाने लगोगे, तुम्हारी चेतना ऊर्ध्वगामी होगी। इसलिए तो हमने श्रद्धा को बड़ा मूल्य दिया है सदियों से, क्योंकि श्रद्धा आदमी को बदलती है, अपने से पार ले जाती है। तुम्हारे हाथ तुमसे ऊपर की तरफ उठने लगते हैं और तुम्हारे पैर किसी ऊर्ध्वगमन पर गतिमान होते हैं। तुम्हारी आंखें ऊंचे शिखरों से टकराती और चुनौती लेती हैं।
जिसके जीवन में श्रद्धा नहीं है, उसके जीवन में विकास नहीं है। विकास हो ही नहीं सकता। अपने से छोटे के प्रति जो प्रीति होती है उसका नाम स्नेह है। मेरे देखे, अपने से छोटे के प्रति सच्ची प्रीति और ठीक प्रीति तभी होती है जब अपने से बड़े के प्रति श्रद्धा हो; अन्यथा नहीं होती; अन्यथा झूठी होती है। जिस व्यक्ति के जीवन में अपने से बड़े के प्रति श्रद्धा है, सम्यक श्रद्धा है, उस व्यक्ति के जीवन में अपने से छोटे के प्रति सम्यक स्नेह होता है। और उस व्यक्ति के जीवन में एक और क्रांति घटती है-अपने से सम के प्रति सम्यक प्रेम होता है। उसके जीवन में प्रेम का छंद बंध जाता है। छोटे के प्रति सम्यक स्नेह होता है, धारा की तरह बहता है उसका प्रेम। बेशर्त। वह कोई शर्तबंदी नहीं करता कि तुम ऐसा करोगे तो मैं तुम्हें प्रेम करूंगा, कि तुम ऐसे होओगे तो मैं तुम्हें प्रेम करूंगा।
(सौजन्य से : ओशो न्यूंज लेटर)
शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं।
योग का कहना है कि हमारे भीतर शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर चेतन और अचेतन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर एक ही अस्तित्व है, जिसके ये दो छोर हैं। और इसलिए किसी भी छोर से प्रभावित किया जा सकता है। तिब्बत में एक प्रयोग है, जिसका नाम हीट-योग है, उष्णता का योग। वह तिब्बत में सैकड़ों फकीर हैं ऐसे जो नंगे बर्फ पर बैठे रह सकते हैं और उनके शरीर से पसीना चूता रहता है। इस सबकी वैज्ञानिक जांच-परख हो चुकी है। इस सबकी डाक्टरी जांच-परख हो चुकी है। और चिकित्सक बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं कि यह क्या हो रहा है? एक आदमी बर्फ पर बैठा है नंगा, चारों तरफ बर्फ पड़ रही है, बर्फीली हवाएं बह रही हैं, और उसके शरीर पर पसीना बह रहा है! क्या हुआ है इसको? यह आदमी योग के सूत्र का प्रयोग कर रहा है। इसने मन से मानने से इनकार कर दिया कि बर्फ पड़ रही है। यह आंख बंद करके यह कह रहा है, बर्फ नहीं पड़ रही है। यह आंख बंद करके कह रहा है कि सूरज तपा है और धूप बरस रही है। और यह आदमी आंख बंद करके कह रहा है कि मैं गरमी से तड़पा जा रहा हूं। शरीर उसका अनुसरण कर रहा है, वह पसीना छोड़ रहा है।
दक्षिण में एक योगी थे—ब्रह्मयोगी। उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी, रंगून यूनिवर्सिटी और आक्सफोर्ड, तीनों जगह कुछ प्रयोग करके दिखाया। वे किसी भी तरह का जहर पी लेते थे और आधा घंटे के भीतर उस जहर को शरीर के बाहर पेशाब से निकाल देते थे। किसी भी तरह का जहर उनके खून में कभी मिश्रित नहीं होता था। सब तरह के एक्सरे परीक्षण हुए। और मुश्किल में पड़ गई बात कि क्या मामला है? और वह आदमी इतना ही कहता था कि मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं मन को कहता हूं कि मैं स्वीकार नहीं करूंगा जहर। बस इतना मेरा अभ्यास है।
लेकिन रंगून यूनिवर्सिटी में प्रयोग करने के बाद वे मर गए, जहर खून में पहुंच गया। आधा घंटे तक ही उनका संकल्प काम कर पाता था। इसलिए आधा घंटे के पहले जहर को शरीर के बाहर कर देना जरूरी था। आधा घंटे के बाद उनको भी शक होने लगता था कि कहीं जहर मिल ही न जाए। आधा घंटे तक वे अपने संकल्प को मजबूत रख पाते थे। आधा घंटे के बाद शक उनको भी पकड़ने लगता था कि कहीं जहर मिल न जाए। शक बड़ी अजीब चीज है। जो आदमी आधा घंटे तक जहर को अपने खून से दूर रखे, उसको भी पकड़ जाता है कि कहीं पकड़ न जाए जहर।
वे रंगून यूनिवर्सिटी से, जहां ठहरे थे वहां के लिए कार से निकले, और कार बीच में खराब हो गई और वे अपने स्थान पर तीस मिनट की बजाय पैंतालीस मिनट में पहुंच पाए, लेकिन बेहोश पहुंचे। वे पंद्रह मिनट उनकी मृत्यु का कारण बने। सैकड़ों योगियों ने खून की गति पर नियंत्रण घोषित किया है। कहीं से भी कोई भी वेन काट दी जाए, खून उनकी आज्ञा से बहेगा या बंद होगा।
यह तो आप भी छोटा-मोटा प्रयोग करें तो बहुत अच्छा होगा। अपनी नाड़ी को गिन लें। और गिनने के बाद पांच मिनट बैठ जाएं और मन में सिर्फ इतना सोचते रहें कि मेरी नाड़ी की रफ्तार तेज हो रही है, तेज हो रही है, तेज हो रही है। और पांच मिनट बाद फिर नाड़ी को गिनें। तो आप पाएंगे, रफ्तार तेज हो गई है। कम भी हो सकती है। लंबा प्रयोग करें तो बंद भी हो सकती है। हृदय की धड़कन भी, अति सूक्ष्मतम हिस्से तक बंद की जा सकेगी, खून की गति भी बंद की जा सकेगी। शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं; शरीर और मन एक ही चीज का विस्तार हैं, एक ही चीज के अलग-अलग वेवलेंथ हैं। चेतन और अचेतन एक का ही विस्तार हैं।
योग के सारे के सारे प्रयोग इस सूत्र पर खड़े हैं। इसलिए योग मानता है, कहीं से भी शुरू किया जा सकता है। शरीर से भी शुरू की जा सकती है यात्रा और मन से भी शुरू की जा सकती है। बीमारी भी, स्वास्थ्य भी, सौंदर्य भी, शक्ति भी, उम्र भी—शरीर से भी प्रभावित होती है, मन से भी प्रभावित होती है।
बर्नार्ड शा लंदन से कोई बीस मील दूर एक गांव को चुना था अपनी कब्र बनाने के लिए। और मरने के कुछ दिन पहले उस गांव में जाकर रहने लगा। उसके मित्रों ने कहा कि कारण क्या है इस गांव को चुनने का? तो बर्नार्ड शा ने कहा, इस गांव को चुनने का एक बहुत अजीब कारण है। बताऊं तो तुम हंसोगे। लेकिन फिर कोई हर्ज नहीं, तुम हंसना, मैं तुम्हें कारण बताता हूं। ऐसे ही एक दिन इस गांव में घूमने आया था। इस गांव के कब्रिस्तान पर घूमने गया था। वहां एक कब्र पर मैंने एक पत्थर लगा देखा। उसको देख कर मैंने तय किया कि इस गांव में रहना चाहिए। उस पत्थर पर लिखा था—किसी आदमी की मौत का पत्थर था—लिखा था: यह आदमी सोलह सौ दस में पैदा हुआ और सत्रह सौ दस में बहुत कम उम्र में मर गया। तो बर्नार्ड शा ने कहा कि जिस गांव के लोग सौ वर्ष को कम उम्र मानते हैं, अगर ज्यादा जीना हो तो उसी गांव में रहना चाहिए। यह तो उसका मजाक ही था, लेकिन बर्नार्ड शा काफी उम्र तक जीया भी। उस गांव की वजह से जीया, यह तो कहना मुश्किल है। लेकिन उस पत्थर को बर्नार्ड शा ने चुना, यह तो उसके मन का चुनाव है, यह ज्यादा जीने की आकांक्षा का हिस्सा तो है ही। यह हिस्सा उसके ज्यादा जीने में कारण बन सकता है।
जिन मुल्कों में उम्र कम है, उन मुल्कों में सभी लोग कम उम्र की वजह से मर जाते हैं, ऐसा सोचना जरूरी नहीं है। उन मुल्कों में कम उम्र होने की वजह से हमारी उम्र की अपेक्षाएं भी कम हो जाती हैं। हम जल्दी बूढ़े होने लगते हैं, हम जल्दी मरने का विचार करने लगते हैं, हम जल्दी तय करते हैं कि अब वक्त आ गया। जिन मुल्कों में उम्र की अपेक्षाएं ज्यादा हैं, उनमें जल्दी कोई तय नहीं करता, क्योंकि अभी वक्त आया नहीं। तो मरने का खयाल अगर जल्दी प्रवेश कर जाए तो जल्दी परिणाम आने शुरू हो जाएंगे। मन मरने को राजी हो गया। अगर मन मरने को राजी न हो तो देर तक लंबाया जा सकता है।
(सौजन्यब से : ओशो न्यूज लेटर)
स्वार्थी बनो और देखो
स्वार्थ शब्द का अर्थ समझते हो? शब्द बड़ा प्यारा है, लेकिन गलत हाथों में पड़ गया है। स्वार्थ का अर्थ होता है--आत्मार्थ। अपना सुख, स्व का अर्थ। तो मैं तो स्वार्थ शब्द में कोई बुराई नहीं देखता। मैं तो बिलकुल पक्ष में हूं। मैं तो कहता हूं, धर्म का अर्थ ही स्वार्थ है। क्योंकि धर्म का अर्थ स्वभाव है।और एक बात खयाल रखना कि जिसने स्वार्थ साध लिया, उससे परार्थ सधता है। जिससे स्वार्थ ही न सधा, उससे परार्थ कैसे सधेगा! जो अपना न हुआ, वह किसी और का कैसे होगा! जो अपने को सुख न दे सका, वह किसको सुख दे सकेगा! इसके पहले कि तुम दूसरों को प्रेम करो, मैं तुम्हें कहता हूं, अपने को प्रेम करो। इसके पहले कि तुम दूसरों के जीवन में सुख की कोई हवा ला सको, कम से कम अपने जीवन में तो हवा ले आओ। इसके पहले कि दूसरे के अंधेरे जीवन में प्रकाश की किरण उतार सको, कम से कम अपने अंधेरे में तो प्रकाश को निमंत्रित करो। इसको स्वार्थ कहते हो! चलो स्वार्थ ही सही, शब्द से क्या फर्क पड़ता है! लेकिन यह स्वार्थ बिलकुल जरूरी है। यह दुनिया ज्यादा सुखी हो जाए, अगर लोग ठीक अर्थों में स्वार्थी हो जाएं। और जिस आदमी ने अपना सुख नहीं जाना, वह जब दूसरे को सुख देने की कोशिश में लग जाता है तो बड़े खतरे होते हैं। उसे पहले तो पता नहीं कि सुख क्या है? वह जबर्दस्ती दूसरे पर सुख थोपने लगता है, जिस सुख का उसे भी अनुभव नहीं हुआ। तो करेगा क्या? वही करेगा जो उसके जीवन में हुआ है।
समझो कि तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें एक तरह की शिक्षा दी--तुम मुसलमान-घर में पैदा हुए, कि हिंदू-घर में पैदा हुए, कि जैन-घर में, तुम्हारे मां-बाप ने जल्दी से तुम्हें जैन, हिंदू या मुसलमान बना दिया। उन्होंने यह सोचा ही नहीं कि उनके जैन होने से, हिंदू होने से उन्हें सुख मिला है? नहीं, वे एकदम तुम्हें सुख देने में लग गए। तुम्हें हिंदू बना दिया, मुसलमान बना दिया। तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हें धन की दौड़ में लगा दिया। उन्होंने यह सोचा भी नहीं एक भी बार कि हम धन की दौड़ में जीवनभर दौड़े, हमें धन मिला है? धन से सुख मिला है? उन्होंने जो किया था, वही तुम्हें सिखा दिया। उनकी भी मजबूरी है, और कुछ सिखाएंगे भी क्या? जो हम सीखे होते हैं उसी की शिक्षा दे सकते हैं। उन्होंने अपनी सारी बीमारियां तुम्हें सौंप दीं। तुम्हारी धरोहर बस इतनी ही है। उनके मां-बाप उन्हें सौंप गए थे बीमारियां, वे तुम्हें सौंप गए, तुम अपने बच्चों को सौंप जाओगे। कुछ स्वार्थ कर लो, कुछ सुख पा लो, ताकि उतना तुम अपने बच्चों को दे सको, उतना तुम अपने पड़ोसियों को दे सको। यहां हर आदमी दूसरे को सुखी करने में लगा है, और यहां कोई सुखी है नहीं। जो स्वाद तुम्हें नहीं मिला, उस स्वाद को तुम दूसरे को कैसे दे सकोगे? असंभव है।
मैं तो बिलकुल स्वार्थ के पक्ष में हूं। मैं तो कहता हूं, मजहब मतलब की बात है। इससे बड़ा कोई मतलब नहीं है। धर्म यानी स्वार्थ। लेकिन बड़ी अपूर्व घटना घटती है, स्वार्थ की ही बुनियाद पर परार्थ का मंदिर खड़ा होता है। तुम जब धीरे-धीरे अपने जीवन में शांति, सुख, आनंद की झलकें पाने लगते हो, तो अनायास ही तुम्हारा जीवन दूसरों के लिए उपदेश हो जाता है। तुम्हारे जीवन से दूसरों को इंगित और इशारे मिलने लगते हैं। तुम अपने बच्चों को वही सिखाओगे जिससे तुमने शांति जानी। तुम फिर प्रतिस्पर्धा न सिखाओगे, प्रतियोगिता न सिखाओगे, संघर्ष-वैमनस्य न सिखाओगे। तुम उनके मन में जहर न डालोगे।
इस दुनिया में अगर लोग थोड़े स्वार्थी हो जाएं तो बड़ा परार्थ हो जाए। अब तुम कहते हो कि 'क्या ऐसी स्थिति में ध्यान आदि करना निपट स्वार्थ नहीं है?' निपट स्वार्थ है। लेकिन स्वार्थ में कहीं भी कुछ बुरा नहीं है। अभी तक तुमने जिसको स्वार्थ समझा है, उसमें स्वार्थ भी नहीं है। तुम कहते हो, धन कमाएंगे, इसमें स्वार्थ है; पद पा लेंगे, इसमें स्वार्थ है; बड़ा भवन बनाएंगे, इसमें स्वार्थ है। मैं तुमसे कहता हूं, इसमें स्वार्थ कुछ भी नहीं है। मकान बन जाएगा, पद भी मिल जाएगा, धन भी कमा लिया जाएगा--अगर पागल हुए तो सब हो जाएगा जो तुम करना चाहते हो--मगर स्वार्थ हल नहीं होगा। क्योंकि सुख न मिलेगा। और स्वयं का मिलन भी नहीं होगा। और न जीवन में कोई अर्थवत्ता आएगी। तुम्हारा जीवन व्यर्थ ही रहेगा, कोरा, जिसमें कभी कोई वर्षा नहीं हुई। जहां कभी कोई अंकुर नहीं फूटे, कभी कोई हरियाली नहीं और कभी कोई फूल नहीं आए। तुम्हारी वीणा ऐसी ही पड़ी रह जाएगी, जिसमें कभी किसी ने तार नहीं छेड़े। कहां का अर्थ और कहां का स्व!
तुमने जिसको स्वार्थ समझा है, उसमें स्वार्थ नहीं है, सिर्फ मूढ़ता है। और जिसको तुम स्वार्थ कहकर कहते हो कि कैसे मैं करूं? मैं तुमसे कहता हूं, उसमें स्वार्थ है और परम समझदारी का कदम भी है। तुम यह स्वार्थ करो।
इस बात को तुम जीवन के गणित का बहुत आधारभूत नियम मान लो कि अगर तुम चाहते हो दुनिया भली हो, तो अपने से शुरू कर दो--तुम भले हो जाओ। फिर तुम कहते हो, 'परमात्मा मुझे यदि मिले भी, तो उससे अपनी शांति मांगने के बजाय मैं उन लोगों के लिए दंड ही मांगना पसंद करूंगा जिनके कारण संसार में शोषण है, दुख है और अन्याय है।' क्या तुम सोचते हो तुम उन लोगों में सम्मिलित नहीं हो? क्या तुम सोचते हो वे लोग कोई और लोग हैं? तुम उन लोगों से भी तो पूछो कभी! वे भी यही कहते हुए पाए जाएंगे कि दूसरों के कारण। कौन है दूसरा यहां? किसकी बात कर रहे हो? किसको दंड दिलवाओगे? तुमने शोषण नहीं किया है? तुमने दूसरे को नहीं सताया है? तुम दूसरे की छाती पर नहीं बैठ गए हो, मालिक नहीं बन गए हो? तुमने दूसरों को नहीं दबाया है? तुमने वही सब किया है, मात्रा में भले भेद हों। हो सकता है तुम्हारे शोषण की प्रक्रिया बहुत छोटे दायरे में चलती हो, लेकिन चलती है। तुम जी न सकोगे। तुम अपने से नीचे के आदमी को उसी तरह सता रहे हो जिस तरह तुम्हारे ऊपर का आदमी तुम्हें सता रहा है। यह सारा जाल जीवन का शोषण का जाल है, इसमें तुम एकदम बाहर नहीं हो, दंड किसके लिए मांगोगे? और जरा खयाल करना, दंड भी तो दुख ही देगा दूसरों को! तो तुम दूसरों को दुखी ही देखना चाहते हो! परमात्मा भी मिल जाएगा तो भी तुम मांगोगे दंड ही! दूसरों को दुख देने का उपाय ही! तुम अपनी शांति तक छोड़ने को तैयार हो!
(सौजन्यल से : ओशो न्यू ज लैटर)
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